ब्रह्मांड के अंधकार की तस्वीर: इवेंट होराइजन टेलीस्कोप और ब्लैक होल की फोटोग्राफी के पीछे का विज्ञान
पृथ्वी के आकार के आभासी टेलीस्कोप की मदद से वैज्ञानिकों ने प्रकाश को भी निगल लेने वाले ब्लैक होल की तस्वीर कैसे ली, इसकी तकनीकी और वैज्ञानिक व्याख्या।

ब्रह्मांड के सबसे रहस्यमय पदार्थों में ब्लैक होल (black hole) सबसे आगे हैं। ब्लैक होल इतने शक्तिशाली होते हैं कि उनका गुरुत्वाकर्षण प्रकाश को भी बाहर नहीं निकलने देता। दशकों तक ब्लैक होल केवल गणितीय समीकरणों और कल्पनाओं तक सीमित थे, लेकिन 10 अप्रैल, 2019 को मानव जाति ने पहली बार ब्लैक होल की वास्तविक तस्वीर देखी। यह ऐतिहासिक उपलब्धि इवेंट होराइजन टेलीस्कोप (Event Horizon Telescope - EHT) द्वारा प्राप्त की गई थी। EHT कोई एक टेलीस्कोप नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया में फैले रेडियो टेलीस्कोपों का एक शक्तिशाली नेटवर्क है, जो मिलकर पृथ्वी के आकार का एक आभासी टेलीस्कोप बनाता है।
इस प्रोजेक्ट का मुख्य उद्देश्य ब्लैक होल की 'इवेंट होराइजन' (event horizon) यानी घटना क्षितिज की तस्वीर लेना था। इवेंट होराइजन ब्लैक होल के आसपास की वह सीमा है, जिसके अंदर गई कोई भी वस्तु कभी वापस नहीं आ सकती। EHT ने मेसियर 87 (Messier 87) नामक आकाशगंगा के केंद्र में स्थित अति-विशाल ब्लैक होल (supermassive black hole) पर ध्यान केंद्रित किया था। यह ब्लैक होल पृथ्वी से करोड़ों प्रकाश वर्ष दूर होने के बावजूद, वैज्ञानिक इसके आसपास के प्रकाश के वलय को पकड़ने में सफल रहे। इस सफलता के पीछे 'वेरी लॉन्ग बेसलाइन इंटरफेरोमेट्री' (VLBI) नामक जटिल पद्धति जिम्मेदार है।

वेरी लॉन्ग बेसलाइन इंटरफेरोमेट्री (VLBI) कैसे काम करती है?
VLBI रेडियो खगोल विज्ञान की एक ऐसी पद्धति है जिसमें पृथ्वी पर अलग-अलग स्थानों पर स्थित अनेक रेडियो टेलीस्कोप एक साथ एक ही खगोलीय पिंड का अवलोकन करते हैं। जब इन सभी टेलीस्कोपों के डेटा को मिलाया जाता है, तो यह एक ऐसे टेलीस्कोप के रूप में काम करता है जिसका आकार दो सबसे दूर स्थित टेलीस्कोपों के बीच की दूरी के बराबर होता है। इस दूरी को 'बेसलाइन' (baseline) कहा जाता है। EHT के मामले में, यह बेसलाइन पृथ्वी के व्यास जितनी बड़ी थी, जिसके कारण इसकी रिज़ॉल्यूशन (resolution) यानी विवरण देखने की क्षमता अभूतपूर्व हो गई थी।
प्रत्येक टेलीस्कोप खगोलीय पिंड से आने वाली रेडियो तरंगों को ग्रहण करता है। ये तरंगें अत्यंत कमजोर होती हैं और उन्हें सटीकता से दर्ज करने के लिए प्रत्येक टेलीस्कोप के पास अपनी अत्यंत सटीक परमाणु घड़ी (atomic clock) होती है, जिसे हाइड्रोजन मेज़र (hydrogen maser) कहा जाता है। यह घड़ी जीपीएस (GPS) टाइम स्टैंडर्ड के साथ जुड़ी होती है। जब रेडियो सिग्नल टेलीस्कोप पर पहुँचता है, तो उसके साथ उस समय का सटीक रिकॉर्ड भी लिया जाता है। इस डेटा को डिजिटल रूप में परिवर्तित करके हार्ड ड्राइव में संग्रहित किया जाता है।
- सिग्नल ग्रहणविश्वभर के रेडियो टेलीस्कोप्स एकसाथ ब्लैक होल से आने वाले रेडियो तरंगों को झेलते हैं।
- समय की नोंदप्रत्येक टेलीस्कोप परमाणु घड़ी का उपयोग करके सिग्नल पहुँचने के सटीक समय की नोंद लेता है।
- डेटा संग्रहविशाल मात्रा में डेटा को हार्ड ड्राइव्स में संग्रहित किया जाता है और विमान द्वारा लैब में भेजा जाता है।
- सुपरकंप्यूटिंगसुपरकंप्यूटर्स अलग-अलग टेलीस्कोप्स के डेटा को समय अनुसार एक-दूसरे के साथ जोड़ते हैं (Correlation)।
- तस्वीर निर्माणजटिल गणितीय एल्गोरिदम्स का उपयोग करके डेटा को दृश्यमान तस्वीर में रूपांतरित किया जाता है।
डेटा का पहाड़ और 'स्नीकरनेट' की आवश्यकता
EHT द्वारा एकत्रित किया जाने वाला डेटा इतना विशाल होता है कि उसे इंटरनेट के माध्यम से भेजना असंभव है। 2017 के अवलोकन अभियान के दौरान, दक्षिण ध्रुव (South Pole) पर स्थित टेलीस्कोप से लेकर हवाई और मेक्सिको तक के टेलीस्कोपों ने पेटाबाइट्स (petabytes) डेटा एकत्रित किया था। इस डेटा से भरी हार्ड ड्राइव्स को विमान द्वारा केंद्रीय प्रयोगशालाओं में भेजा जाता है। इस पद्धति को मजाक में 'स्नीकरनेट' (sneakernet) कहा जाता है, क्योंकि डेटा तारों के जरिए नहीं बल्कि भौतिक रूप से यात्रा करता है।
विशेष रूप से दक्षिण ध्रुव टेलीस्कोप का डेटा प्राप्त करने में बड़ी कठिनाई होती है। वहां अप्रैल से अक्टूबर के दौरान सर्दियों में कोई उड़ान नहीं भर सकती। 2017 के डेटा के लिए भी वैज्ञानिकों को दिसंबर तक इंतजार करना पड़ा था, जब दक्षिण ध्रुव से हार्ड ड्राइव्स की खेप पहुंची थी। इस सभी डेटा को अमेरिका की MIT हेस्टैक ऑब्जर्वेटरी और जर्मनी की मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर रेडियो एस्ट्रोनॉमी भेजा जाता है। वहां 800 के करीब CPU वाले सुपरकंप्यूटर इस डेटा का विश्लेषण करते हैं।
| विवरण | मेसियर 87 (M87*) | सेजिटेरियस A* (Sgr A*) |
|---|---|---|
| स्थान | M87 आकाशगंगा | मिल्की वे (हमारी आकाशगंगा) |
| अंतर | 5.5 करोड़ प्रकाशवर्ष | 27,000 प्रकाशवर्ष |
| द्रव्यमान (सूर्य के गुणांक में) | 6.5 अरब | आशरे 40 लाख |
| इवेंट होराइजन व्यास | 40 अरब किमी | M87* से काफी छोटा |
डेटा से तस्वीर बनाने की जटिल प्रक्रिया
जब सभी हार्ड ड्राइव्स केंद्रीय स्थान पर पहुंच जाती हैं, तब 'कोरिलेशन' (correlation) नामक प्रक्रिया शुरू होती है। सुपरकंप्यूटर प्रत्येक टेलीस्कोप के डेटा की तुलना उनकी परमाणु घड़ियों के समय के अनुसार एक-दूसरे से करते हैं। पृथ्वी के वायुमंडल में होने वाले परिवर्तनों और टेलीस्कोप की दूरी के कारण सिग्नल पहुंचने में नैनोसेकंड का अंतर हो सकता है, जिसे सुधारना अत्यंत आवश्यक है। इसके लिए 'क्लोजर फेज' (closure phase) नामक तकनीक का उपयोग किया जाता है, जिसे 1950 के दशक में रोजर जेनिसन द्वारा विकसित किया गया था।
ब्लैक होल की अंतिम तस्वीर बनाने के लिए गणितीय एल्गोरिदम (algorithms) का उपयोग किया जाता है। EHT की टीम ने परिणामों की विश्वसनीयता जांचने के लिए चार स्वतंत्र टीमें बनाई थीं। इन टीमों ने CLEAN और CHIRP जैसे अलग-अलग एल्गोरिदम का उपयोग किया था। CHIRP एल्गोरिदम कैथरीन बाउमैन और उनकी टीम द्वारा विकसित किया गया था। 2023 में, वैज्ञानिकों ने PRIMO नामक नए एल्गोरिदम का उपयोग करके 2017 के डेटा से ही अधिक स्पष्ट और शार्प तस्वीरें भी बनाई हैं।
M87* और सैजिटेरियस A*: दो अलग लक्ष्य
EHT ने मुख्य रूप से दो ब्लैक होल पर ध्यान केंद्रित किया है। पहला M87* है, जो मेसियर 87 आकाशगंगा के केंद्र में है। यह पृथ्वी से 5.5 करोड़ प्रकाश वर्ष दूर है और इसका द्रव्यमान सूर्य से 6.5 अरब गुना अधिक है। इसके इवेंट होराइजन का व्यास लगभग 40 अरब किलोमीटर है। 2019 में जारी तस्वीर में दिखाई देने वाला नारंगी वलय वास्तव में ब्लैक होल के चारों ओर घूमती अत्यंत गर्म गैस है, जो प्रकाश की गति के करीब की रफ्तार से चलती है।
दूसरा लक्ष्य हमारी अपनी आकाशगंगा, मिल्की वे (Milky Way) के केंद्र में स्थित ब्लैक होल सैजिटेरियस A* (Sagittarius A*) है। यह पृथ्वी से 27,000 प्रकाशवर्ष दूर है। हालांकि यह M87* से काफी छोटा है, लेकिन पृथ्वी के करीब होने के कारण आकाश में इसका आकार लगभग समान दिखाई देता है। 12 मई, 2022 को वैज्ञानिकों ने सैजिटेरियस A* की पहली तस्वीर जारी की थी। इन दोनों ब्लैक होल के आकार में बड़ा अंतर होने के बावजूद, उनकी इवेंट होराइजन के पास के दृश्य में आश्चर्यजनक समानता देखी गई है, जो अल्बर्ट आइंस्टीन के सामान्य सापेक्षता के सिद्धांत (General Relativity) का समर्थन करती है।

विज्ञान के लिए इन तस्वीरों का महत्व
ब्लैक होल की ये तस्वीरें केवल फोटोग्राफ नहीं हैं, बल्कि भौतिकी के मूलभूत नियमों की कसौटी हैं। आइंस्टीन के सिद्धांत के अनुसार, ब्लैक होल के प्रचंड गुरुत्वाकर्षण के कारण उसके आसपास प्रकाश मुड़ता है और एक 'शैडो' (shadow) यानी परछाई बनाता है। EHT द्वारा ली गई तस्वीरों में यह परछाई बिल्कुल वैसी ही दिखाई दी जैसी गणित द्वारा भविष्यवाणी की गई थी। इन अवलोकनों ने साबित किया कि अत्यधिक चरम स्थितियों में भी आइंस्टीन का सिद्धांत सही साबित होता है।
इसके अलावा, मार्च 2021 में M87* की पोलराइज्ड (polarized) यानी ध्रुवीकृत प्रकाश में तस्वीर ली गई थी। यह तस्वीर ब्लैक होल के आसपास के चुंबकीय क्षेत्रों के बारे में जानकारी देती है। वैज्ञानिक अब समझ सकते हैं कि ब्लैक होल कैसे अपने आसपास के पदार्थों को निगल जाता है और कैसे उनमें से शक्तिशाली जेट (jets) बाहर फेंके जाते हैं। सेंटोरस A (Centaurus A) जैसी अन्य आकाशगंगाओं के जेट की भी EHT द्वारा 1.3 mm तरंगदैर्घ्य पर अत्यंत स्पष्ट तस्वीरें ली गई हैं।

भविष्य की योजनाएं और चुनौतियां
EHT प्रोजेक्ट लगातार विकसित हो रहा है। 2018 से, टेलीस्कोप नेटवर्क 870 μm (345 GHz) की तरंगदैर्घ्य पर अवलोकन करने की क्षमता रखता है, जो 19 माइक्रोआर्कसेकंड का रिज़ॉल्यूशन देता है। यह अब तक के किसी भी ज़मीन आधारित टेलीस्कोप का सर्वश्रेष्ठ रिज़ॉल्यूशन है। भविष्य में, वैज्ञानिक इस नेटवर्क में और अधिक टेलीस्कोप जोड़ने और छोटी तरंगदैर्घ्य पर अवलोकन करने की योजना बना रहे हैं ताकि ब्लैक होल के 'वीडियो' भी बनाए जा सकें।
अंतरिक्ष आधारित VLBI (Space VLBI) भी एक नया रास्ता खोल रहा है। रूस के स्पेक्ट्र-आर (Spektr-R) जैसे उपग्रहों ने पृथ्वी पर स्थित टेलीस्कोपों के साथ मिलकर काम किया है, जिससे पृथ्वी के व्यास से भी बड़ी बेसलाइन प्राप्त हुई है। इससे 8 माइक्रोआर्कसेकंड जितना सूक्ष्म रिज़ॉल्यूशन प्राप्त करना संभव हुआ है। जैसे-जैसे अधिक टेलीस्कोप और अधिक शक्तिशाली एल्गोरिदम जुड़ते जाएंगे, ब्रह्मांड के इन अंधकारमय राक्षसों के बारे में हमारी समझ और स्पष्ट होती जाएगी।


