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भारत में सैटेलाइट नेटवर्क लीजिंग: दूरसंचार क्षेत्र में नई क्रांति लाती TRAI की सिफारिशें

भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (TRAI) ने सैटेलाइट कंपनियों के लिए अपनी क्षमता दूरसंचार ऑपरेटरों को किराए पर देने हेतु नई लाइसेंसिंग नीति प्रस्तावित की है, जिससे उपभोक्ताओं को सीधे सैटेलाइट कनेक्टिविटी प्राप्त होगी।

आवतीकाल AI डेस्क6 नवंबर 2026 · 7 मिनट का पाठ
वाहन के हुड पर स्थापित एक पोर्टेबल सैटेलाइट इंटरनेट टर्मिनल।
वाहन के हुड पर स्थापित एक पोर्टेबल सैटेलाइट इंटरनेट टर्मिनल।
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भारतीय दूरसंचार क्षेत्र में एक बड़ा नीतिगत बदलाव लाते हुए देश के दूरसंचार नियामक द्वारा एक नई लाइसेंसिंग व्यवस्था की सिफारिश की गई है। टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (Telecom Regulatory Authority of India - TRAI) द्वारा गुरुवार को प्रस्तुत प्रस्ताव के अनुसार, विदेशी या स्थानीय सैटेलाइट सेटअप रखने वाली कंपनियां भारत में अपने सैटेलाइट नेटवर्क का निर्माण कर सकेंगी और उसे स्थानीय टेलीकॉम ऑपरेटरों को किराए पर दे सकेंगी। इस नई व्यवस्था के तहत सैटेलाइट कंपनियां स्वयं ग्राहकों को सीधी सेवाएं नहीं बेच सकेंगी।

TRAI की यह सिफारिश टेलीकम्युनिकेशंस एक्ट, 2023 (Telecommunications Act, 2023) के तहत "सैटेलाइट कम्युनिकेशन नेटवर्क (SCN) प्रोवाइडर ऑथराइजेशन" नामक नए लाइसेंस वर्ग के रूप में पेश की गई है। उल्लेखनीय है कि ये विनियामक सिफारिशें सीधे तौर पर बाध्यकारी नहीं हैं, लेकिन जब डिपार्टमेंट ऑफ टेलीकम्युनिकेशंस (Department of Telecommunications - DoT) द्वारा इन्हें स्वीकार किया जाएगा, तभी यह नीति देश में लागू होगी।

यदि यह नीति स्वीकार की जाती है, तो Starlink और Eutelsat OneWeb जैसी वैश्विक सैटेलाइट कंपनियां भारतीय बाजार में केवल नेटवर्क प्रोवाइडर के रूप में प्रवेश कर सकेंगी। दूसरी ओर, Reliance Jio और Bharti Airtel जैसी भारतीय टेलीकॉम कंपनियां अपना स्वयं का स्पेस इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा किए बिना अपने ग्राहकों को सैटेलाइट आधारित इंटरनेट, कॉलिंग और मैसेजिंग सेवाएं उपलब्ध करा सकेंगी।

प्रस्तावित SCN लाइसेंस की मुख्य शर्तें और शुल्क का विवरणसूचित दर और समयसीमा TRAI की सिफारिशों के अनुसार है
संपत्ति / पैरामीटरTRAI की प्रस्तावित शर्त / दर
लाइसेंस का प्रकारसैटेलाइट कम्युनिकेशन नेटवर्क (SCN) प्रोवाइडर
प्रवेश शुल्क (Entry Fee)₹37.5 लाख
लाइसेंस शुल्क (Licensing Fee)AGR का 8%
स्पेक्ट्रम शुल्क (Spectrum Fee)AGR का 4% (मई 2025 के प्रस्ताव के अनुसार)
लाइसेंस अवधि20 वर्ष (रिन्यू करने की सुविधा के साथ)
DoT की निर्णय समयसीमासुरक्षा मंजूरी के बाद 30 दिन
गेटवे चालू करने की समयसीमामंजूरी मिलने के 12 महीने के भीतर

सैटेलाइट कम्युनिकेशन नेटवर्क (SCN) मॉडल कैसे काम करता है?

प्रस्तावित सैटेलाइट कम्युनिकेशन नेटवर्क (SCN) मॉडल में कार्यप्रणाली के दो मुख्य विभाजन किए गए हैं। पहला भाग ग्राउंड सेगमेंट (Ground Segment) और नेटवर्क संचालन का है। SCN लाइसेंसधारक भारत में गेटवे अर्थ स्टेशन (Gateway Earth Station - जो पृथ्वी से उपग्रहों के साथ संपर्क साधता है), नेटवर्क उपकरणों और स्पेक्ट्रम का संचालन करेगा।

दूसरा भाग ग्राहक सेवा और बिलिंग का है। SCN ऑपरेटर इस पूरे नेटवर्क को भारत के लाइसेंस प्राप्त मोबाइल ऑपरेटरों या इंटरनेट सर्विस प्रोवाइडर्स को लीज पर (किराए पर) देगा। सामान्य ग्राहकों के लिए सेवाओं का बिक्री व्यवहार, कंज्यूमर बिलिंग और शिकायतों का निवारण संबंधित स्थानीय टेलीकॉम कंपनी अपने ब्रांड नाम के तहत ही करेगी।

नियामक के प्रस्ताव के अनुसार, SCN लाइसेंस प्राप्त करने के लिए किसी भी कंपनी के पास भारत सरकार के डिपार्टमेंट ऑफ स्पेस (Department of Space) द्वारा अधिकृत सैटेलाइट क्षमता होनी आवश्यक है। या फिर वह ऐसी अधिकृत कंपनी की सब्सिडियरी होनी चाहिए या भारत में गेटवे चलाने के लिए उनके साथ करारबद्ध होनी चाहिए। यह लाइसेंस प्राप्त करने के लिए सैटेलाइट का स्वयं का स्वामित्व होना सख्ती से अनिवार्य नहीं है, जिससे विदेशी सैटेलाइट ऑपरेटरों के गेटवे चलाने वाली कंपनियां भी इसके लिए पात्र होंगी।

सैटेलाइट-टू-टेलीकॉम नेटवर्क लीजिंग मॉडल की कार्यप्रणालीइस मॉडल के तहत सैटेलाइट कंपनी और टेलीकॉम कंपनी के बीच विभाजन रहता है
  1. 1. ऑथराइजेशन और इंफ्रास्ट्रक्चरSCN कंपनी डिपार्टमेंट ऑफ स्पेस से क्षमता मंजूर करवाकर भारत में गेटवे अर्थ स्टेशनों और नेटवर्क स्थापित करती है।
  2. 2. स्पेक्ट्रम आवंटनDoT द्वारा SCN कंपनी को या उसके टेलीकॉम पार्टनर को 5 वर्ष तक की अवधि के लिए प्रशासनिक रूप से स्पेक्ट्रम आवंटित किया जाता है।
  3. 3. नेटवर्क लीजिंगSCN कंपनी अपना पूरा सैटेलाइट ग्राउंड नेटवर्क स्थानीय टेलीकॉम ऑपरेटर को किराए पर देने का करार करती है।
  4. 4. अंतिम ग्राहक सेवाटेलीकॉम कंपनी ग्राहक को अपनी ब्रांड के तहत सैटेलाइट इंटरनेट/कॉलिंग बेचती है, बिलिंग करती है और कंज्यूमर केयर संभालती है।

लाइसेंस शर्तें, वित्तीय आंकड़े और विनियामक समयसीमा

TRAI ने प्रस्ताव रखा है कि SCN नियंत्रण प्राप्त करने वाला लाइसेंस राष्ट्रीय स्तर का होगा, जिसकी वैधता 20 वर्षों के लिए होगी और इसे बाद में रिन्यू भी किया जा सकेगा। हालांकि, यह लाइसेंस उपग्रह लॉन्च करने या अंतरिक्ष में संचालन करने की अनुमति नहीं देता है, वह अधिकार केवल डिपार्टमेंट ऑफ स्पेस के पास ही सुरक्षित रहेगा।

वित्तीय शर्तों की बात करें तो, TRAI ने एंट्री फी (Entry Fee) के रूप में ₹37.5 लाख और लाइसेंस फी के रूप में एडजस्टेड ग्रॉस रेवेन्यू (Adjusted Gross Revenue - AGR) के 8% की सिफारिश की है। टेलीकॉम कंपनियों को दोहरा कर न भरना पड़े, इसके लिए उन्हें SCN प्रोवाइडर को भुगतान की जाने वाली राशि को अपनी कुल आय से घटाने की छूट देने का सुझाव भी दिया गया है।

स्पेक्ट्रम (Spectrum) आवंटन के लिए ऑक्शन (नीलामी) की जगह एडमिनिस्ट्रेटिव (प्रशासनिक) पद्धति से 5 वर्ष तक की अवधि के लिए स्पेक्ट्रम देने की सिफारिश की गई है। सुरक्षा मंजूरी मिलने के बाद DoT को 30 दिनों के भीतर आवेदन का निपटारा करने का आदेश देने के लिए कहा गया है। स्पेक्ट्रम की कीमत के संबंध में TRAI ने स्पष्ट किया है कि मई 2025 के अपने प्रस्ताव के अनुसार AGR के 4% स्पेक्ट्रम चार्ज तय करने की बात पर DoT जो अंतिम निर्णय लेगा, वही लागू होगा।

भारतीय टेलीकॉम नियामक प्रक्रिया: TRAI की ओपन हाउस या नियामक बैठक का दृश्य
भारतीय टेलीकॉम नियामक प्रक्रिया: TRAI की ओपन हाउस या नियामक बैठक का दृश्य (Ministry of Communications, GODL-India, Wikimedia Commons)

डायरेक्ट-टू-डिवाइस सर्विस और स्पेक्ट्रम आवंटन के नियम

इस बदलाव में सबसे आकर्षक बात डायरेक्ट-टू-डिवाइस (Direct-to-Device - D2D) सेवाओं के लिए मंजूरी है। D2D टेक्नोलॉजी के माध्यम से दूरस्थ या दुर्गम क्षेत्रों में, जहां मोबाइल टावर का कवरेज नहीं है, वहां सैटेलाइट सीधे सामान्य स्मार्टफोन के साथ कनेक्ट हो सकता है।

TRAI ने सुझाव दिया है कि देश के टेलीकॉम ऑपरेटर अपने मौजूदा स्पेक्ट्रम का उपयोग बिना किसी अतिरिक्त शुल्क के D2D सेवाओं के लिए कर सकेंगे। इसके लिए 2027 में आयोजित होने वाली वर्ल्ड रेडियोकम्युनिकेशन कॉन्फ्रेंस (World Radiocommunication Conference) की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं होगी। हालांकि, इसके लिए शर्त यह है कि वह विशिष्ट फ्रीक्वेंसी चैनल देश के सभी 22 टेलीकॉम सर्कल्स में समान रूप से उपलब्ध होनी चाहिए।

राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से, सभी ग्राहकों का डेटा ट्रैफिक भारत में स्थित गेटवे अर्थ स्टेशनों से गुजरना अनिवार्य बनाया गया है। यदि स्थानीय गेटवे में कोई तकनीकी खराबी आती है, तो भी डेटा को विदेशी सर्वर पर रूट या कॉपी नहीं किया जा सकेगा। सभी प्रोवाइडरों को रियल-टाइम मॉनिटरिंग और कानूनी जांच (Lawful Interception) की सुविधा देनी होगी, और मंजूरी मिलने के 12 महीनों के भीतर इन गेटवे को कार्यशील करना होगा।

विभिन्न सैटेलाइट ऑर्बिट्स की पृथ्वी से ऊंचाई (किलोमीटर में)कम ऊंचाई वाली LEO कक्षा में डेटा ट्रांसमिशन में विलंब (Latency) कम होता है
LEO (अधिकतम ऊंचाई)2,000
MEO (अधिकतम ऊंचाई)36,000
GEO (स्थिर ऊंचाई)35,785

કિમી

पृष्ठभूमि: सैटेलाइट ऑर्बिट्स और सैटेलाइट टेक्नोलॉजी का इतिहास

सैटेलाइट कम्युनिकेशन का इतिहास काफी दिलचस्प है। 4 अक्टूबर 1957 को सोवियत संघ द्वारा लॉन्च किया गया मानव जाति का पहला कृत्रिम उपग्रह स्पुतनिक 1 (Sputnik 1) 20.005 MHz और 40.002 MHz की फ्रीक्वेंसी पर काम करता था। इसके बाद 18 दिसंबर 1958 को Project SCORE लॉन्च हुआ, जिसने बैटरी फेल होने से पहले 8 घंटे काम करके अंतरिक्ष से पृथ्वी पर क्रिसमस संदेश भेजा था।

सैटेलाइट ऑर्बिट (Satellite Orbit - उपग्रह की कक्षा) की दृष्टि से मुख्य रूप से तीन भाग होते हैं। जियोस्टेशनरी ऑर्बिट (Geostationary Orbit - GEO) पृथ्वी की विषुवत रेखा से 22,236 मील (35,785 किमी) की ऊंचाई पर स्थित है, जहां सैटेलाइट पृथ्वी की गति के साथ ही घूमता है, जिससे वह आकाश में एक ही जगह स्थिर दिखाई देता है।

दूसरी ओर, लो अर्थ ऑर्बिट (Low Earth Orbit - LEO) पृथ्वी से 160 से 2,000 किमी की ऊंचाई पर होती है और इसकी एक परिक्रमा अवधि मात्र 90 मिनट जितनी होती है। LEO उपग्रह पृथ्वी के करीब होने के कारण उनमें सिग्नल आने-जाने में कम समय (Low Latency) लगता है। मीडियम अर्थ ऑर्बिट (Medium Earth Orbit - MEO) 2,000 से 36,000 किमी की ऊंचाई के बीच स्थित होती है।

कम्युनिकेशन सैटेलाइट बस और पेलोड मॉड्यूल के विभिन्न घटकों को दर्शाती आकृति
कम्युनिकेशन सैटेलाइट बस और पेलोड मॉड्यूल के विभिन्न घटकों को दर्शाती आकृति (Uwe W, CC BY-SA 3.0 de, Wikimedia Commons)

भारत और सामान्य ग्राहकों के लिए इसके अर्थ और चुनौतियां

भारत में टेलीकॉम क्षेत्र का विनियमन 20 फरवरी 1997 को बने TRAI एक्ट के तहत होता है। 24 जनवरी 2000 को व्यावसायिक विवादों के समाधान के लिए TDSAT की स्थापना की गई थी। TRAI की नई सिफारिशें भारत में डिजिटल डिवाइड (डिजिटल असमानता) को दूर करने के लिए बहुत महत्वपूर्ण साबित होंगी।

इस मॉडल से सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि स्टारलिंक या वनवेब जैसे वैश्विक संगठनों को भारत में ग्राहकों तक पहुंचने के लिए रिटेल आउटलेट्स या वितरण नेटवर्क खड़ा नहीं करना पड़ेगा। दूसरी ओर, भारतीय टेलीकॉम कंपनियों को अरबों डॉलर खर्च करके अपने सैटेलाइट्स लॉन्च करने की आवश्यकता नहीं रहेगी।

इस नीति से हिमालय के दुर्गम पहाड़ी इलाकों, पूर्वोत्तर के राज्यों या समुद्र के बीच मौजूद नावों तक हाई-स्पीड ब्रॉडबैंड और कनेक्टिविटी आसानी से पहुंच सकेगी। स्थानीय ग्राहकों को अपने मौजूदा सिम कार्ड और प्लान के तहत आधुनिक सैटेलाइट आधारित सुविधाएं मिलने की क्षमता पैदा होगी।

वाहन पर स्थापित किया गया सैटेलाइट इंटरनेट डिश एंटीना
वाहन पर स्थापित किया गया सैटेलाइट इंटरनेट डिश एंटीना (Bidgee, CC BY 3.0, Wikimedia Commons)

स्रोत

  1. ht
  2. Wikipedia
  3. Wikipedia

टेक

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कंप्यूटर चिप पैकेज का क्लोज-अप दृश्य, जिसमें मुख्य GPU डाई और उसके चारों ओर व्यवस्थित हाई-बैंडविड्थ मेमोरी मॉड्यूल स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे हैं।

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