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न्यूक्लियर फ्यूजन: सूर्य की ऊर्जा पृथ्वी पर लाने का मानवता का सबसे बड़ा प्रयोग

अणुओं के संलयन से अटूट, स्वच्छ और उत्सर्जन-मुक्त ऊर्जा प्राप्त करने का वैज्ञानिक रहस्य, इसका इतिहास और दुनिया के सबसे जटिल प्रयोग ITER का संपूर्ण विवरण।

आवतीकाल AI डेस्क29 अक्टूबर 2026 · 10 मिनट का पाठ
एक तकनीशियन न्यूक्लियर फ्यूजन रिएक्टर के वैक्यूम वेसल के अंदर काम कर रहा है।
एक तकनीशियन न्यूक्लियर फ्यूजन रिएक्टर के वैक्यूम वेसल के अंदर काम कर रहा है।
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हमारे सूर्य और तारों के केंद्र में निरंतर प्रवाहित ऊर्जा का अक्षय स्रोत न्यूक्लियर फ्यूजन (nuclear fusion) यानी 'नाभिकीय संलयन' है। यह एक ऐसी परमाणु प्रक्रिया है जिसमें दो या दो से अधिक हल्के परमाणुओं के नाभिक (atomic nuclei) परस्पर जुड़कर एक अधिक भारी नाभिक बनाते हैं। इस प्रक्रिया के दौरान प्रारंभिक परमाणुओं और बने नए परमाणु के द्रव्यमान (mass) के बीच थोड़ा अंतर रह जाता है, जो न्यूक्लियर बाइंडिंग एनर्जी के नियम के अनुसार प्रचंड ऊर्जा के रूप में मुक्त होता है। ब्रह्मांड में निकल (परमाणु क्रमांक 28) से हल्के सभी तत्वों का निर्माण बिग बैंग और तारों के केंद्र में चलने वाली फ्यूजन प्रक्रिया द्वारा ही हुआ है।

मानवजाति दशकों से परमाणु विखंडन यानी न्यूक्लियर फिशन (nuclear fission) तकनीक का उपयोग करके बिजली प्राप्त कर रही है, जिसमें यूरेनियम जैसे भारी तत्वों के अणुओं को तोड़ा जाता है। लेकिन फ्यूजन प्रक्रिया इससे बिल्कुल विपरीत है। फ्यूजन में हाइड्रोजन के आइसोटोप जैसे अति हल्के अणुओं को जोड़ा जाता है। केवल 1 ग्राम ड्यूटेरियम और ट्रिटियम के मिश्रण से फ्यूजन द्वारा 90,000 किलोवाट-ऑवर (kWh) ऊर्जा उत्पन्न की जा सकती है, जो लगभग 11 टन कोयला जलाने से मिलने वाली ऊर्जा के बराबर है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस प्रक्रिया में कोई कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन नहीं होता है, परमाणु भट्ठी के पिघलने (meltdown) की कोई संभावना नहीं रहती है और रेडियोएक्टिव कचरा भी बहुत कम समय के लिए ही प्रभावी रहता है।

१ ग्राम ड्यूटेरियम और ट्रिटियम के मिश्रण से मिलने वाली ऊर्जा (कोयला के साथ तुलना)स्रोत 2 आधारित आंकड़े
ड्यूटेरियम-ट्रिटियम मिश्रण90,000
समान ऊर्जा देने वाला कोयला11

ટન કોલસો / ૯૦,૦૦૦ kWh

फ्यूजन की प्रक्रिया कैसे काम करती है?

प्रकृति में परमाणु के नाभिक धन आवेशित होने के कारण एक-दूसरे को भारी बल से दूर धकेलते हैं, जिसे कूलम्ब प्रतिकर्षण (Coulomb repulsion) कहा जाता है। फ्यूजन प्रक्रिया को संभव बनाने के लिए इस प्रतिकर्षण को पार करके अणुओं को इतना करीब लाना पड़ता है ताकि शक्तिशाली न्यूक्लियर बल (strong nuclear force) काम कर सके। इसके लिए थर्मोन्यूक्लियर फ्यूजन (thermonuclear fusion) प्रक्रिया अपनानी पड़ती है, जिसके लिए अत्यंत उच्च तापमान (सौ मिलियन केल्विन या किलोइलेक्ट्रॉनवोल्ट स्तर), उच्च घनत्व और आवश्यक संलयन समय (confinement time) के ट्रिपल प्रोडक्ट (triple product) की आवश्यकता होती है।

जब गैस को इतने प्रचंड तापमान पर गर्म किया जाता है, तब वह द्रव्य की चौथी अवस्था यानी प्लाज्मा (plasma - आयनीकृत गैस) में परिवर्तित हो जाती है। इस प्लाज्मा में अणु क्वांटम टनलिंग (quantum tunneling) की प्रक्रिया द्वारा एक-दूसरे के साथ जुड़ जाते हैं। भौतिक विज्ञानी फ्रेडरिक हुंड ने 1927 में क्वांटम टनलिंग की खोज की थी और 1928 में जॉर्ज गैमोव ने इसे परमाणु नाभिक पर लागू किया था। फ्यूजन के लिए सबसे अनुकूल प्रक्रिया ड्यूटेरियम (21D) और ट्रिटियम (31T) के बीच की है, जिसमें से हीलियम (42He) और 14 MeV ऊर्जा वाले न्यूट्रॉन मुक्त होते हैं।

ड्यूटेरियम समुद्री पानी से प्रचुर मात्रा में मिल जाता है, जबकि ट्रिटियम प्रकृति में अत्यंत अल्प मात्रा में होता है। दुनिया में केन्डू (CANDU) नाभिकीय रिएक्टरों द्वारा वार्षिक मात्र २० किलोग्राम ट्रिटियम उत्पन्न होता है। इसलिए भविष्य के फ्यूजन रिएक्टरों में लिथियम ब्लैंकेट का उपयोग करके रिएक्टर के अंदर ही ट्रिटियम उत्पन्न करने की तकनीक विकसित की जा रही है, जिसे जेट्टर साइकिल (Jetter cycle) कहा जाता है।

वैज्ञानिक खोज से सैन्य हथियारों और शांतपूर्ण ऊर्जा तक की यात्रा

अमेरिकी रसायनशास्त्री विलियम ड्रेपर हार्किन्स ने १९१५ में सर्वप्रथम न्यूक्लियर फ्यूजन का ख्याल प्रस्तुत किया था। १९१९ में फ्रांसिस विलियम एस्टन ने मास स्पेक्ट्रोमीटर की खोज की, जिससे पता चला कि चार हाइड्रोजन परमाणु का वजन एक हीलियम परमाणु से अधिक होता है। इसके आधार पर १९२० में आर्थर एडिंगटन ने भविष्यवाणी की कि तारों की ऊर्जा का मुख्य स्रोत हाइड्रोजन का हीलियम में फ्यूजन ही है। १९३८-३९ में हान्स बेथे ने प्रोटॉन-प्रोटॉन चेन और CNO साइकिल की खोज कर दर्शाया कि सूर्य और अन्य तारों में फ्यूजन कैसे चलता है।

प्रयोगशाला में १९३२ में जोन कॉकक्रॉफ्ट और अर्नेस्ट वॉल्टन ने लिथियम पर प्रोटॉन की बौछार करके प्रथम कृत्रिम अणु विघटन किया। १९३३ में यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया में अर्नेस्ट लॉरेन्स ने साइक्लोट्रॉन प्रयोगों के दौरान आकस्मिक रूप से प्रथम ड्यूटेरियम-ड्यूटेरियम फ्यूजन प्राप्त किया। मई १९३४ में मार्क ओलिफंट, पॉल हार्टेक और अर्नेस्ट रदरफोर्ड ने जानबूझकर ड्यूटेरियम फ्यूजन करके ट्रिटियम और हीलियम-३ की खोज की, जिसे फ्यूजन का प्रथम सफल प्रायोगिक प्रकटन माना जाता है। १९३८ में आर्थर रूहलिग ने पहली बार ड्यूटेरियम-ट्रिटियम (D-T) प्रक्रिया देखी।

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान मैनहट्टन प्रोजेक्ट के तहत फ्यूजन के सैन्य उपयोग पर शोध शुरू हुआ। एन्रिको फर्मी और एडवर्ड टेलर ने फिशन बम की गर्मी से फ्यूजन शुरू करने का विचार किया। १९५२ में अमेरिका ने आइवी माइक (Ivy Mike) नामक प्रथम थर्मोन्यूक्लियर प्रयोग में १० मेगाटन टीएनटी समान विस्फोट किया। तत्पश्चात १९५४ में कास्टेल ब्रावो (Castle Bravo) टेस्ट में १५ मेगाटन का विस्फोट किया गया। सोवियत संघ ने १९५३ में RDS-6s और १९५५ में RDS-37 हाइड्रोजन बम के सफल परीक्षण किए।

प्रथम हाइड्रोजन (थर्मोन्यूक्लियर) बम परीक्षण
देश / प्रयोगवर्षविस्फोट क्षमता (मेगाटन)
अमेरिका (आइवी माइक)१९५२१० मेगाटन
सोवियत यूनियन (RDS-6s)१९५३४०० किलोटन
अमेरिका (कास्टेल ब्रावो)१९५४१५ मेगाटन
सोवियत यूनियन (RDS-37)१९५५१.५ मेगाटन

परंतु शांतपूर्ण ऊर्जा के लिए नियंत्रित फ्यूजन प्राप्त करने का प्रयास १९३० के दशक से चल रहा है। १९५८ में लॉस एलामोस के साइला-१ (Scylla I) उपकरण में प्रयोगशाला स्तर पर प्रथम थर्मोन्यूक्लियर फ्यूजन हुआ। १९९३-१९९६ के दौरान प्रिन्सटन यूनिवर्सिटी के TFTR रिएक्टर ने १०.३ मेगावाट (MW) पीक पावर और १.६ गीगाजोल (GJ) ऊर्जा उत्पन्न की। १९९७ में ब्रिटेन के जेईटी (JET) टोकामेक ने १६ मेगावाट पीक पावर और १.३ का कोर Q-फैक्टर प्राप्त किया। फरवरी २०२४ में घोषित परिणामों के अनुसार, JET ने मात्र ०.२ मिलीग्राम D-T ईंधन का उपयोग करके ६९ मेगाजोल (MJ) ऊर्जा उत्पन्न करने का रिकॉर्ड बनाया था।

लेजर आधारित इनर्शियल कन्फाइनमेंट फ्यूजन में यूएस नेशनल इग्निशन फैसिलिटी (NIF) ने 5 दिसंबर 2022 को ऐतिहासिक सफलता प्राप्त की। उन्होंने टारगेट पर 2.05 मेगाजूल ऊर्जा देकर 3.15 मेगाजूल फ्यूजन ऊर्जा प्राप्त की, यानी पहली बार दी गई ऊर्जा से अधिक ऊर्जा (net energy gain) प्राप्त हुई। अप्रैल 2025 में NIF ने 4.13 का Q-फैक्टर हासिल किया। फ्रांस के WEST टोकामैक रिएक्टर ने 90 मिलियन डिग्री सेल्सियस तापमान पर प्लाज्मा को लगातार 6 मिनट तक बनाए रखने का रिकॉर्ड बनाया है।

ITER: मानव इतिहास का सबसे जटिल वैज्ञानिक प्रयोग

नियंत्रित फ्यूजन से वाणिज्यिक बिजली उत्पन्न करने के उद्देश्य से विश्व का सबसे बड़ा प्रयोग ITER (पूर्व में इंटरनेशनल थर्मोन्यूक्लियर एक्सपेरिमेंटल रिएक्टर) फ्रांस के काडाराश (Cadarache) में आकार ले रहा है। लैटिन भाषा में ITER का अर्थ 'मार्ग' या 'रास्ता' होता है। इस परियोजना की स्थापना के पीछे एक रोचक कूटनीतिक इतिहास है। 1978 में INTOR प्रोजेक्ट से शुरू हुई चर्चा को 1985 में सोवियत संघ के जनरल सेक्रेटरी मिखाइल गोर्बाचेव और अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के बीच जिनेवा समिट में अंतिम रूप दिया गया था। अमेरिका के एल्विन ट्राइवेलीपिस और रूस के येवगेनी वेलिखोव जैसे वैज्ञानिकों ने इस साइंस डिप्लोमेसी में मुख्य भूमिका निभाई थी। टोकामैक (tokamak) की मूल अवधारणा नोबेल पुरस्कार विजेता आंद्रेई सखारोव और इगोर टाम द्वारा दी गई थी।

ITER प्रोजेक्ट में सात मुख्य भागीदार हैं: चीन, यूरोपीय संघ (EU), भारत, जापान, रूस, दक्षिण कोरिया और यूनाइटेड स्टेट्स। यह विश्व का सबसे बड़ा टोकामैक रिएक्टर होगा, जिसका प्लाज्मा वॉल्यूम जापान के JT-60SA रिएक्टर से भी छह गुना बड़ा होगा। टोकामैक एक डोनट (donut) आकार की एक शक्तिशाली चुंबकीय चैंबर है जिसमें अति गर्म प्लाज्मा को सुपरकंडक्टिंग मैग्नेट की मदद से हवा में तैरता रखा जाता है ताकि वह चैंबर की दीवारों को स्पर्श न करे।

ITER प्रोजेक्ट का मॉडल और प्रदर्शन.
ITER प्रोजेक्ट का मॉडल और प्रदर्शन. (IAEA Imagebank, CC BY-SA 2.0, Wikimedia Commons)
टोकमक रिएक्टर में प्लाज्मा कंडिनिंग की पद्धति
  1. १. डोनट आकार की चेम्बररिएक्टर में डोनट (donut) आकार की शक्तिशाली चुंबकीय चेम्बर बनाई जाती है।
  2. २. प्लाज्मा उत्पन्न करनावायु को अत्यंत उच्च तापमान पर गर्म करके उसे आयनीकृत वायु यानी प्लाज्मा में बदला जाता है।
  3. ३. चुंबकीय क्षेत्र द्वारा तैरता रखनासुपरकंडक्टिंग मैग्नेट की मदद से अति गर्म प्लाज्मा को हवा में तैरता रखा जाता है।
  4. ४. दीवारों की सुरक्षाप्लाज्मा कभी भी चेम्बर की दीवारों को स्पर्श नहीं करता है, जिससे उच्च तापमान सुरक्षित रहता है।

ITER का मुख्य उद्देश्य बिजली उत्पन्न करना नहीं, बल्कि साइंटिफिक डेमोंस्ट्रेशन करना है। इसका लक्ष्य Q = 10 हासिल करना है। Q-फैक्टर यानी प्लाज्मा को दी गई हीटिंग ऊर्जा और फ्यूजन से मिलने वाली थर्मल ऊर्जा का अनुपात। ITER में 50 मेगावाट (MW) थर्मल पावर देने से 500 मेगावाट फ्यूजन हीट उत्पन्न होगी, जो 400 से 600 सेकंड तक लगातार बनी रहेगी। इसके अलावा यह 'बर्निंग प्लाज्मा' (burning plasma) की स्थिति प्राप्त करेगा, जिसमें प्लाज्मा को गर्म रखने के लिए पचास प्रतिशत से अधिक ऊर्जा बाहरी हीटिंग के बजाय अंदर चल रही फ्यूजन प्रक्रिया से ही मिलती है।

आंकड़े, संशोधित समय-सारणी और लागत

ITER प्रोजेक्ट मानव इतिहास का सबसे जटिल इंजीनियरिंग साहसिक कार्य है। प्रोजेक्ट की शुरुआत में २००६ में इसकी अनुमानित लागत लगभग €५ से €६ अरब (बिलियन यूरो) थी। लेकिन डिज़ाइन में बदलावों, कच्चे माल की बढ़ती कीमतों और तकनीकी चुनौतियों के कारण अब इसकी कुल निर्माण और संचालन लागत €१८ से €२२ अरब तक पहुँच गई है (कुछ स्वतंत्र अनुमानों के अनुसार यह लागत $४५ से $६५ अरब हो सकती है)। अंतरराष्ट्रीय स्पेस स्टेशन ($१५० अरब) के बाद यह मानवता का सबसे महँगा वैज्ञानिक प्रयोग है।

इस रिएक्टर को चलाने के लिए शुरुआती चरण में ११० मेगावाट से लेकर प्लाज़्मा ऑपरेशन के दौरान ३० सेकंड की समयावधि के लिए ६२० मेगावाट जितनी प्रचंड बिजली की आवश्यकता होगी। लेकिन अनुसंधान रिएक्टर होने के कारण इससे मिलने वाली ऊर्जा से बिजली बनाने के बजाय इसे भाप के रूप में वातावरण में छोड़ दिया जाएगा।

वर्ष २०१३ से फ्रांस में शुरू हुए निर्माण के बाद २०२० में टोकामैक के असेंबली चरण का शुभारंभ फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों द्वारा किया गया था। जुलाई २०२४ के संशोधित समयसारणी के अनुसार, ITER २०३३-२०३४ में पहला प्लाज़्मा प्राप्त करेगा और २०३५ में ड्यूटेरियम-ड्यूटेरियम प्रयोगों की शुरुआत करेगा। पूर्ण कक्षा का ड्यूटेरियम-ट्रिटियम (D-T) फ्यूज़न २०३९ से शुरू होने की अपेक्षा है।

फ्रांस के काडाराश ખાતે ITER साइट का एरियल व्यू.
फ्रांस के काडाराश ખાતે ITER साइट का एरियल व्यू. (Macskelek, CC BY-SA 4.0, Wikimedia Commons)

सरकारी प्रयोगों के अलावा निजी क्षेत्र भी फ्यूज़न में बड़ा निवेश कर रहा है। केवल २०२१ के वर्ष में ही निजी फ्यूज़न स्टार्टअप्स जैसे कि Commonwealth Fusion Systems, Helion Energy, General Fusion, TAE Technologies और Zap Energy को $२.६ अरब की प्राइवेट फंडिंग मिली थी।

भारत और विश्व के लिए फ्यूज़न का भविष्य

भारत ITER प्रोजेक्ट का १०% से अधिक हिस्सा रखने वाला सक्रिय भागीदार देश है। भारत ने ITER के लिए दुनिया का सबसे बड़ा स्टेनलेस स्टील वैक्यूम पात्र (Cryostat), इन-वासेल शील्डिंग और क्रायोजेनिक सिस्टम्स बनाकर भेज दी हैं, जो प्लाज़्मा को माइनस १९३ डिग्री सेल्सियस तापमान पर ठंडा रखने में मदद करते हैं।

ITER के प्रयोग सफल होने के बाद EUROfusion द्वारा DEMO (Demonstration Power Plant) नामक रिएक्टर का निर्माण किया जाएगा। DEMO दुनिया की पहली ऐसी फ्यूज़न भट्टी होगी जो वाकई पावर ग्रिड के लिए बिजली उत्पन्न करेगी। वाणिज्यिक पावर प्लांट्स के लिए इंजीनियरों की गणना है कि Q-फैक्टर १०० जितना होना चाहिए ताकि प्लाज़मा हीटिंग, चुंबकों और क्रायोजेनिक्स की तमाम बाहरी बिजली खपत को घटाने के बाद भी शुद्ध लाभप्रद बिजली प्राप्त की जा सके।

जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा संकट के इस युग में, यदि मानवता न्यूक्लियर फ्यूज़न को सफलतापूर्वक पृथ्वी पर उतार सकेगी, तो यह मानव सभ्यता के इतिहास की सबसे बड़ी वैज्ञानिक क्रांति साबित होगी—एक ऐसी ऊर्जा जो कभी खत्म नहीं होगी और पृथ्वी के पर्यावरण को ज़रा भी नुकसान नहीं पहुँचाएगी।

स्रोत

  1. Wikipedia
  2. Wikipedia

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