जेम्स वेब स्पेस टेलिस्कोप: एक्सोप्लैनेट के वायुमंडल और जीवन की खोज में विज्ञान की नई छलांग
नासा का आधुनिक इन्फ्रारेड टेलिस्कोप पृथ्वी से 15 लाख किलोमीटर दूर स्थित रहकर सौरमंडल के बाहर के ग्रहों के वायुमंडल में पानी और गैसों की उपस्थिति तलाश रहा है।

खगोलशास्त्र के इतिहास में मानवजाति ने हमेशा से एक प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास किया है: क्या ब्रह्मांड में हम अकेले हैं? इस सवाल का वैज्ञानिक जवाब पाने के लिए नेशनल एरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (NASA), यूरोपियन स्पेस एजेंसी (ESA) और कनाडियन स्पेस एजेंसी (CSA) के संयुक्त उपक्रम के रूप में 'जेम्स वेब स्पेस टेलिस्कोप' (James Webb Space Telescope - JWST) की रचना की गई। २५ दिसंबर २०२१ के दिन फ्रेंच गुयाना के कौरू से एरियन ५ (Ariane 5) रॉकेट द्वारा लॉन्च किया गया यह टेलिस्कोप मानवजाति द्वारा अंतरिक्ष में भेजा गया सबसे बड़ा और शक्तिशाली उपकरण है।
इस टेलिस्कोप का नाम नासा के भूतपूर्व एडमिनिस्ट्रेटर जेम्स ई. वेब के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने मर्क्युरी, जेमिनी और अपोलो प्रोग्राम्स के दौरान १९६१ से १९६८ तक नासा का नेतृत्व किया था। नॉर्थ्रोप ग्रुमैन (Northrop Grumman) को मुख्य कॉन्ट्रैक्टर के रूप में रखने वाले इस प्रोजेक्ट का संचालन मैरीलैंड स्थित नासा गोडार्ड स्पेस फ्लाइट सेंटर द्वारा किया गया था, जबकि बाल्टीमोर स्थित स्पेस टेलिस्कोप साइंस इंस्टीट्यूट (STScI) इसका सक्रिय संचालन करता है। लगभग १० अरब यूएस डॉलर ($10 billion) के खर्च से तैयार हुए इस टेलिस्कोप ने जुलाई २०२२ में अपनी पहली तस्वीरें जारी की थीं।
ચોરસ મીટર
ब्रह्मांड में जीवन की खोज और स्पेस टेलिस्कोप की क्रांति
सौरमंडल के बाहर आए ग्रहों को 'एक्सोप्लैनेट' (exoplanet) कहा जाता है। प्रथम कन्फर्म हुए एक्सोप्लैनेट की खोज १९९२ में एक पल्सार तारे के आसपास हुई थी, जबकि १९९५ में सामान्य तारे की परिक्रमा करने वाले प्रथम ग्रह (51 Pegasi b) की खोज हुई थी। अक्टूबर २०२६ तक के आंकड़ों के अनुसार, वैज्ञानिकों ने ४,८३४ ग्रह मंडलों में ६,४४५ कन्फर्म हुए एक्सोप्लैनेट खोज निकाले हैं, जिनमें से १,०७० मंडलों में एक से अधिक ग्रह आए हुए हैं। अनुमान के मुताबिक, मिल्की वे (Milky Way) गैलेक्सी में आए सूर्य जैसे हर ५ में से १ तारे के पास पृथ्वी के आकार का ग्रह उसके 'हैबिटेबल जोन' (habitable zone) या गोल्डीलॉक्स जोन में आया हुआ है.
हैबिटेबल जोन यानी तारे से ऐसा निश्चित अंतर जहाँ तापमान ऐसा हो कि ग्रह की सतह पर तरल पानी अस्तित्व में रह सके। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि हमारी गैलेक्सी में २०० अरब तारों में से लगभग ११ अरब पृथ्वी जैसे संभावित वसाटयोग्य ग्रह हो सकते हैं, और यदि रेड ड्वार्फ (red dwarf) तारों को भी गिनती में लिया जाए तो यह संख्या ४० अरब तक पहुँच सकती है। इतनी विशाल संख्या वाले ग्रहों में से किस ग्रह पर जीवन पनप सकता है यह जानने के लिए उनके वायुमंडल का अध्ययन करना जरूरी है।
| विशेषता | हबल स्पेस टेलिस्कोप | जेम्स वेब स्पेस टेलिस्कोप |
|---|---|---|
| दर्पण का व्यास | २.४ मीटर | ६.५ मीटर |
| एकत्र करने का क्षेत्र | ४.० वर्ग मीटर | २५.४ वर्ग मीटर |
| तरंगदैर्ध्य स्पेक्ट्रम | ०.१ से २.५ μm (UV/दृश्य) | ०.६ से २८.५ μm (इन्फ्रारेड) |
| कार्यकारी तापमान | १५ °C (२८८ K) | -२२३ °C से कम (५० K) |
| कक्षा की स्थिति | पृथ्वी से ५५० किमी ऊँचाई | पृथ्वी से १५ लाख किमी (L2 पॉइंट) |
जेम्स वेब टेलिस्कोप: डिजाइन और भौतिक क्षमताएँ
जेम्स वेब टेलीस्कोप मुख्य रूप से इन्फ्रारेड एस्ट्रोनॉमी यानी पाररक्त तरंगों द्वारा खगोलीय पिंडों के अध्ययन के लिए डिज़ाइन किया गया है। हबल स्पेस टेलीस्कोप की तुलना में वेब का वजन आधा है, लेकिन इसका प्राथमिक दर्पण (primary mirror) ६.५ मीटर (२१ फीट) व्यास रखता है। यह दर्पण सोने की परत चढ़े १८ षट्कोणीय (hexagonal) बेरिलियम सेगमेंट से बना है। इसका कुल प्रकाश एकत्र करने का क्षेत्र २५.४ वर्ग मीटर है, जो हबल के २.४ मीटर दर्पण के ४.० वर्ग मीटर क्षेत्र से ६ गुना से भी अधिक है।
इन्फ्रारेड तरंगें दृश्य प्रकाश की तुलना में अधिक लंबी तरंग दैर्ध्य (wavelength) रखती हैं, इसलिए समान रिज़ॉल्यूशन प्राप्त करने के लिए बड़े दर्पण की आवश्यकता होती है। वेब टेलीस्कोप ०.६ से २८.५ माइक्रोमीटर तक की तरंग दैर्ध्य में अवलोकन करता है। इसी कारण यह हबल से १०० गुना अधिक धुंधले पिंड देख सकता है। इसके अलावा, ब्रह्मांड के विस्तार के कारण दूर के शुरुआती तारों का प्रकाश लंबी तरंग दैर्ध्य की ओर खिसक जाता है, जिसे 'रेडशिफ्ट' (redshift) कहते हैं। वेब z ≈ २० तक के रेडशिफ्ट वाले पिंड देख सकता है, जो बिग बैंग के मात्र १८ करोड़ वर्ष बाद के समय के हैं।
- १. ग्रह का संक्रमण (Transit)जब एक्सोप्लैनेट अपने मातृ तारे के सामने से गुजरता है, तो तारे का प्रकाश ग्रह के वायुमंडल से गुजरता है।
- २. इन्फ्रारेड प्रकाश का अवशोषणवायुमंडल में मौजूद पानी, कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन जैसे अणु विशिष्ट इन्फ्रारेड प्रकाश को अवशोषित कर लेते हैं।
- ३. स्पेक्ट्रम का विश्लेषणJWST के NIRSpec और NIRCam उपकरण इस प्रकाश की तरंगों का विश्लेषण करके स्पेक्ट्रम डेटा प्राप्त करते हैं।
- ४. गैसों की पहचानअवशोषित रेखाओं के ग्राफ से वैज्ञानिक ग्रह के वायुमंडल में मौजूद गैसों की सटीक उपस्थिति निर्धारित करते हैं।
एक्सोप्लैनेट के वायुमंडल की जांच कैसे होती है?
एक्सोप्लैनेट के वायुमंडल की जांच करने के लिए 'ट्रांजिट फोटोमेट्री' (transit photometry) और स्पेक्ट्रोस्कोपी (spectroscopy) पद्धतियों का उपयोग किया जाता है। जब कोई ग्रह अपने मातृ तारे के सामने से गुजरता है, तब तारे का थोड़ा प्रकाश ग्रह के वायुमंडल से गुजरकर पृथ्वी की ओर आता है। वायुमंडल में मौजूद विशिष्ट गैसें—जैसे कि जल वाष्प, कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और ओजोन—विशिष्ट इन्फ्रारेड तरंग दैर्ध्य के प्रकाश का अवशोषण करती हैं।
वेब टेलीस्कोप में मौजूद अत्याधुनिक उपकरण, जैसे कि NIRCam (Near Infrared Camera) और NIRSpec (Near Infrared Spectrograph), इस प्रकाश का विश्लेषण करके इसका स्पेक्ट्रम ग्राफ बनाते हैं। अवशोषित प्रकाश की रेखाओं के आधार पर वैज्ञानिक यह निश्चित रूप से कह सकते हैं कि उस ग्रह के वायुमंडल में कौन से रासायनिक घटक मौजूद हैं। पृथ्वी पर से जमीन आधारित टेलीस्कोप द्वारा यह अध्ययन करना कठिन है, क्योंकि पृथ्वी का अपना वायुमंडल इन्फ्रारेड प्रकाश के कई बैंड्स को अवशोषित कर लेता है और उसमें मौजूद पानी तथा कार्बन डाइऑक्साइड अवलोकनों में बाधा उत्पन्न करते हैं।

पृथ्वी से १५ लाख किलोमीटर दूर: एल२ पॉइंट और सनशील्ड
अपने उपकरणों द्वारा उत्सर्जित होने वाली गर्मी अवलोकनों में बाधा न बने, इसके लिए जेम्स वेब टेलीस्कोप को अत्यधिक ठंडा—५० केल्विन (-२२३ सेल्सियस) से कम तापमान पर—रखना आवश्यक है। इस उद्देश्य के लिए टेलीस्कोप को पृथ्वी से लगभग १५ लाख किलोमीटर (९,३०,००० मील) दूर स्थित सूर्य-पृथ्वी L2 'लैग्रेन्ज पॉइंट' (Lagrange point) पर स्थापित किया गया है। L2 अंतरिक्ष में वह स्थान है जहाँ सूर्य और पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण बल का संतुलन रहता है, जिससे उपग्रह पृथ्वी के साथ-साथ ही सूर्य की परिक्रमा कर सके।
टेलिस्कोप को सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा की गर्मी तथा प्रकाश से बचाने के लिए ५ परतों वाली एक विशाल 'सनशील्ड' (sunshield) दी गई है। यह सनशील्ड काप्टोन ई (Kapton E) फिल्म से बनी है जिस पर एल्युमिनियम और सिलिकॉन की परत चढ़ाई गई है। इसका आकार १४.१६२ मीटर × २१.१९७ मीटर है और इसका सन प्रोटेक्शन फैक्टर (SPF) १०,०००,००० है। रॉकेट के ४.५७ मीटर व्यास वाले हिस्से में समाने के लिए इस सनशील्ड को १२ बार मोड़कर पैक किया गया था, जिसे अंतरिक्ष में जाकर सफलतापूर्वक खोला गया था।

हबल और वेब की तुलना तथा भविष्य की संभावनाएँ
हबल टेलिस्कोप पृथ्वी से मात्र ५५० किलोमीटर की ऊँचाई पर चक्कर लगाता है और उसका दर्पण १५ डिग्री सेल्सियस तापमान पर रहता है, जिससे वह इन्फ्रारेड क्षेत्र में गहराई से देख नहीं सकता है। जबकि वेब का अत्यंत कम तापमान और बड़ा दर्पण उसे अंतरिक्ष विज्ञान के नए युग में ले जाता है। वेब के प्राथमिक दर्पण के १८ सेगमेंट्स् को बेहद सटीक तरीके से व्यवस्थित करने के लिए १३२ छोटी एक्चुएटर मोटरों का उपयोग किया जाता है, जो १० नैनोमीटर की सटीकता से दर्पण को सेट कर सकती हैं।
मानव जाति के लिए इस तकनीक का महत्व अपार है। भारत सहित पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों के लिए जेम्स वेब टेलिस्कोप के डेटा ब्रह्मांड की उत्पत्ति, पहली गैलेक्सीयों की रचना और सबसे महत्वपूर्ण—सौरमंडल के बाहर जीवन की तलाश करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। भविष्य में इस टेलिस्कोप द्वारा एक्सोप्लेनेट के वायुमंडल में बायोसिग्नेचर (biosignatures) यानी जीवन का संकेत देने वाली गैसों की सटीक पहचान होने की पूरी संभावना बनी हुई है।


