ब्रह्मांड के आदिकाल के पदचिह्न खोजता हबल का 'कॉस्मिक ओरिजिन्स स्पेक्ट्रोग्राफ': विज्ञान और प्रौद्योगिकी की अद्भुत जुगलबंदी
हबल स्पेस टेलीस्कोप का 'कॉस्मिक ओरिजिन्स स्पेक्ट्रोग्राफ' (COS) किस प्रकार अल्ट्रावायलेट किरणों की मदद से ब्रह्मांड के रहस्यों को सुलझाता है, इसकी तकनीकी और वैज्ञानिक व्याख्या।

हबल स्पेस टेलीस्कोप (Hubble Space Telescope) मानव इतिहास में विज्ञान का एक ऐसा उपकरण है जिसने ब्रह्मांड के प्रति हमारी समझ को पूरी तरह से बदल दिया है। 1990 में पृथ्वी की निचली कक्षा में लॉन्च किया गया यह टेलीस्कोप आज भी कार्यरत है और खगोल विज्ञान के लिए एक महत्वपूर्ण अनुसंधान उपकरण साबित हुआ है। हबल टेलीस्कोप का नाम प्रसिद्ध खगोलशास्त्री एडविन हबल के नाम पर रखा गया है। इस टेलीस्कोप की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह पृथ्वी के वायुमंडल के बाहर रहकर अवलोकन करता है, जिसके कारण इसे वायुमंडल के अवरोध के बिना अत्यंत स्पष्ट छवियां मिलती हैं। हबल के अनेक उपकरणों में से एक अत्यंत शक्तिशाली उपकरण यानी 'कॉस्मिक ओरिजिन्स स्पेक्ट्रोग्राफ' (Cosmic Origins Spectrograph - COS) है। इस उपकरण को मई 2009 में सर्विसिंग मिशन 4 (STS-125) के दौरान हबल में स्थापित किया गया था।
स्पेक्ट्रोग्राफ (spectrograph) एक ऐसा उपकरण है जो प्रकाश को उसके घटक रंगों या तरंगदैर्घ्य में विभाजित करता है, ठीक वैसे ही जैसे प्रिज्म सूर्य के प्रकाश को इंद्रधनुष के रंगों में विभाजित करता है। इस प्रक्रिया को स्पेक्ट्रोस्कोपी (spectroscopy) कहा जाता है। खगोलशास्त्रियों के लिए यह पद्धति अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह दूर के तारों और आकाशगंगाओं के तापमान, घनत्व, रासायनिक संरचना और गति के बारे में ऐसी जानकारी देती है जो केवल फोटोग्राफी द्वारा प्राप्त करना असंभव है। COS विशेष रूप से अल्ट्रावायलेट (ultraviolet - UV) प्रकाश के अध्ययन के लिए बनाया गया है। अल्ट्रावायलेट प्रकाश प्रकाश का वह प्रकार है जिसकी तरंगदैर्घ्य दृश्य प्रकाश से छोटी होती है और इसे मानव आंख से नहीं देखा जा सकता है। पृथ्वी का वायुमंडल अधिकांश अल्ट्रावायलेट किरणों को अवशोषित कर लेता है, इसलिए अंतरिक्ष में रहकर ही इन किरणों का सटीक अध्ययन संभव हो पाता है।

हबल और COS के पीछे का इतिहास और संघर्ष
अंतरिक्ष में टेलीस्कोप रखने का विचार सर्वप्रथम 1923 में हरमन ओबर्थ द्वारा प्रस्तुत किया गया था। हालांकि, इस दिशा में गंभीर वैज्ञानिक नींव 1946 में खगोलशास्त्री लायमन स्पिट्जर (Lyman Spitzer) द्वारा रखी गई थी। उन्होंने अपने पेपर में समझाया था कि पृथ्वी के वायुमंडल के बाहर टेलीस्कोप रखने के दो मुख्य लाभ हैं: पहला, वायुमंडल की अस्थिरता के कारण तारे जो टिमटिमाते हैं, वह समस्या दूर हो जाए और अत्यंत बारीक विवरण देखे जा सकें। दूसरा, अल्ट्रावायलेट और इन्फ्रारेड प्रकाश का अध्ययन किया जा सके जो वायुमंडल में अवशोषित हो जाते हैं। इस सपने को साकार करने में नैन्सी ग्रेस रोमन (Nancy Grace Roman) का योगदान भी अतुल्य है, जिन्हें 'मदर ऑफ हबल' के रूप में जाना जाता है। उन्होंने 1970 के दशक में इस परियोजना के लिए फंड जुटाने और वैज्ञानिक मानक तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
हबल टेलीस्कोप के निर्माण और लॉन्चिंग में अनेक अवरोध आए थे। 1974 में बजट कटौती के कारण प्रोजेक्ट का फंड रद्द कर दिया गया था। हालांकि, खगोलशास्त्रियों की देशव्यापी लॉबिंग और नासा के अधिकारियों की रणनीतिक प्रस्तुति के कारण फंड फिर से मंजूर हुआ। शुरुआत में टेलीस्कोप के दर्पण का व्यास 3 मीटर रखने की योजना थी, लेकिन खर्च घटाने के लिए इसे 2.4 मीटर कर दिया गया। 1990 में लॉन्च होने के बाद पता चला कि हबल के मुख्य दर्पण में खामी थी, जिसे 'स्फेरिकल एबेरेशन' (spherical aberration) कहा जाता है। इस खामी के कारण छवियां धुंधली आती थीं। 1993 में अंतरिक्ष यात्रियों ने सर्विसिंग मिशन के जरिए इस खामी को सुधारा था। COS उपकरण हबल के पांचवें और अंतिम सर्विसिंग मिशन का हिस्सा था, जिसने हबल की अल्ट्रावायलेट देखने की क्षमता में कई गुना वृद्धि की।
- प्रकाश का प्रवेशदूर के पदार्थों से आने वाला प्रकाश PSA या BOA छिद्र के माध्यम से उपकरण में प्रवेश करता है।
- डिफ्रैक्शन और करेक्शनप्रकाश एक विशेष ग्रेटिंग पर पड़ता है जो प्रकाश को विभाजित करता है और हबल के दर्पण की खामियों को सुधारता है।
- डिटेक्शनविभाजित प्रकाश FUV या NUV डिटेक्टर पर पड़ता है, जहाँ फोटॉन्स को इलेक्ट्रिकल सिग्नल में बदल दिया जाता है।
- डेटा प्रोसेसिंगये सिग्नल पृथ्वी पर भेजे जाते हैं जहाँ वैज्ञानिक स्पेक्ट्रम का विश्लेषण करते हैं।
COS की आर्किटेक्चर और कार्यपद्धति
कॉस्मिक ओरिजिन्स स्पेक्ट्रोग्राफ हबल के 'एक्सियल इंस्ट्रूमेंट बे' (axial instrument bay) में स्थापित है। इसे पहले के COSTAR नामक उपकरण की जगह लगाया गया है। COS की रचना अत्यंत सटीकता से की गई है ताकि यह धुंधले और दूर के पदार्थों से आने वाले अल्ट्रावायलेट प्रकाश को पकड़ सके। यह उपकरण मुख्य रूप से दो चैनलों में विभाजित है: फार अल्ट्रावायलेट (Far Ultraviolet - FUV) और नियर अल्ट्रावायलेट (Near Ultraviolet - NUV)। FUV चैनल 90 से 205 नैनोमीटर (nm) की तरंगदैर्ध्य को कवर करता है, जबकि NUV चैनल 170 से 320 नैनोमीटर की तरंगदैर्ध्य पर काम करता है।
| चैनल | तरंग दैर्ध्य (nm) |
|---|---|
| Far Ultraviolet (FUV) | 90 - 205 |
| Near Ultraviolet (NUV) | 170 - 320 |
COS की डिजाइन में एक क्रांतिकारी दृष्टिकोण अपनाया गया है, विशेष रूप से FUV चैनल में। अल्ट्रावायलेट प्रकाश जब किसी भी दर्पण या लेंस पर पड़ता है, तब उसका बड़ा हिस्सा अवशोषित हो जाता है या व्यर्थ चला जाता है। इस नुकसान को घटाने के लिए COS में 'सिंगल ऑप्टिक' (single optic) डिजाइन का उपयोग किया गया है। इसका अर्थ यह है कि हबल के मुख्य दर्पण से आने वाला प्रकाश सीधे ही एक विशिष्ट तरीके से बनाए गए 'डिफ्रैक्शन ग्रेटिंग' (diffraction grating) पर पड़ता है। यह एक ही ऑप्टिकल भाग प्रकाश को विभाजित भी करता है, हबल के दर्पण की खामी को सुधारता है और प्रकाश को डिटेक्टर पर फोकस भी करता है। कम से कम दर्पणों का उपयोग करने के कारण COS पहले के उपकरणों की तुलना में काफी अधिक संवेदनशील बन गया है।
| विवरण | FUV चैनल | NUV चैनल |
|---|---|---|
| तरंग दैर्ध्य श्रेणी | 90-205 nm | 170-320 nm |
| डिटेक्टर प्रकार | माइक्रोचैनल प्लेट | MAMA डिटेक्टर |
| डिज़ाइन प्रकार | रोलैंड सर्कल | ज़र्नी-टर्नर |
| मुख्य उपयोग | दूर के गैस बादलों का अध्ययन | तारों और आकाशगंगाओं का इमेजिंग |
जब प्रकाश COS में प्रवेश करता है, तो वह दो छिद्रों (aperture) में से एक के माध्यम से अंदर जाता है: प्राइमरी साइंस एपर्चर (PSA) या ब्राइट ऑब्जेक्ट एपर्चर (BOA)। PSA का उपयोग सामान्य अवलोकनों के लिए किया जाता है, जबकि BOA में एक फिल्टर होता है जो अत्यधिक चमकीले पदार्थों के प्रकाश को 100 गुना कम कर देता है ताकि सेंसर को नुकसान न हो। FUV डिटेक्टर एक 'क्रॉस डिले लाइन माइक्रोचैनल प्लेट' (cross delay line microchannel plate) है, जिसका आकार 170x10 मिलीमीटर है। इस डिटेक्टर की सतह वक्र (curved) है ताकि यह स्पेक्ट्रोग्राफ के फोकल सरफेस के साथ बिल्कुल मेल खा सके। दूसरी ओर, NUV चैनल 'ज़र्नी-टर्नर' (Czerny-Turner) डिज़ाइन का उपयोग करता है, जिसमें प्रकाश को तीन अलग-अलग पट्टियों में विभाजित करके 25x25 मिलीमीटर के MAMA डिटेक्टर पर भेजा जाता है।


विज्ञान के लक्ष्य: आदि ब्रह्मांड की खोज
COS का मुख्य कार्य ब्रह्मांड के बड़े पैमाने के ढांचे (large scale structure) और आकाशगंगाओं के निर्माण का अध्ययन करना है। यह विशेष रूप से 'कॉस्मिक वेब' (Cosmic Web) को समझने में मदद करता है। कॉस्मिक वेब गैस और डार्क मैटर से बना एक विशाल जाल है जो पूरे ब्रह्मांड में फैला हुआ है। इस जाल में मौजूद अंतर-आकाशगंगा गैस (intergalactic gas) को सीधे देखना मुश्किल है, लेकिन जब दूर की आकाशगंगा या क्वासर (quasar) से आने वाला प्रकाश इस गैस से गुजरता है, तो वह गैस प्रकाश के कुछ हिस्से को अवशोषित कर लेती है। COS इस अवशोषित प्रकाश के पदचिह्नों का अध्ययन करके गैस के तापमान, घनत्व और रासायनिक संरचना को निर्धारित करता है।
इस प्रक्रिया में 'लायमन-अल्फा फॉरेस्ट' (Lyman-alpha forest) का अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब हाइड्रोजन गैस के बादलों से प्रकाश गुजरता है, तो स्पेक्ट्रम में अनेक अवशोषण रेखाएं (absorption lines) दिखाई देती हैं जो जंगल जैसी दिखती हैं। इससे यह जाना जा सकता है कि ब्रह्मांड में द्रव्य का वितरण कैसे हुआ है। इसके अलावा, COS द्वारा 'री-आयनाइजेशन' (reionization) की प्रक्रिया का भी अध्ययन किया जाता है। ब्रह्मांड के प्रारंभिक चरण में जब पहले तारे और आकाशगंगाएं बनीं, तब उन्होंने आसपास की गैस को कैसे आयनीकृत किया, यह समझने के लिए हीलियम गैस के अवशोषण का अध्ययन किया जाता है।
तारों के जीवनचक्र को समझने में भी COS महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह आकाशगंगा में मौजूद गर्म तारों, श्वेत वामन तारों (white dwarfs) और बाइनरी स्टार सिस्टम्स का अध्ययन करता है। जीवन के लिए आवश्यक रासायनिक तत्व जैसे कार्बन, नाइट्रोजन और ऑक्सीजन विशाल तारों में कैसे बने और सुपरनोवा विस्फोट के माध्यम से अंतरिक्ष में कैसे फैले, इसकी जानकारी भी COS के डेटा से मिलती है। यह सौरमंडल के ग्रहों के वातावरण और धूमकेतुओं की संरचना की जांच करने में भी सक्षम है।
तकनीकी विशिष्टताएं और तुलना
COS की क्षमता उसकी रिजॉल्विंग पावर (resolving power) और संवेदनशीलता में निहित है। इसकी रिजॉल्विंग पावर 1,550 से 24,000 के बीच है, जिसका अर्थ है कि यह प्रकाश की अत्यंत निकट स्थित तरंगदैर्घ्यों को भी अलग कर सकती है। हबल पर पहले से मौजूद 'स्पेस टेलीस्कोप इमेजिंग स्पेक्ट्रोग्राफ' (STIS) की तुलना में COS अल्ट्रावायलेट रेंज में कई गुना अधिक संवेदनशील है। STIS विस्तृत तरंगदैर्घ्य को कवर करता है, लेकिन COS विशेष रूप से धुंधले बिंदुवत पदार्थों (point sources) के लिए अनुकूलित (optimized) किया गया है।

लॉन्च के बाद के प्रदर्शन के अनुसार, COS की संवेदनशीलता अपेक्षा के अनुरूप ही रही है। FUV डिटेक्टर में बैकग्राउंड नॉइज़ (background noise) अत्यंत कम है, जो प्रति 1000 सेकंड में मात्र 0.16 काउंट्स है। इसका अर्थ यह है कि यह अत्यंत कमजोर संकेतों को भी स्पष्ट रूप से पकड़ सकता है। हालाँकि, हबल के मुख्य दर्पण में मौजूद पॉलिशिंग की छोटी त्रुटियों के कारण FUV का रिज़ॉल्यूशन अपेक्षा से थोड़ा कम रहा है, लेकिन NUV का रिज़ॉल्यूशन अपेक्षा से भी बेहतर देखा गया है।
निष्कर्ष और भविष्य
कॉस्मिक ओरिजिन्स स्पेक्ट्रोग्राफ केवल एक वैज्ञानिक उपकरण नहीं है, बल्कि यह ब्रह्मांड के अतीत में देखने की एक खिड़की है। यह हमें बताता है कि ब्रह्मांड का ढांचा कैसे बना और जिन तत्वों से हम बने हैं, वे तारों में कैसे पैदा हुए। हबल टेलीस्कोप के 2030 से 2040 तक कार्यरत रहने की संभावना है, और तब तक COS हमें ब्रह्मांड के रहस्यों को सुलझाने में मदद करता रहेगा। जैसे-जैसे जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप (JWST) इन्फ्रारेड में नए शोध कर रहा है, वैसे-वैसे COS की अल्ट्रावायलेट क्षमता उसकी पूरक बनकर खगोलशास्त्र के एक नए युग का निर्माण कर रही है। भारत जैसे देशों के लिए भी ऐसे शोध प्रेरणादायक हैं, क्योंकि ये विज्ञान और इंजीनियरिंग की पराकाष्ठा को दर्शाते हैं।


