प्लांड ऑब्सेसेंस: आपके स्मार्टफोन और गैजेट्स जानबूझकर जल्दी क्यों खराब हो जाते हैं?
टेक्नोलॉजी कंपनियों की आर्थिक रणनीति और उत्पाद डिजाइन की वह चाल, जो ग्राहकों की जेब खाली करती है और पर्यावरण को ई-वेस्ट के ढेर में धकेलती है।

क्या आपने कभी गौर किया है कि आपका नया स्मार्टफोन केवल दो-तीन साल में ही धीमा क्यों पड़ जाता है या आपके महंगे वायरलेस ईयरफोन की बैटरी अचानक काम करना क्यों बंद कर देती है? यह कोई संयोग नहीं है, बल्कि टेक्नोलॉजी उद्योग की एक सुनियोजित रणनीति है जिसे 'प्लांड ऑब्सोलेसेंस' (planned obsolescence) कहा जाता है। यह एक ऐसी नीति है जिसमें उत्पादों को जानबूझकर सीमित आयु के साथ डिज़ाइन किया जाता है, ताकि ग्राहकों को कम समय में नया मॉडल खरीदने के लिए मजबूर होना पड़े। विकिपीडिया की रिपोर्ट के अनुसार, इस रणनीति का मुख्य उद्देश्य बार-बार की जाने वाली खरीदारी के बीच के समय को कम करके लंबी अवधि में बिक्री की मात्रा में वृद्धि करना है।
यह अवधारणा नई नहीं है, लेकिन आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स में यह अत्यंत जटिल हो गई है। बिजनेसलाइन पत्रिका की रिपोर्ट के अनुसार, स्मार्टफोन, लैपटॉप और स्मार्टवॉच जैसे उपकरण अब ऐसे पदार्थों से बने हैं जिनकी मरम्मत करना कठिन या आर्थिक रूप से किफायती नहीं है। जब कोई उपकरण खराब होता है, तो ग्राहक के पास उसे फेंक देने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। यह प्रक्रिया न केवल ग्राहकों के पैसे की बर्बादी करती है, बल्कि पर्यावरण के लिए भी बड़ा खतरा पैदा करती है, क्योंकि इन उपकरणों में पारा (mercury) और आर्सेनिक (arsenic) जैसे जहरीले पदार्थ होते हैं जो मिट्टी और पानी को प्रदूषित करते हैं।

प्लांड ऑब्सोलेसेंस का इतिहास काफी पुराना है। 1924 में जब अमेरिकी ऑटोमोबाइल बाजार संतृप्ति के बिंदु पर पहुंच गया था, तब जनरल मोटर्स के कार्यकारी अल्फ्रेड पी. स्लोन जूनियर ने हर साल मॉडल में बदलाव करने का प्रस्ताव रखा था। इसका उद्देश्य ग्राहकों को हर साल नई कार खरीदने के लिए लुभाना था। 1932 में बर्नार्ड लंदन ने आर्थिक मंदी को दूर करने के लिए कानूनी रूप से उत्पादों की आयु को सीमित करने का प्रस्ताव रखा था। हालांकि, यह शब्द 1954 में औद्योगिक डिजाइनर ब्रूक्स स्टीवंस द्वारा लोकप्रिय बनाया गया था। स्टीवंस के अनुसार, यह ग्राहक के मन में ऐसी इच्छा जगाने की कला है कि वह जरूरत से थोड़ा पहले, थोड़ा नया और थोड़ा बेहतर उत्पाद खरीदे।
इस रणनीति के कई प्रकार हैं, जिनमें 'कंट्राइव्ड ड्यूरेबिलिटी' (contrived durability) सबसे सामान्य है। इसमें उत्पाद को जानबूझकर कमजोर सामग्री से बनाया जाता है ताकि वह जल्दी खराब हो जाए। उदाहरण के लिए, खिलौनों में धातु के बजाय सस्ते प्लास्टिक के गियर्स का उपयोग करना या स्क्रू में नरम धातु का उपयोग करना, जिससे सामान्य उपयोग में भी वे टूट जाते हैं। स्मार्टफोन और अन्य हैंडहेल्ड इलेक्ट्रॉनिक्स की छोटी आयु निरंतर उपयोग, नाजुक बैटरी और आसानी से नुकसान झेल सकने वाली डिज़ाइन का परिणाम है।
आधुनिक गैजेट्स में बैटरी 'प्लांड ऑब्सोलसेंस' (योजनाबद्ध अप्रचलन) का सबसे बड़ा हथियार है। एप्पल के आईफोन से शुरू हुई यह प्रथा अब लगभग सभी कंपनियों ने अपना ली है, जिसमें बैटरी को उपकरण के अंदर स्थायी रूप से सील कर दिया जाता है। विकिपीडिया के डेटा के अनुसार, यह डिज़ाइन उपकरण को पतला बनाने में मदद करती है, लेकिन उपभोक्ता के लिए बैटरी बदलना असंभव बना देती है। अक्सर बैटरी को मजबूत गोंद (एडहेसिव) से चिपकाया जाता है, और उसे निकालने का प्रयास करने पर मुख्य सर्किट बोर्ड के क्षतिग्रस्त होने का जोखिम रहता है। यूरोपीय संघ ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाया है और 2026 से सभी इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में ऐसी डिज़ाइन अनिवार्य बनाने का निर्णय लिया है जिससे उपभोक्ता स्वयं बैटरी बदल सकें।
मरम्मत रोकना (प्रिवेंशन ऑफ रिपेयर्स) एक और चतुर रणनीति है। कंपनियां अक्सर ऐसे स्क्रू का उपयोग करती हैं जिन्हें सामान्य उपकरणों से नहीं खोला जा सकता, जैसे कि एप्पल के 'पेंटालोब' (pentalobe) स्क्रू। इसके अलावा, यदि कोई तीसरा पक्ष (थर्ड-पार्टी) उपकरण की मरम्मत करता है, तो सॉफ्टवेयर के माध्यम से उस उपकरण को लॉक कर दिया जाता है। कैनन और एचपी जैसी कंपनियों के प्रिंटर में ऐसी स्मार्ट चिप्स होती हैं जो स्याही बची होने के बावजूद कार्ट्रिज को बेकार घोषित कर देती हैं। इसे 'प्रोग्राम्ड ऑब्सोलसेंस' कहा जाता है, जहां किसी यांत्रिक खराबी के बिना केवल सॉफ्टवेयर द्वारा उत्पाद को बंद कर दिया जाता है।
- डिजाइन चरणउत्पाद को जानबूझकर कमजोर सामग्री या सील की गई बैटरी के साथ डिजाइन किया जाता है।
- सूचना की असमानताकंपनी जानती है कि उत्पाद कब खराब होगा, लेकिन ग्राहक को उसकी टिकाऊपन के बारे में अंधेरे में रखा जाता है।
- मरम्मत में बाधाविशेष स्क्रू, गोंद और सॉफ्टवेयर लॉक द्वारा बाहरी रिपेयरिंग को असंभव बनाया जाता है।
- नई खरीदरिपेयरिंग का खर्च नए उपकरण जितना ही रखकर ग्राहक को नया मॉडल खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है।
आर्थिक दृष्टिकोण से देखें तो, प्लांड ऑब्सोलसेंस तभी सफल होता है जब बाजार में गिने-चुने निर्माता हों, जिसे 'ओलिगोपोली' (अल्पाधिकार) कहा जाता है। यहां निर्माता के पास सूचना का लाभ (इन्फॉर्मेशन एसिमेट्री) होता है; उसे पता होता है कि उत्पाद कितना चलेगा, जबकि उपभोक्ता अनजान होता है। जब बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ती है, तो उत्पादों की आयु भी बढ़ती है। उदाहरण के लिए, 1960 और 70 के दशक में जब जापानी कारों ने अमेरिकी बाजार में प्रवेश किया, तब उनकी टिकाऊपन को देखकर अमेरिकी कंपनियों को भी मजबूत कारें बनाने के लिए मजबूर होना पड़ा था।
मनोवैज्ञानिक ऑब्सोलसेंस (साइकोलॉजिकल ऑब्सोलसेंस) उपभोक्ता के मन के साथ खेला जाने वाला एक खेल है। वेंस पैकर्ड की पुस्तक 'द वेस्ट मेकर्स' के अनुसार, मार्केटिंग के जरिए उपभोक्ता को यह समझाया जाता है कि उसका वर्तमान उपकरण पुराना हो गया है। नए मॉडल को स्टेटस सिंबल के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। अक्सर नए फोन के साथ ऐसी एक्सेसरीज लॉन्च की जाती हैं जो पुराने मॉडल के साथ संगत नहीं होतीं, जिसके कारण उपभोक्ता को पूरा इकोसिस्टम बदलना पड़ता है।
| बाधा का प्रकार | उदाहरण | असर |
|---|---|---|
| यांत्रिक (Mechanical) | प्लास्टिक गियर्स, नरम स्क्रू | तेजी से घिसाव और टूट-फूट |
| डिजाइन (Design) | सील की गई बैटरी, गोंद | बैटरी बदलना असंभव हो जाता है |
| सॉफ्टवेयर (Software) | स्मार्ट चिप्स, सॉफ्टवेयर अपडेट | उपकरण को जानबूझकर धीमा करना |
| कानूनी (Legal) | कॉपीराइट मैनुअल | स्वतंत्र रिपेयर करने वालों को जानकारी न मिलना |
इस रणनीति का सबसे भयावह परिणाम ई-वेस्ट (e-waste) है। 2022 में वैश्विक स्तर पर 62 मिलियन टन ई-वेस्ट पैदा हुआ था, जिसके 2030 तक 82 मिलियन टन तक पहुंचने का अनुमान है। इतना कचरा 1 मिलियन ट्रकों को भर सकता है, जो पृथ्वी की भूमध्य रेखा को घेरने के लिए पर्याप्त है। आश्चर्य की बात यह है कि इसमें से केवल 22.3% कचरे का ही आधिकारिक तौर पर पुनर्चक्रण (recycling) होता है। यूएनईपी (UNEP) की रिपोर्ट के अनुसार, भारत जैसे देशों में अगले दशक में ई-वेस्ट की मात्रा 500% तक बढ़ सकती है।

विकसित देश अक्सर इस ई-वेस्ट को पुनर्चक्रण के नाम पर भारत, चीन और अफ्रीका के देशों में भेज देते हैं, जो वास्तव में जहरीले कचरे का डंपिंग ग्राउंड बन जाते हैं। हालांकि, इस कचरे में मौजूद सोना, चांदी और तांबा जैसी धातुओं का मूल्य वार्षिक $62 बिलियन है, लेकिन अनुचित पुनर्चक्रण पद्धतियों के कारण यह संपत्ति बर्बाद हो जाती है और श्रमिकों के स्वास्थ्य को गंभीर नुकसान पहुंचता है।
મિલિયન ટન
अब दुनिया भर में 'राइट टू रिपेयर' (Right to Repair) आंदोलन जोर पकड़ रहा है। ऑस्ट्रेलिया की फेडरल कोर्ट ने एप्पल पर 9 मिलियन ऑस्ट्रेलियन डॉलर का जुर्माना लगाया था क्योंकि कंपनी ने ग्राहकों को उनके मरम्मत के अधिकारों के बारे में गुमराह किया था। यूरोपीय संघ अब ऐसे कानून ला रहा है जिसमें उत्पादों पर 'रिपेरेबिलिटी स्कोर' (reparability score) देना होगा, ताकि ग्राहक खरीदने से पहले जान सके कि वह वस्तु भविष्य में रिपेयर हो सकेगी या नहीं।
अंत में, प्लांट ऑब्सोलेसेंस (planned obsolescence) केवल कंपनियों का लालच नहीं है, बल्कि हमारी वर्तमान 'उत्पादन करो और उपयोग करो' (produce-and-consume) प्रणाली का परिणाम है। जब तक ग्राहक टिकाऊपन के बजाय केवल नए फीचर्स के पीछे भागेंगे, तब तक कंपनियां इस रणनीति को जारी रखेंगी। पर्यावरण और अपनी जेब को बचाने के लिए ग्राहकों को अब जागरूक होने और रिपेयर किए जा सकने वाले उत्पादों की मांग करने की आवश्यकता है।

