शून्यता का विज्ञान: अतिचालकता, हवा में तैरती मैगलेव ट्रेनें और क्वांटम क्रांति की यात्रा
जब धातुएँ भीषण ठंड में बिजली के प्रतिरोध को पूरी तरह खो देती हैं, तो भौतिकी के असाधारण नियम बनते हैं—जिन्होंने बुलेट ट्रेनों को पटरियों के बिना उड़ने योग्य बनाया और क्वांटम तकनीक के द्वार खोले।

शून्य अवरोध की खोज: भौतिकशास्त्र की एक अनपेक्षित क्रांति
सामान्य तापमान पर किसी भी चालक तार से जब विद्युत प्रवाह गुजरता है तो उसमें मौजूद मुक्त इलेक्ट्रॉन धातु के अणुओं के साथ लगातार टकराते हैं। इस टक्कर के कारण ऊर्जा का नुकसान ऊष्मा के रूप में होता है, जिसे हम विद्युत अवरोध (electrical resistance) कहते हैं। सामान्य धातुओं में तापमान घटने के साथ अवरोध धीरे-धीरे कम होता है, लेकिन वह कभी शून्य नहीं होता। हालांकि कुछ विशिष्ट पदार्थों में एक निश्चित क्रांतिक तापमान (critical temperature) आते ही विद्युत अवरोध अचानक पूरी तरह गायब होकर शून्य बन जाता है। भौतिकशास्त्र की इस अद्भुत घटना को अतिचालकता (superconductivity) कहा जाता है।
इस ऐतिहासिक घटना की खोज 8 अप्रैल 1911 को डच भौतिकशास्त्री हाइके केमरलिंग ओनेस (Heike Kamerlingh Onnes) ने की थी। हाल ही में तैयार किए गए तरल हीलियम की मदद से वे पारा (mercury) अत्यंत कम तापमान पर कैसा व्यवहार करता है इसका अध्ययन कर रहे थे। जब तापमान घटकर 4.2 केल्विन पर पहुंचा, तो पारे का विद्युत प्रतिरोध एकाएक अदृश्य हो गया। रसप्रद बात यह है कि इसी प्रयोग के दौरान उन्होंने 2.2 केल्विन पर हीलियम का अतितरलीकरण (superfluid transition) भी देखा था, हालांकि उस समय उसका महत्व पहचाना नहीं गया था। ओनेस की इस खोज की सटीक बातें एक सदी बाद उनकी नोटबुकिंग मिलने के बाद ही पूरी तरह जानी जा सकी थीं।
अतिचालकता की सबसे रोमांचक विशेषता यह है कि यदि अतिचालक तार का बंद लूप (loop) बनाकर उसमें एक बार विद्युत प्रवाह प्रवाहित किया जाए, तो वह किसी भी बाहरी पावर स्रोत के बिना अनंतकाल तक लगातार बह सकता है। इसके बाद 1913 में टिन (tin) 3.8 केल्विन पर और सीसा (lead) 7 केल्विन पर अतिचालक बनते हुए पाए गए थे। वर्ष 1941 तक नाइओबियम नाइट्राइड 16 केल्विन पर यह गुणधर्म प्रदर्शित करता हुआ देखा गया। अतिचालकता केवल क्लासिकल फिजिक्स का आदर्श चालक नहीं है, बल्कि पूरी प्रक्रिया केवल क्वांटम मैकेनिक्स द्वारा ही समझी जा सकती है।

चुंबकीय क्षेत्र का बहिष्कार: मिसनर प्रभाव और लंदन समीकरण
अतिचालक पदार्थ केवल उत्तम विद्युत चालक ही नहीं हैं, बल्कि चुंबकत्व के प्रति उनका व्यवहार और भी विशिष्ट होता है। वर्ष 1933 में वाल्थर मिसनर और रॉबर्ट ऑक्सेनफेल्ड ने खोज की कि जब कोई पदार्थ सुपरकंडक्टिंग अवस्था में प्रवेश करता है, तो वह अपने अंदर मौजूद सभी चुंबकीय क्षेत्र को पूरी तरह बाहर धकेल देता है। इस घटना को मिसनर प्रभाव (Meissner effect) कहते हैं। क्लासिकल फिजिक्स के अनुसार यदि कोई संपूर्ण चालक हो तो वह अपने अंदर मौजूद चुंबकीय क्षेत्र को बनाए रखता है, लेकिन अतिचालक पदार्थ उसे पूरी तरह बाहर निकाल फेंकता है, जो साबित करता है कि यह एक नई क्वांटम अवस्था है।
वर्ष १९३५ में फ्रिट्ज़ और हाइन्ज़ लंदन नामक दो भाइयों ने इस घटना को समझाने के लिए प्रसिद्ध 'लंदन समीकरण' प्रस्तुत किए थे। ये समीकरण दर्शाते हैं कि सुपरकरंट द्वारा वहन होने वाली इलेक्ट्रोमैग्नेटिक मुक्त ऊर्जा न्यूनतम होती है, जिसके परिणामस्वरूप चुंबकीय क्षेत्र अतिचालक की सतह से अंदर जाते ही तेजी से शून्य हो जाता है। मीसनर असर के कारण ही जब किसी सामान्य चुंबक को अतिचालक पदार्थ के ऊपर रखा जाता है, तब अतिचालक उसकी सतह पर ऐसा प्रति-चुंबकीय प्रवाह उत्पन्न करता है कि चुंबक हवा में स्थिर रूप से तैरने (levitation) लगता है।
- तापमान में क्रायोजेनिक कमीपदार्थ को उसके विशिष्ट क्रांतिक तापमान (Tc) से नीचे तरल हीलियम या तरल नाइट्रोजन द्वारा अत्यधिक ठंडा किया जाता है।
- कूपर जोड़ियों का निर्माणइलेक्ट्रॉन स्फटिक जालक के फोनन के साथ अंतःक्रिया करके जोड़ी बनाते हैं, जिससे पदार्थ का विद्युत प्रतिरोध अचानक घटकर ठीक शून्य हो जाता है।
- मिसनर प्रभाव और चुंबकीय बहिष्करणअतिचालक अवस्था में प्रवेश करते ही पदार्थ अपने अंदर से सभी बाहरी चुंबकीय रेखाओं को पूरी तरह बाहर धकेल देता है।
- स्थिर चुंबकीय लेविटेशनचुंबकीय क्षेत्र के प्रतिकर्षक बल के कारण चुंबक या ट्रेन सतह से बिना किसी घर्षण के हवा में स्थिर रूप से अधर तैरती है।
कूपर जोड़ियाँ और माइक्रोस्कोपिक सिद्धांत
अतिचालकता वास्तव में किस परमाण्विक स्तर पर काम करती है, यह समझने में वैज्ञानिकों को दशकों लगे। १९५० में लैंडो और गिन्ज़बर्ग ने 'गिन्ज़बर्ग-लेंडो थ्योरी' दी, जिसने मैक्रोस्कोपिक गुणधर्मों को समझाया। तदनंतर एलेक्सी अत्रिकोसोव ने दर्शाया कि अतिचालक दो प्रकार के होते हैं: टाइप-१ और टाइप-२। इस कार्य के लिए अत्रिकोसोव और गिन्ज़बर्ग को २००३ का नोबेल पारितोषिक मिला था। उसी वर्ष १९५० में मैक्सवेल और रेयनोल्ड्स ने नोट किया कि संकटकालीन तापमान समस्थानिक के द्रव्यमान (isotopic mass) पर निर्भर करता है, जिसने संकेत दिया कि क्रिस्टल जाली के कंपनों यानी फोनन (phonons) की इसमें निर्णायक भूमिका होती है।
आखिरकार १९५७ में जॉन बार्डीन, लियोन कूपर और जॉन श्रिफर ने अतिचालकता का संपूर्ण माइक्रोस्कोपिक सिद्धांत दिया, जिसे BCS थ्योरी के रूप में जाना जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार, सामान्यतः एक-दूसरे को अपर्षित करने वाले ऋणभारित इलेक्ट्रॉन, क्रिस्टल जाली के फोनन के साथ की जाने वाली आंतरक्रिया द्वारा जोड़ी बनाते हैं, जिसे कूपर जोड़ी (Cooper pairs) कहते हैं। ये जोड़ियाँ एक बोसोन कण के रूप में वर्तती हैं और किसी भी प्रकार के संघर्ष या उष्मीय अवरोध के बिना जाली में से सरलता से बह सकती हैं। इस ग्राउंडब्रेकिंग सिद्धांत के लिए इन तीनों वैज्ञानिकों को १९७२ में भौतिकशास्त्र का नोबेल प्राइज दिया गया था।
उच्च तापमान अतिचालकों की क्रांति: तरल नाइट्रोजन का युग
दशकों तक वैज्ञानिक मानते थे कि अतिचालकता केवल अत्यंत नीचे तापमान पर ही संभव है, जिसके लिए खर्चीले और जटिल तरल हीलियम का उपयोग करना पड़ता था। परंतु १९८६ में एक क्रांति हुई, जब क्यूप्रेट-पेरोवस्काईट सिरेमिक पदार्थों में ३५ केल्विन से अधिक तापमान पर अतिचालकता देखी गई। उसके पश्चात तुरंत चिंग-वू चू नामक शोधक ने लैंथेनम की जगह इट्रियम जोड़कर YBCO (Yttrium Barium Copper Oxide) बनाया, जिसका संकटकालीन तापमान सीधा ९२ केल्विन (-१८१ °C) पर पहुँच गया।
यह खोज विज्ञान जगत के लिए सीमाचिह्नरूप थी क्योंकि सस्ता और सरलता से मिलने वाला तरल नाइट्रोजन ७७ केल्विन (-१९६ °C) पर उबलता है। ७७ केल्विन से ऊँचे तापमान पर अतिचालकता मिलने के कारण इसे उच्च-तापमान अतिचालक (high-temperature superconductors) नाम दिया गया। इसके कारण प्रयोगशालाओं और औद्योगिक एकमों में अत्यंत खर्चीले क्रायोजेनिक उपकरणों के बिना सुपरकंडक्टिंग घटनाओं का व्यावहारिक उपयोग करना संभव हुआ।
ताजे वर्षों में टू-डाइमेंशनल (2D) मटीरियल्स में भी आश्चर्यजनक अतिचालकता दर्ज की गई है। वर्ष 2018 में शोधकर्ताओं ने ग्रेफीन के दो पर्दों को 1.1 डिग्री के विशिष्ट कोण पर ट्विस्ट करके (twisted bilayer graphene) 1.7 केल्विन पर अतिचालकता प्राप्त की थी। इसके बाद 2021 में तीन पर्दो वाले ग्रेफीन में 2.8 केल्विन और 2022 में अनट्विस्टेड ट्रिलेयर में 1 से 2 केल्विन पर सुपरकंडक्टिंग लक्षण प्राप्त करने में सफलता मिली है।
| ट्रेन / सिस्टम | देश और तकनीक | अधिकतम गति | विशेष टिप्पणी |
|---|---|---|---|
| L0 Series (SCMaglev) | जापान (सुपरकंडक्टिंग EDS) | ६०३ किमी/घंटा | २०१५ में स्थापित विश्व गति रिकॉर्ड |
| Miyazaki Test Train | जापान (SCMaglev) | ५१७ किमी/घंटा | १९७९ का प्रारंभिक प्रायोगिक रिकॉर्ड |
| Shanghai Maglev | चीन (ट्रांसरेपिड EMS) | ४३१ किमी/घंटा | ३०.५ किमी दूरी ७ मिनट २० सेकंड में |
| Linimo (HSST) | जापान (इलेक्ट्रोमैग्नेटिक) | १०० किमी/घंटा | २००५ से सक्रिय स्थानीय परिवहन |
| Birmingham Maglev | यूके (लिनियर इंडक्शन) | ४२ किमी/घंटा | विश्व की पहली व्यावसायिक शटल (१९८४-१९९५) |
सुपरमैगनेट, जोसेफसन असर और क्वांटम कंप्यूटिंग
अतिचालकता का प्रथम व्यावहारिक उपयोग 1954 में डडली एलन बक द्वारा 'क्रायोट्रॉन' (cryotron) कंप्यूटर स्विच के रूप में विकसित किया गया था। शुरुआत में केमरलिंग ओन्नेस ने अतिचालक तार से इलेक्ट्रोमैगनेट बनाने का प्रयास किया था, परंतु सामान्य चुंबकीय क्षेत्र में ही सुपरकंडक्टिविटी नष्ट हो जाती थी। 1955 में वायन्टेमा ने नियोबियम तार से 0.7 टेस्ला का छोटा चुंबक बनाया। इसके बाद 1961 में कुंजलर और उनकी टीम ने नियोबियम-टिन (Nb3Sn) मिश्रधातु में देखा कि वह 4.2 केल्विन तापमान पर 8.8 टेस्ला के प्रचंड चुंबकीय क्षेत्र में भी प्रति वर्ग सेंटीमीटर में 1,00,000 एम्पीयर से अधिक विद्युतप्रवाह वहन कर सकती है। यह मटीरियल 20 टेस्ला तक के क्षेत्र पैदा करने में सक्षम था।
वर्ष 1962 में बर्लिनकोर्ट और हैके ने अधिक लचीली नियोबियम-टाइटेनियम (NbTi) मिश्रधातु खोजी, जो 10 टेस्ला तक काम कर सकती थी। सरल उत्पादन के कारण Nb-Ti विश्वभर में सुपरमैगनेट्स के लिए मुख्य साधन बन गया। अस्पतालों में उपयोग होने वाले MRI मशीनों और कण त्वरक (particle accelerators) इस मटीरियल पर निर्भर हैं। कनेक्टस (Conectus) संस्था के 2014 के अनुमान के मुताबिक, विश्वभर में सुपरकंडक्टिविटी आधारित आर्थिक गतिविधि पांच अरब यूरो जितनी थी, जिसमें 80% हिस्सा अकेला MRI सिस्टम्स का था।
क्वांटम टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में सबसे बड़ा मोड़ 1962 में आया, जब ब्रायन जोसेफसन ने सैद्धांतिक भविष्यवाणी की कि यदि दो अतिचालकों के बीच अवाचालक का अत्यंत पतला पर्दा रखा जाए, तो भी सुपरकरंट बह सकता है। इस घटना को जोसेफसन असर (Josephson effect) कहा जाता है, जिसके लिए उन्हें 1973 का नोबेल प्राइज मिला था। इस सिद्धांत पर से अत्यंत संवेदनशील चुंबकीय मीटर SQUID (Superconducting Quantum Interference Device) बने। यही जोसेफसन जंक्शन आज आधुनिक सुपरकंडक्टिंग क्वांटम कंप्यूटर्स के मूलभूत एकम ऐसे क्यूबिट्स (qubits) बनाने का मुख्य आधारस्तंभ है।

पटरी के बिना हवा में दौड़ती मैगलेव ट्रेनें
अतिचालक चुंबकों का सबसे भव्य और प्रत्यक्ष उपयोग परिवहन क्षेत्र में 'मैगलेव' (Maglev - Magnetic Levitation) ट्रेनों में हुआ है। मैगलेव ऐसी ट्रेन प्रणाली है जिसमें व्हील्स या पटरियों के बीच कोई भौतिक घर्षण नहीं होता है; ट्रेन शक्तिशाली चुंबकीय बलों के कारण गाइडवे से थोड़े सेंटीमीटर हवा में ऊपर तैरती है। उसे आगे धकेलने के लिए लिनियर मोटर (linear motor) टेक्नोलॉजी का उपयोग किया जाता है, जिसका सर्वप्रथम व्यावहारिक मॉडल 1940 के दशक में ब्रिटिश इंजीनियर एरिक लेइथवेट ने बनाया था।
मेग्लेव टेक्नोलॉजी मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है: इलेक्ट्रोमैग्नेटिक सस्पेंशन (EMS) और इलेक्ट्रोडायनेमिक सस्पेंशन (EDS)। EMS प्रणाली सामान्य आकर्षण बल पर काम करती है, जो शंघाई मेग्लेव में प्रयुक्त होती है। दूसरी ओर, EDS प्रणाली प्रतिकर्षक बल पर कार्य करती है, जिसकी परिकल्पना 1961 में ब्रुकहेवन नेशनल लेबोरेटरी के जेम्स पॉवेल और गॉर्डन डैनबी ने ट्रैफिक जाम में फंसने के बाद सोची थी। जापान ने इस EDS प्रणाली में अतिचालक चुंबक जोड़कर SCMaglev (सुपरकंडक्टिंग मेग्लेव) विकसित की है।
जापान में सुपरकंडक्टिंग मेग्लेव का अनुसंधान 1962 से शुरू हुआ था। 1972 में जापानीज नेशनल रेलवेज के तहत पहली सफल रन दर्ज की गई थी और 1979 में मियाज़ाकी टेस्ट ट्रैक पर इस ट्रेन ने 517 किमी/घंटा की गति हासिल की थी। वर्ष 2015 में यामानाशी टेस्ट ट्रैक पर जापान की प्रायोगिक L0 Series सुपरकंडक्टिंग मेग्लेव ट्रेन ने 603 किमी/घंटा (375 मील प्रति घंटा) की गति दर्ज करके विश्व रिकॉर्ड बनाया था। वर्तमान में टोक्यो और नागोया के बीच 285.6 किलोमीटर लंबी 'चूओ शिंकानसेन' (Chūō Shinkansen) लाइन इस टेक्नोलॉजी से बनाई जा रही है, जिसका निर्माण 2014 में शुरू हुआ था और निर्माण में देरी के कारण अब 2036 से पहले शुरू होने की संभावना नहीं है।
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वैश्विक वास्तविकता और भविष्य की चुनौतियाँ
एक सदी से अधिक समय के अनुसंधान के बावजूद, ऊंचे निर्माण खर्च और वर्तमान रेलवे इन्फ्रास्ट्रक्चर के साथ संगत न होने के कारण आज दुनियाभर में केवल छह मेग्लेव प्रणालियां कार्यरत हैं—जिनमें से चार चीन में, एक जापान में और एक दक्षिण कोरिया में है। व्यावसायिक यात्री सेवा में सबसे लंबे समय तक सबसे अधिक गति का रिकॉर्ड चीन की शंघाई मेग्लेव के पास रहा था। जर्मन ट्रांसरेपिड टेक्नोलॉजी वाली यह ट्रेन पुडोंग एयरपोर्ट से सेंट्रल पुडोंग के बीच 30.5 किमी की दूरी 431 किमी/घंटा की गति से मात्र 7 मिनट और 20 सेकंड में तय करती है।
हाई-स्पीड मेग्लेव ट्रेनों में लेविटेशन यानी ट्रेन को हवा में उठाने के लिए कुल ऊर्जा का बहुत कम हिस्सा प्रयुक्त होता है; सबसे अधिक ऊर्जा हवा के प्रतिरोध (aerodynamic drag) से निपटने में खर्च होती है। इस सीमा को पार करने के लिए अब वैक्यूम ट्यूब ट्रेन (Vactrain) टेक्नोलॉजी पर विचार किया जा रहा है। अतिचालकता आज अस्पतालों के एमआरआई स्कैनर से लेकर सुपरकंप्यूटिंग और हाई-स्पीड रेलवे तक आधुनिक विज्ञान का आधार बन चुकी है।


