इलेक्ट्रॉनिक युद्ध में अजेय बनते ड्रोन: जैमिंग से सुरक्षा प्रदान करने वाली तकनीक और भारत की तैयारी
आधुनिक युद्धभूमि पर ड्रोन और जैमर के बीच की दौड़ तेज हो गई है। रूस-यूक्रेन युद्ध से मिले सबक और भारत की रक्षा के लिए इसकी अनिवार्यता पर एक विस्तृत विश्लेषण।

आधुनिक युद्ध के मैदान में अब केवल गोलियां और मिसाइलें ही नहीं, बल्कि अदृश्य तरंगें भी लड़ाई लड़ रही हैं। नवंबर 2026 के पहले सप्ताह में रूस द्वारा यूक्रेन पर किए गए निरंतर ड्रोन हमलों ने दुनिया को दिखाया है कि ड्रोन तकनीक कितनी तेजी से बदल रही है। यूक्रेन के रक्षा मंत्रालय के अनुसार, केवल अक्टूबर महीने में ही उन्होंने 8,000 से अधिक ड्रोनों और मिसाइलों को रोका था, जो सितंबर के 4,700 के आंकड़े से लगभग दोगुना है। ये आंकड़े दर्शाते हैं कि युद्ध अब केवल जमीन पर ही नहीं, बल्कि इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम यानी रेडियो तरंगों के क्षेत्र में भी लड़ा जा रहा है।
સંખ્યા
इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर (electronic warfare) या EW एक ऐसी युद्ध पद्धति है जिसमें इलेक्ट्रोमैग्नेटिक ऊर्जा का उपयोग दुश्मन के संचार और रडार सिस्टम को बाधित करने के लिए किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य दुश्मन को स्पेक्ट्रम का उपयोग करने से रोकना और अपने बलों के लिए इसका निर्बाध उपयोग सुनिश्चित करना है। विकिपीडिया की रिपोर्ट के अनुसार, EW के तीन मुख्य विभाग हैं: इलेक्ट्रॉनिक अटैक (electronic attack), इलेक्ट्रॉनिक प्रोटेक्शन (electronic protection) और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सपोर्ट (electronic warfare support)। जब हम 'जैम-रेसिस्टेंट' या जैमिंग से सुरक्षा प्रदान करने वाले ड्रोन की बात करते हैं, तब हम इलेक्ट्रॉनिक प्रोटेक्शन के क्षेत्र में प्रवेश करते हैं।
जैमिंग (jamming) इलेक्ट्रॉनिक अटैक का एक प्रकार है, जिसमें दुश्मन के ड्रोन और उसके ऑपरेटर के बीच के रेडियो सिग्नल में हस्तक्षेप किया जाता है। यदि यह संपर्क टूट जाता है, तो ड्रोन या तो रास्ता भटक जाता है या फिर वह एक अंधे हथियार की तरह पूर्व-निर्धारित कोऑर्डिनेट्स पर उड़ता है। इस समस्या का समाधान करने के लिए रूस ने अपने शाहेद (Shahed) ड्रोन में बड़े बदलाव किए हैं। Firstpost की रिपोर्ट के अनुसार, कीव (Kyiv) के ऊपर उड़ने वाले नए शाहेद ड्रोन में अब 32 एलिमेंट्स वाले सैटेलाइट नेविगेशन एंटीना (antenna) लगाए गए हैं, जो एक साल पहले केवल 16 थे। एंटीना में जितने अधिक एलिमेंट्स होंगे, वे उतने ही अधिक जैमर्स को एक साथ ब्लॉक कर सकते हैं।
यह तकनीक कैसे काम करती है, इसे समझने के लिए एक सरल उदाहरण लेते हैं। मान लीजिए कि आप भीड़भाड़ वाले कमरे में अपने मित्र से बात कर रहे हैं और आसपास के लोग जोर-जोर से चिल्लाकर आपको परेशान कर रहे हैं। यदि आपके पास ऐसी क्षमता हो कि आप केवल अपने मित्र की आवाज पर ही ध्यान केंद्रित करें और बाकी आवाजों को हटा दें, तो वह इलेक्ट्रॉनिक प्रोटेक्शन है। ड्रोन में लगे मल्टी-एलिमेंट एंटीना बिल्कुल यही काम करते हैं। वे पहचानते हैं कि जैमिंग सिग्नल किस दिशा से आ रहा है और उस दिशा के सिग्नल को नकार देते हैं, जबकि सैटेलाइट से आने वाले कमजोर सिग्नल को पकड़े रखते हैं।
रूस ने न केवल एंटीना, बल्कि ड्रोन की गति और संचार प्रणाली में भी क्रांतिकारी बदलाव किए हैं। नए गेरान-5 (Geran-5) ड्रोन अब चीनी टर्बोजेट (turbojet) इंजन पर चलते हैं, जो इसकी गति को 600 किमी/घंटा तक ले जाते हैं। रूस अब 900 किमी/घंटा की गति हासिल करने के लिए परीक्षण कर रहा है, जो इसे लगभग क्रूज मिसाइल जितना तेज बनाता है। इतनी गति के कारण रक्षा प्रणालियों को प्रतिक्रिया देने के लिए केवल कुछ ही मिनट मिलते हैं। सितंबर में यूक्रेन केवल 57 प्रतिशत जेट-संचालित ड्रोन को ही रोक पा रहा था, हालांकि हाल ही में यह दर बढ़कर 74 प्रतिशत हो गई है, लेकिन यह अभी भी धीमे प्रोपेलर ड्रोन के खिलाफ सफलता दर से कम है।
| विवरण | पुरानी स्थिति | नई स्थिति |
|---|---|---|
| सैटेलाइट एंटीना एलिमेंट्स | 16 | 32 |
| ड्रोन की गति | धीमी (प्रोपेलर) | 600-900 किमी/घंटा (टर्बोजेट) |
| सफलता की दर (इंटरसेप्शन) | अधिक | कम (74%) |
- सिग्नल ग्रहणड्रोन का 32-एलिमेंट एंटीना सैटेलाइट और ग्राउंड कंट्रोल दोनों से रेडियो सिग्नल प्राप्त करता है।
- जैमिंग की पहचानसिस्टम विश्लेषण करता है कि कौन से सिग्नल असली हैं और कौन से दुश्मन द्वारा भेजे गए जैमिंग तरंगें हैं।
- डिजिटल फिल्टरिंगएंटीना अपने बीम-फॉर्मिंग एल्गोरिदम द्वारा जैमिंग की दिशा से आने वाले शोर को ब्लॉक करता है।
- स्वायत्त नेविगेशनयदि जैमिंग बहुत प्रबल हो, तो ड्रोन अपने ऑन-बोर्ड मॉडेम और पूर्व-निर्धारित नक्शे का उपयोग करके लक्ष्य की ओर आगे बढ़ता है।
इन ड्रोन्स में अब चीनी निर्मित मॉडेम (modem) का उपयोग करके मेश रेडियो नेटवर्क (mesh radio network) बनाया जाता है। इस नेटवर्क के माध्यम से रूस में बैठा ऑपरेटर ड्रोन के कैमरे के जरिए लाइव फुटेज देख सकता है और अंतिम मिनटों में लक्ष्य का चयन कर सकता है। यदि जैमिंग के जरिए यह लिंक टूट जाए, तभी ड्रोन अपनी सटीकता खोता है। यही कारण है कि यूक्रेन ने कीव के आसपास सैकड़ों साइटों पर जैमर और एंटीना का एक इलेक्ट्रॉनिक कवच बनाया है। हालांकि, रूस अब गेरबेरा (Gerbera) और पैरोडिया (Parodiya) जैसे डिकॉय (decoy) यानी नकली ड्रोन्स का भी उपयोग कर रहा है, जिसका उद्देश्य यूक्रेन की महंगी मिसाइलों को बर्बाद करना और उनकी एयर डिफेंस सिस्टम की स्थिति का पता लगाना है।

भारत के लिए यह तकनीकी प्रगति अत्यंत महत्वपूर्ण है। 8 और 9 मई 2025 की रात को पाकिस्तान ने लेह से लेकर सर क्रीक तक के 36 स्थानों पर 300 से 400 ड्रोन भेजे थे। भारतीय अधिकारियों के अनुसार, इस हमले का उद्देश्य भारत की एयर डिफेंस सिस्टम की मैपिंग करना था। भारत ने आकाशतीर (Akashteer) सिस्टम और जैमर के जरिए अधिकांश ड्रोन्स को मार गिराया था, लेकिन वे ड्रोन धीमे और सस्ते थे। भविष्य में पाकिस्तान भी चीन से आधुनिक टर्बोजेट इंजन और 32-एलिमेंट एंटीना वाले ड्रोन प्राप्त कर सकता है, जो भारत के आकाश और एमआरएसएएम (MRSAM) मिसाइलों के स्टॉक को खाली कर सकते हैं।
भारतीय सेना के परीक्षणों में पाया गया है कि ऑपरेशन सिंदूर के बाद, 46 भारतीय ड्रोन निर्माताओं में से कोई भी जैमिंग या स्पूफिंग (spoofing) - यानी गलत सिग्नल देकर ड्रोन को भटकाना - के सामने टिक नहीं पाया। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए, रक्षा मंत्रालय ने आईआईटी कानपुर (IIT Kanpur) में ₹500 करोड़ की लागत से ड्रोन टेक्नोलॉजी हब को मंजूरी दी है। इस हब का मुख्य उद्देश्य जैम-रेसिस्टेंट लिंक्स और नेविगेशन सिस्टम विकसित करना है, ताकि भारतीय ड्रोन दुश्मन के इलेक्ट्रॉनिक कवच को भेद सकें।

- सिग्नल फिल्टरिंगड्रोन का मल्टी-एलिमेंट एंटीना जैमिंग सिग्नल किस दिशा से आ रहा है, यह पहचानता है।
- अवांछित सिग्नल रद्द करनायह जैमर के सिग्नल को नकार देता है और केवल सैटेलाइट से आने वाले कमजोर सिग्नल पर ध्यान केंद्रित करता है।
- नेविगेशन रखरखावइस प्रक्रिया के कारण ड्रोन जैमिंग होने के बावजूद भी अपने निर्धारित मार्ग पर उड़ना जारी रखता है।
यूक्रेन के अनुभव से भारत के लिए चार मुख्य सबक हैं। पहला, जैमर नेटवर्क से जुड़े होने चाहिए और बड़ी संख्या में उत्पादित किए जाने चाहिए। दूसरा, महंगी मिसाइलों को बचाने के लिए सस्ते 'हार्ड किल' (hard kill) विकल्प जैसे कि एंटी-ड्रोन गन और इंटरसेप्टर ड्रोन विकसित करने होंगे। तीसरा, पठानकोट, आदमपुर और श्रीनगर जैसे एयरबेस के आसपास 600 किमी/घंटा की गति से आने वाले लक्ष्यों को ट्रैक करने के लिए रडार कवरेज को और सघन बनाना होगा। और चौथा, सप्लाई चेन पर नियंत्रण होना जरूरी है, क्योंकि चीन जैसे देश कभी भी ड्रोन इंजन के निर्यात पर प्रतिबंध लगा सकते हैं।
इलेक्ट्रॉनिक युद्ध का इतिहास काफी पुराना है। विकिपीडिया के अनुसार, 1899-1902 के बोअर युद्ध के दौरान ब्रिटिश सेना ने मोर्स कोड भेजने के लिए सर्चलाइट का उपयोग किया था, जिसे बोअर्स ने अपनी सर्चलाइट से जैम करने का प्रयास किया था। आज उस सर्चलाइट की जगह अत्याधुनिक एंटीना और एल्गोरिदम ने ले ली है। जैसे-जैसे ड्रोन अधिक स्वायत्त और जैम-रेसिस्टेंट बनते जाएंगे, वैसे-वैसे युद्ध का परिणाम इस पर निर्भर करेगा कि किसके पास बेहतर तकनीक है। भारत के लिए यह केवल तकनीक का विषय नहीं है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की अनिवार्यता है।


