ब्रह्मांड के सृजन का रहस्य: कैसे एक 'भुलाए गए' न्यूट्रिनो कण ने हमें शून्यता से बचाया?
वैज्ञानिकों ने एक ऐसे भारी न्यूट्रिनो कण की खोज की है, जिसने बिग बैंग के बाद मैटर और एंटीमैटर के बीच संतुलन स्थापित करने में मुख्य भूमिका निभाई हो सकती है।

हमारा अस्तित्व ही एक बड़ा रहस्य है। भौतिकी के मूलभूत सिद्धांतों के अनुसार, जब ब्रह्मांड की शुरुआत हुई, तो पदार्थ (matter) और उसका विरोधी पदार्थ यानी एंटीमैटर (antimatter) समान मात्रा में उत्पन्न होने चाहिए थे। समस्या यह है कि जब मैटर और एंटीमैटर एक-दूसरे के संपर्क में आते हैं, तो वे एक-दूसरे का विनाश कर देते हैं और केवल शुद्ध ऊर्जा शेष रहती है। यदि शुरुआत में दोनों समान होते, तो आज ब्रह्मांड में तारे, ग्रह या जीवन जैसा कुछ भी नहीं होता; केवल खाली अंतरिक्ष और प्रकाश होता। लेकिन हम यहाँ हैं, जिसका अर्थ है कि किसी तरह मैटर जीत गया। हाल ही में यूनिवर्सिटी ऑफ साउथेम्प्टन और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (IIT) कानपुर के शोधकर्ताओं ने इस पहेली का एक आश्चर्यजनक समाधान प्रस्तुत किया है, जिसका केंद्रबिंदु एक 'भुला हुआ' न्यूट्रिनो कण है।
न्यूट्रिनो (neutrino) प्रकृति के सबसे रहस्यमय कणों में से एक हैं। वे इतने हल्के हैं कि लंबे समय तक वैज्ञानिक मानते थे कि उनका कोई द्रव्यमान (mass) ही नहीं है। वे आवेश रहित होते हैं और सामान्य पदार्थ के साथ शायद ही कभी प्रतिक्रिया करते हैं। वास्तव में, अभी भी आपकी उंगलियों के पोरों से हर सेकंड अरबों न्यूट्रिनो गुजर रहे हैं, लेकिन आपको इसका एहसास भी नहीं होता। इन कणों को समझने के लिए हमें बिग बैंग (Big Bang) यानी ब्रह्मांड के महाविस्फोट के समय में वापस जाना होगा। बिग बैंग थ्योरी के अनुसार, लगभग 13.787 अरब साल पहले ब्रह्मांड अत्यंत गर्म और सघन अवस्था से विस्तारित होना शुरू हुआ था। इस प्रक्रिया के दौरान कई प्रकार के कण पैदा हुए, जिनमें न्यूट्रिनो भी शामिल थे।

न्यूट्रिनो का इतिहास भी दिलचस्प है। 1930 में वोल्फगैंग पाउली ने बीटा डेके (beta decay) यानी परमाणु के विखंडन के दौरान ऊर्जा के संरक्षण को समझाने के लिए इस कण की कल्पना की थी। बाद में एनरिको फर्मी ने इसे 'न्यूट्रिनो' नाम दिया, जिसका इतालवी अर्थ 'छोटा तटस्थ कण' होता है। 1956 में क्लाइड कोवान और फ्रेडरिक रेइन्स द्वारा इसकी पहली प्रायोगिक पुष्टि की गई थी। वैज्ञानिक जानते हैं कि न्यूट्रिनो तीन प्रकार के या 'फ्लेवर' (flavor) में आते हैं: इलेक्ट्रॉन न्यूट्रिनो, म्यूऑन न्यूट्रिनो और टाऊ न्यूट्रिनो। ये कण लगातार एक फ्लेवर से दूसरे फ्लेवर में बदलते रहते हैं, जिसे न्यूट्रिनो ऑसिलेशन (oscillation) कहा जाता है। इस खोज के लिए 2015 में नोबेल प्राइज भी दिया गया था।
- उत्पत्तिबिग बैंग के बाद अत्यंत गर्म वातावरण में डिकपल्ड भारी न्यूट्रिनो पैदा होते हैं।
- ऊर्जा वर्चस्वये कण लंबे समय तक जीवित रहने के कारण ब्रह्मांड के ठंडा होने पर भी बने रहते हैं और ऊर्जा घनत्व पर हावी हो जाते हैं।
- तापमान परिवर्तनवे ब्रह्मांड के ठंडा होने की गति में बदलाव लाते हैं, जो हिग्स बोसॉन के साथ प्रतिक्रियाओं को प्रभावित करते हैं।
- मैटर की विजयइस प्रक्रिया के कारण एंटीमैटर की तुलना में मैटर की मात्रा में मामूली वृद्धि होती है, जो आज के ब्रह्मांड की नींव रखती है।
लेकिन साउथेम्प्टन और आईआईटी कानपुर के वैज्ञानिक जिस कण की बात कर रहे हैं, वह यह सामान्य न्यूट्रिनो नहीं है। इसे 'डिकपल्ड हैवी न्यूट्रिनो' (decoupled heavy neutrino) कहा जाता है। यह एक काल्पनिक भारी कण है जिसे अब तक वैज्ञानिकों ने महत्वहीन मानकर नजरअंदाज किया था। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह कण अन्य कणों के साथ इतनी कमजोरी से जुड़ा हुआ है कि इसे खोजना मुश्किल है। हालांकि, इसकी यही कमजोर प्रतिक्रिया ही इसकी सबसे बड़ी ताकत बन गई। अपनी कमजोर कनेक्टिविटी के कारण इसका जीवनकाल बहुत लंबा होता है। फिजिकल रिव्यू लेटर्स पत्रिका में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, यह कण बिग बैंग के बाद इतने लंबे समय तक टिका रहा कि इसने ब्रह्मांड के ऊर्जा घनत्व (energy density) पर अस्थायी रूप से कब्जा कर लिया था।
डॉ. ऋषभ रोशन, जो इस अध्ययन के लेखक हैं, समझाते हैं कि जब ब्रह्मांड ठंडा हो रहा था, तब इन भारी न्यूट्रिनो ने एक ऐसी अवधि बनाई जहां पदार्थ का वर्चस्व था। इस प्रक्रिया ने ब्रह्मांड के तापमान में बदलाव किया। यह तापमान परिवर्तन एक स्विच की तरह काम करता है, जो यह तय करता है कि इलेक्ट्रॉन और अन्य लेप्टॉन (lepton) कण अपने विरोधी कणों के साथ कैसे प्रतिक्रिया करेंगे। इस प्रक्रिया में हिग्स बोसोन (Higgs boson) नामक कण की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। हिग्स बोसोन वह कण है जो अन्य मूलभूत कणों को द्रव्यमान देता है। भारी न्यूट्रिनो ने हिग्स बोसोन के साथ होने वाली प्रतिक्रियाओं के समय में बदलाव करके मैटर और एंटीमैटर के बीच असंतुलन पैदा करने में मदद की।
| न्यूट्रिनो का प्रकार | संबंधित लेप्टोन | खोज का वर्ष |
|---|---|---|
| इलेक्ट्रॉन न्यूट्रिनो | इलेक्ट्रॉन | 1956 |
| म्यूऑन न्यूट्रिनो | म्यूऑन | 1962 |
| टाऊ न्यूट्रिनो | टाऊ | 2000 |
इस असंतुलन को वैज्ञानिक भाषा में बेरियोन एसिमेट्री (baryon asymmetry) कहा जाता है। बिग बैंग के कुछ समय बाद, अज्ञात प्रतिक्रियाओं के कारण हर 30 मिलियन कणों में पदार्थ का एक अतिरिक्त कण बच गया था। जब बाकी मैटर और एंटीमैटर एक-दूसरे का विनाश कर रहे थे, तब यह छोटा सा अतिरिक्त हिस्सा बच गया, जिससे पूरा दृश्यमान ब्रह्मांड बना है। आईआईटी कानपुर के सह-लेखक डॉ. सुदीप्त शो के अनुसार, इस 'भुला दिए गए' कण ने ब्रह्मांड के विस्तार के इतिहास को नाटकीय रूप से बदल दिया था।
यह सिद्धांत केवल कागजों पर ही नहीं है, बल्कि इसे साबित करने का एक तरीका भी है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इन भारी न्यूट्रिनो के वर्चस्व के कारण ब्रह्मांड के प्रारंभिक चरण में गुरुत्वाकर्षण तरंगें (gravitational waves) पैदा हुई होंगी। गुरुत्वाकर्षण तरंगें अंतरिक्ष और समय के ताने-बाने में आने वाली लहरें हैं। यदि हम इन प्राचीन तरंगों को खोज सकें, तो उनमें इन न्यूट्रिनो की उपस्थिति के प्रमाण मिल सकते हैं। ये तरंगें ब्रह्मांड के उस समय की जानकारी देती हैं जब प्रकाश भी स्वतंत्र रूप से घूम नहीं सकता था।

वर्तमान ब्रह्मांड में पदार्थ के वितरण को देखें, तो सामान्य मैटर केवल 5% ही है। शेष 27% डार्क मैटर (dark matter) और 68% डार्क एनर्जी (dark energy) है। न्यूट्रिनो इस डार्क मैटर के रहस्य को सुलझाने में भी मदद कर सकते हैं। सूर्य के केंद्र में होने वाली परमाणु संलयन (nuclear fusion) प्रक्रिया से भी असंख्य न्यूट्रिनो पृथ्वी पर आते हैं। पृथ्वी की सतह पर प्रति सेकंड प्रति वर्ग सेंटीमीटर लगभग 65 अरब सौर न्यूट्रिनो गुजरते हैं। ये कण इतने सूक्ष्म हैं कि वे पूरी पृथ्वी को बिना किसी बाधा के आर-पार भेद सकते हैं।

यह शोध भारत के लिए भी गौरव की बात है क्योंकि आईआईटी कानपुर के वैज्ञानिकों ने इस वैश्विक रहस्य को सुलझाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। यदि यह सिद्धांत सही साबित होता है, तो यह भौतिकी के स्टैंडर्ड मॉडल (Standard Model) में एक नया अध्याय जोड़ेगा। स्टैंडर्ड मॉडल ब्रह्मांड के सभी ज्ञात कणों और बलों को समझाने वाला ढांचा है, लेकिन यह अभी तक यह नहीं समझा सका है कि मैटर, एंटीमैटर से अधिक क्यों हो गया। ये भारी न्यूट्रिनो शायद वह खोई हुई कड़ी हैं जो हमें शून्यता से अस्तित्व में लाने के लिए जिम्मेदार है।


