जंतर-मंतर छात्र प्रदर्शन में हिंसा के सबूत नहीं, सुप्रीम कोर्ट ने किया उल्लेख
जांच समिति को अब तक बहुत कम शिकायतें मिली होने के कारण किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सका
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
6 नवंबर 2026, सुबह 8:40 · 4 मिनट का पाठ
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सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि 20 जुलाई को जंतर-मंतर पर हुए छात्रों के प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा और पुलिस द्वारा किए गए अत्याचारों की जांच कर रही समिति को अब तक बहुत कम शिकायतें मिली हैं। पर्याप्त सामग्री उपलब्ध न होने के कारण जांच समिति फिलहाल किसी निश्चित निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकी है।
इस मामले की जांच के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी की अध्यक्षता में एक उच्चाधिकार प्राप्त जांच समिति (HPEC) का गठन किया गया है। इस समिति ने अदालत को सूचित किया कि शिकायतें प्राप्त करने के लिए ऑनलाइन पोर्टल और ईमेल की व्यवस्था किए जाने के बावजूद लोगों ने बहुत कम शिकायतें दर्ज कराई हैं। समिति ने बताया कि 29 अक्टूबर को हुई बैठक में केवल एक शिकायतकर्ता शपथ पत्र के साथ उपस्थित हुआ था।
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, समिति ने शिकायतें आमंत्रित करने के लिए देशभर के 149 समाचार पत्रों में सार्वजनिक नोटिस प्रकाशित किए थे। 13 अक्टूबर को ऑनलाइन पोर्टल शुरू किया गया था, जिसमें शिकायतकर्ता के लिए नाम, आधार नंबर या अन्य पहचान देना अनिवार्य नहीं रखा गया था। इस पोर्टल की पहुंच केवल समिति के अध्यक्ष और संबंधित अधिकारियों के पास है। इसके अलावा ईमेल, डाक और कार्यालय में व्यक्तिगत रूप से शिकायत देने की सुविधा भी दी गई थी। 17 अक्टूबर को प्रेस विज्ञप्ति जारी की गई थी और 21 अक्टूबर को फिर से शिकायतें मांगी गई थीं, फिर भी पोर्टल पर बहुत कम शिकायतें आईं और ईमेल या डाक के माध्यम से कोई शिकायत नहीं मिली।
दूसरी ओर, याचिकाकर्ताओं की ओर से उपस्थित एडवोकेट वृंदा ग्रोवर ने तर्क दिया कि उन्होंने पोर्टल शुरू होने से पहले ही समिति को शिकायतें सौंपी थीं और पोर्टल शुरू होने के बाद निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार एक और शिकायत जमा कराई थी। उन्होंने आगे कहा कि हिंसा के मामलों में एक भी प्राथमिकी (FIR) दर्ज नहीं की गई है। ग्रोवर ने सवाल उठाया कि प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन चलाने की अनुमति किसने दी थी और उनके अनुसार केंद्र सरकार द्वारा समिति की रिपोर्ट में इस संबंध में कोई जानकारी नहीं दी गई है। इस संदर्भ में उल्लेख किया गया कि राहुल गांधी ने 20 जुलाई के पैलेट गन हमले में घायल साहिल नामक छात्र के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी, जिसमें आरोप है कि पैलेट गन के कारण छात्र की आंखों की रोशनी चली गई है।
वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन का कहना था कि सुप्रीम कोर्ट में दाखिल वीडियो और अन्य सामग्री समिति को भेजी जा सकती है, ताकि प्रत्येक पीड़ित को अलग-अलग उपस्थित न होना पड़े। हालांकि, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस बात पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि जनहित याचिका दायर करने वाले तीसरे पक्ष के लोग पीड़ितों की संख्या के बारे में गलत दावे कर सकते हैं। उन्होंने उदाहरण दिया कि कोई 50 पीड़ितों का दावा कर सकता है, लेकिन वास्तव में केवल 5 पीड़ित ही हों।
सीजेआई सूर्यकांत ने याचिकाकर्ताओं से कहा कि वे पीड़ितों को समिति के समक्ष अपनी बात रखने के लिए प्रोत्साहित करें। उन्होंने उल्लेख किया कि याचिकाकर्ताओं द्वारा जमा की गई सामग्री और समिति तक पहुंची सामग्री के बीच अंतर है। कोर्ट ने आदेश दिया है कि याचिकाकर्ता अपने पास मौजूद सभी संबंधित सामग्री, जिसमें सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाएं, शपथ पत्र और वीडियो क्लिप की प्रतियां शामिल हैं, समिति को भेजें। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि HPEC पीड़ितों द्वारा भेजी गई सामग्री पर विचार करेगी और समिति को संबंधित पक्षों से जवाब लेकर नियमित अंतराल पर अंतरिम रिपोर्ट पेश करनी होगी।
जस्टिस जोयमाल्य बागची ने स्पष्ट किया कि समिति का गठन पुलिस अधिकारियों या उनके वरिष्ठों को कार्रवाई करने से नहीं रोकता है। यदि उन्हें लगता है कि घटनास्थल पर तैनात किसी पुलिसकर्मी ने गलत काम किया है, तो वे उसके खिलाफ कार्रवाई कर सकते हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने पैनल को रिपोर्ट दाखिल करने के लिए एक महीने का समय दिया है।
यह पूरा विवाद 20 जुलाई को संसद की ओर मार्च के दौरान हुई झड़प से शुरू हुआ था।
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