अदृश्य की तस्वीर: पृथ्वी के आकार के वर्चुअल टेलीस्कोप से ब्लैक होल की पहली छवि कैसे ली गई
अल्बर्ट आइंस्टीन के सापेक्षतावाद के गणित से लेकर पूरी पृथ्वी पर फैली वेधशालाओं के समन्वय द्वारा ब्लैक होल की वास्तविक छवि को साकार करने की वैज्ञानिक उपलब्धि।

विश्व के खगोल विज्ञान और भौतिकी के इतिहास में 10 अप्रैल 2019 का दिन स्वर्ण अक्षरों में अंकित हो गया। दशकों तक जो खगोलीय पिंड केवल गणितज्ञों के जटिल समीकरणों और सैद्धांतिक भौतिकी के कागजों पर अस्तित्व रखता था, उसका पहला वास्तविक चित्र मानव जाति के समक्ष प्रस्तुत हुआ। यह पिंड यानी ब्लैक होल (black hole)—अंतरिक्ष में इतना प्रचंड गुरुत्वाकर्षण रखने वाली संरचना, जिसके शिकंजे से प्रकाश की एक किरण भी बाहर नहीं निकल सकती। जब किसी पिंड से प्रकाश ही बाहर न आ सके, तो उसका फोटोग्राफ कैसे लिया जाए, यह विज्ञान जगत का सबसे बड़ा सवाल था।
इस असंभव लगने वाले कार्य को संभव बनाया हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के वरिष्ठ एस्ट्रोफिजिसिस्ट शेप डोलेमैन (Shep Doeleman) और उनके 250 सहयोगी शोधकर्ताओं की टीम ने। उन्होंने संपूर्ण पृथ्वी पर अलग-अलग महाद्वीपों में फैले रेडियो टेलीस्कोपों को एक-दूसरे के साथ जोड़कर ‘इवेंट होराइजन टेलीस्कोप’ (Event Horizon Telescope - EHT) नामक एक अत्यंत विशाल वर्चुअल नेटवर्क रचा। इस वैश्विक उपकरण की मदद से पृथ्वी से लगभग 55 मिलियन (5.5 करोड़) प्रकाश वर्ष दूर स्थित मेसियर 87 (M87) गैलेक्सी के केंद्र में स्थित अतिविशाल ब्लैक होल की छवि ली गई।
कल्पना से गणित तक: ब्लैक होल का सैद्धांतिक इतिहास
ब्लैक होल का विचार सापेक्षतावाद से भी पुराना है। 1784 में अंग्रेज खगोलशास्त्री जॉन मिचेल (John Michell) द्वारा एक पत्र में गणना प्रस्तुत की गई थी कि यदि किसी तारे का घनत्व सूर्य जितना ही हो परंतु उसकी त्रिज्या सूर्य से 500 गुना अधिक हो, तो उसकी सतह से पलायन वेग (escape velocity) प्रकाश के वेग से अधिक हो जाएगा। परिणामस्वरूप, उसमें से कोई प्रकाश बाहर नहीं आ सकेगा। 1796 में फ्रेंच वैज्ञानिक पियरे-सिमोन लाप्लास (Pierre-Simon Laplace) द्वारा भी स्वतंत्र रूप से ऐसा ही विचार प्रस्तुत किया गया था।
आधुनिक भौतिकी में इस विषय को मजबूत आधार 1915 में मिला, जब अल्बर्ट आइंस्टीन ने सामान्य सापेक्षतावाद (General Relativity) प्रस्तुत किया। इस सिद्धांत के अनुसार गुरुत्वाकर्षण कोई पारंपरिक बल नहीं है, बल्कि द्रव्यमान द्वारा अंतरिक्ष-समय (spacetime) के ताने-बाने में पड़ने वाला मोड़ है। आइंस्टीन के समीकरणों के प्रकाशित होने के कुछ ही महीनों में, प्रथम विश्व युद्ध के मोर्चे पर लड़ रहे जर्मन भौतिक विज्ञानी कार्ल श्वार्ज़चाइल्ड (Karl Schwarzschild) द्वारा इसका पहला सटीक समाधान खोजा गया। उन्होंने दर्शाया कि यदि कोई निश्चित द्रव्यमान एक अतिसूक्ष्म सीमा में संकुचित हो जाए, तो वहां समय और अंतरिक्ष के समीकरण अनंत हो जाते हैं। इस सीमा को बाद में श्वार्ज़चाइल्ड त्रिज्या (Schwarzschild radius) नाम दिया गया।
शुरुआती दशकों में आइंस्टीन और आर्थर एडिंग्टन (Arthur Eddington) जैसे दिग्गज वैज्ञानिक मानते थे कि वास्तविक प्रकृति में ऐसा पूर्ण संकुचन पाने वाला पदार्थ असंभव है। 1931 में भारतीय वैज्ञानिक सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर (Subrahmanyan Chandrasekhar) द्वारा दर्शाया गया कि एक निश्चित सीमा से अधिक वजन वाले तारों का गुरुत्वाकर्षण पतन इलेक्ट्रॉन दबाव से नहीं रोका जा सकता है। इसके बाद 1939 में जे. रॉबर्ट ओपेनहाइमर (J. Robert Oppenheimer) और जॉर्ज वोल्कोफ द्वारा न्यूट्रॉन तारों की अधिकतम सीमा निर्धारित की गई, जिसे TOV लिमिट कहा जाता है। उसी वर्ष ओपेनहाइमर और हार्टलैंड स्नाइडर ने दर्शाया कि भारी तारे का गुरुत्वाकर्षण संकुचन उसे उसकी श्वाज़चाइल्ड त्रिज्या के भीतर धकेल देता है।
1958 में डेविड फिंकेलस्टीन (David Finkelstein) द्वारा इस सीमा को ‘इवेंट होराइजन’ (event horizon) यानी घटना क्षितिज के रूप में पहचाना गया। उन्होंने इसे एक ऐसा ‘एकतरफा पटल’ (unidirectional membrane) बताया जिसके भीतर कोई भी घटना प्रवेश कर सकती है, लेकिन अंदर घटित किसी भी घटना का प्रभाव बाहरी दुनिया तक नहीं पहुँच सकता है। 1963 में रॉय केर (Roy Kerr) द्वारा परिक्रमण करते ब्लैक होल का सटीक गणितीय समाधान खोजा गया। हालाँकि, इन सभी सैद्धांतिक निष्कर्षों के बावजूद, ब्लैक होल का सीधा अवलोकन अभी बाकी था।
तारों की मृत्यु से लेकर आकाशगंगाओं के हृदय तक
खगोलशास्त्र में मुख्य रूप से दो प्रकार के ब्लैक होल देखे जाते हैं। पहला प्रकार है स्टेलर-मास ब्लैक होल (stellar-mass black holes), जो सूर्य से दस से बीस गुना बड़े तारों के जीवन के अंत में सुपरनोवा (supernova) विस्फोट के बाद आंतरिक कोर के पतन से बनते हैं। हमारी आकाशगंगा में ऐसे लाखों ब्लैक होल हो सकते हैं। 1971 से 1974 के दौरान पहचाना गया Cygnus X-1 ऐसा ही एक एक्स-रे बाइनरी स्रोत था, जो मानवजाति द्वारा स्वीकार किया गया पहला मजबूत ब्लैक होल उम्मीदवार बना था।
दूसरा प्रकार है सुपरमैसिव ब्लैक होल (supermassive black holes)। ये दैत्याकार ब्लैक होल लाखों या अरबों सूर्यों के बराबर द्रव्यमान रखते हैं और लगभग हर बड़ी आकाशगंगा के केंद्र में स्थित होते हैं। हमारी अपनी आकाशगंगा (Milky Way) के केंद्र में भी सेजिटेरियस ए-स्टार (Sagittarius A*) नामक एक सुपरमैसिव ब्लैक होल है, जिसका द्रव्यमान लगभग 4.3 मिलियन (43 लाख) सूर्यों के बराबर है। वैज्ञानिकों ने रेडियो तरंगों के माध्यम से आकाशगंगाओं के केंद्र से प्रकाश की गति से फेंके जाने वाले प्रचंड जेट्स (jets) देखे थे, जो केवल स्पिनिंग सुपरमैसिव ब्लैक होल द्वारा ही संभव हैं।
| वर्ष | वैज्ञानिक / शोधकर्ता | सैद्धांतिक खोज |
|---|---|---|
| 1784 | जॉन मिशेल (John Michell) | सूर्य से 500 गुना त्रिज्या वाले तारे से प्रकाश न निकल पाने की पहली गणना |
| 1915 | अल्बर्ट आइंस्टीन (Albert Einstein) | सामान्य सापेक्षतावाद (General Relativity): गुरुत्वाकर्षण अंतरिक्ष-समय का मोड़ है |
| 1916 | कार्ल श्वार्ज़चाइल्ड (Karl Schwarzschild) | आइंस्टीन के समीकरणों का पहला सटीक समाधान (श्वार्ज़चाइल्ड त्रिज्या) |
| 1939 | ओपनहाइमर और स्नाइडर | गुरुत्वाकर्षण पतन से सिकुड़ते तारे का गणितीय मॉडल |
| 1958 | डेविड फिंकेलस्टीन (David Finkelstein) | इवेंट होराइजन को एकतरफा झिल्ली (Unidirectional membrane) के रूप में परिभाषित किया |
पृथ्वी जितना बड़ा कैमरा: इवेंट होराइजन टेलीस्कोप
भले ही सुपरमैसिव ब्लैक होल अत्यंत विशाल हों, लेकिन पृथ्वी से उनकी अत्यधिक दूरी को देखते हुए आकाश में उनका स्पष्ट आकार (angular size) अत्यंत छोटा दिखाई देता है। शेप डोलेमैन के अनुसार, M87 गैलेक्सी के ब्लैक होल को पृथ्वी से देखना चंद्रमा की सतह पर रखे एक सेब की तस्वीर लेने के समान है। इतना सूक्ष्म रिज़ॉल्यूशन प्राप्त करने के लिए ऑप्टिकल टेलीस्कोप पर्याप्त नहीं हैं; इसके लिए पृथ्वी के व्यास जितने विशाल दर्पण वाले टेलीस्कोप की आवश्यकता होती है।
भौतिक रूप से पृथ्वी जितना बड़ा टेलीस्कोप बनाना असंभव होने के कारण वैज्ञानिकों ने वेरी लॉन्ग बेसलाइन इंटरफेरोमेट्री (Very Long Baseline Interferometry - VLBI) पद्धति का उपयोग किया। हवाई, एरिज़ोना, स्पेन, चिली, मेक्सिको और दक्षिणी ध्रुव (Antarctica) पर स्थापित शक्तिशाली रेडियो टेलीस्कोपों को आपस में जोड़ दिया गया। इस पद्धति में पूरी पृथ्वी एक विशाल वर्चुअल टेलीस्कोप का काम करती है।

यह प्रक्रिया अत्यंत जटिल थी। प्रत्येक टेलीस्कोप को मिलीमीटर तरंगदैर्घ्य पर आकाश के उस विशिष्ट बिंदु की ओर केंद्रित किया गया। संपूर्ण डेटा को परमाणु घड़ियों (atomic clocks) की मदद से नैनोसेकंड के स्तर पर सिंक्रोनाइज़ किया गया था। टेलीस्कोपों द्वारा इतनी विशाल मात्रा में डेटा एकत्र हुआ कि उसे इंटरनेट के माध्यम से ट्रांसफर करना असंभव था; इसलिए हार्ड ड्राइव्स को सीधे विमान के ज़रिए सुपरकंप्यूटर तक पहुँचाया गया था।
- नेटवर्किंगदुनिया भर के रेडियो टेलीस्कोप को जोड़कर पृथ्वी के आकार का वर्चुअल टेलीस्कोप बनाया गया।
- सिंक्रोनाइज़ेशनपरमाणु घड़ियों की मदद से सभी डेटा को नैनोसेकंड के स्तर पर सटीक रूप से सिंक्रोनाइज़ किया गया।
- डेटा ट्रांसफरविशाल डेटा को हार्ड ड्राइव में भरकर विमान द्वारा सुपरकंप्यूटर केंद्रों तक पहुँचाया गया।
- इमेज प्रोसेसिंगजटिल एल्गोरिदम का उपयोग करके इस डेटा से ब्लैक होल की पहली तस्वीर तैयार की गई।
प्रकाश का वलय और अनंत की परछाईं: चित्र में क्या दिखाई देता है?
जब अप्रैल 2019 में परिणाम सामने आया, तब पूरी दुनिया ने एक नारंगी रंग का चमकीला वलय और उसके बीच एक काला घेरा देखा। सामान्य व्यक्ति के मन में सवाल उठता है कि यदि ब्लैक होल काला है, तो यह चमकीली कड़ी किसकी है? वास्तव में, ब्लैक होल अपने अतिप्रचंड गुरुत्वाकर्षण के कारण आसपास की गैस और पदार्थ को अपनी ओर खींचता है। यह पदार्थ ब्लैक होल के चारों ओर एक चक्राकार थाली बनाता है, जिसे एक्रीशन डिस्क (accretion disk) कहते हैं।
अत्यधिक घर्षण और दबाव के कारण यह गैस सैकड़ों अरब डिग्री तक गर्म हो जाती है और उसमें से प्रचंड प्रकाश उत्सर्जित होता है। आइंस्टीन के सामान्य सापेक्षतावाद के अनुसार, गुरुत्वाकर्षण प्रकाश के पथ को मोड़ देता है जिसे ग्रेविटेशनल लेंसिंग (gravitational lensing) कहते हैं। ब्लैक होल के पीछे स्थित प्रकाश भी उसके गुरुत्वाकर्षण के कारण मुड़कर हमारी ओर आता है, जिससे एक पूर्ण चमकीली रिंग बनती है। केंद्र में दिखाई देने वाला काला क्षेत्र वास्तव में ब्लैक होल की ‘परछाईं’ (shadow) है, जो इवेंट होराइजन से लगभग ढाई गुना बड़ा दिखाई देता है।
| ऑब्जेक्ट / स्रोत | प्रकार | द्रव्यमान / दूरी | ऐतिहासिक महत्व |
|---|---|---|---|
| Cygnus X-1 | स्टेलर-मास (Stellar-mass) | सूर्य से दस गुना द्रव्यमान | 1971-1974 में प्रथम प्रमाण के साथ स्वीकृत ब्लैक होल |
| Sagittarius A* | सुपरमैसिव (Supermassive) | लगभग 4.3 मिलियन सूर्य द्रव्यमान | हमारी आकाशगंगा (Milky Way) के केंद्र में स्थित |
| Messier 87 (M87*) | सुपरमैसिव (Supermassive) | पृथ्वी से 55 मिलियन प्रकाशवर्ष दूर | इवेंट होराइजन टेलीस्कोप द्वारा ली गई पहली सीधी छवि |

इस तस्वीर में चमकीली रिंग का निचला हिस्सा अधिक चमकता हुआ दिखाई देता है, जो डॉप्लर बीमिंग (Doppler beaming) प्रभाव को दर्शाता है। यह दिखाता है कि एक्रीशन डिस्क का पदार्थ अत्यंत गति से हमारी दिशा में घूम रहा है। बाद में वैज्ञानिकों ने इसी ब्लैक होल की ध्रुवीकृत प्रकाश (polarized light) वाली छवि भी प्राप्त की, जिसने ब्लैक होल के किनारे पर मौजूद शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्रों की संरचना को उजागर किया।

स्थिर तस्वीर से ब्लैक होल के सिनेमा की ओर
इवेंट होराइजन टेलीस्कोप का यह कार्य केवल एक तस्वीर लेने तक सीमित नहीं था। इसने आइंस्टीन के सामान्य सापेक्षतावाद को ब्रह्मांड के सबसे चरम वातावरण में परखकर सौ प्रतिशत सही साबित किया। यदि सामान्य सापेक्षतावाद में ज़रा भी कमी होती, तो इस परछाईं का आकार गोलाकार न रहकर विकृत हो गया होता।
शेप डोलेमैन और क्वांटा मैगज़ीन के संवाद के अनुसार, खगोल विज्ञान अब अगले चरण में प्रवेश कर रहा है। वैज्ञानिक आने वाले समय में टेलीस्कोप नेटवर्क में और अधिक नई वेधशालाएं जोड़ रहे हैं। डोलेमैन के अनुसार, 2030 के दशक की शुरुआत तक वैज्ञानिक ब्लैक होल की न केवल स्थिर तस्वीरें, बल्कि उसके चारों ओर घूमते पदार्थ और निकलने वाले जेट्स के रियल-टाइम वीडियो (मूवीज़) भी रिकॉर्ड कर सकेंगे। सदियों पहले केवल कल्पना में रहने वाला ब्रह्मांड का यह सबसे अंधकारमय कोना अब मानव बुद्धि और तकनीक की बदौलत विज्ञान की खुली किताब बन रहा है।


