बीएमसी कमिश्नर सामने अवमानना नोटिस, वेतन रोकल गइलू आ जुर्माना ठोकल् गइल
मुंबई में बेस्ट बस स्टैंड के जमीन पर से अतिक्रमण ना हटवले पर सुप्रीम कोर्ट कड़ा रुख अपनाले बा।
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
4 नवंबर 2026, दोपहर 2:53 · 4 मिनट का पाठ
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एनडीटीवी, मिंट आ दैनिक भास्कर के रिपोर्ट के मुताबिक, मुंबई में बृहन्मुंबई म्युनिसिपल कॉरपोरेशन (बीएमसी) के म्युनिसिपल कमिश्नर अश्विनी भिड़े के मुसकिल बढ़ गइल बा। सुप्रीम कोर्ट मंगर के बीएमसी कमिश्नर के खिलाफ कोर्ट के अवमानना के कार्रवाई शुरू कइले बा आ उनकरा के कारण बताओ नोटिस जारी कइले बा। ई कार्रवाई बेस्ट बस स्टैंड खातिर तय कईल गइल जमीन पर से अतिक्रमण हटवले के आदेश के पालन ना करे के वजह से कइल गइल बा।
मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत, न्यायाधीश जॉयमाल्य बागची आ न्यायाधीश वी. मोहना के बनल तीन सदस्या के पीठ ई आदेश देले बा। अदालत कमिश्नर से पुछले बा कि काहे ना उनकरा खिलाफ उचित कार्रवाई कइल जाव। सुप्रीम कोर्ट बीएमसी पर ₹५ लाख के जुर्माना भी ठोकले बा आ अर्जी खारिज कर देले बा। एह संगे, जब तक आदेशन के पालन ना होखे, तब तक बीएमसी आ महाराष्ट्र सरकार के कमिश्नर या उनकर निजी स्टाफ के मासिक वेतन ना छोड़े के निर्देश देले बा।
अदालत कड़ा टिप्पणी करत बतावेले कि म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के कमिश्नर अवमानना के दोषी बाड़न आ ऊ १३ नवंबर २०२५ तथा २८ जुलाई २०२६ के दिहल गइल समयसीमा वाला आदेशन के जानबूझकर उल्लंघन कइले बाड़न। अदालत बीएमसी के अउरी समय मांगे के अर्जी खारिज कर देले आ साफ क देले कि एक दिन के भी समय अउरी ना दिहल जाई।
सुप्रीम कोर्ट एह मामला में बीएमसी अधिकारीयन के नीति पर भी सवाल उठवले रहे। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत मौखिक टिप्पणी करत बतावेले कि का बीएमसी के अधिकारी अतिक्रमण करे वाला लोगन से मिल गइल बाड़न? का एहसे ई साबित ना होला कि अधिकारीयन के मिलीभगत बा? सीजेआई चेतावनी देले रहन कि अगर अधिकारी सीधा भाषा ना समझिहैं त उनकरा के जेल भेज दिहल जाई, तब उनकरा अदालत के आदेश के कीमत समझ में आवे के।
ई पूरा विवाद मुंबई के बोरिवली में एगो सार्वजनिक बेस्ट बस स्टेशन के जमीन से जुड़ल बा। एह जमीन के लेके बीएमसी आ एगो निजी डेवलपर के बीच लंबा समय से कानूनी लड़ाई चल रहल रहे। पहिले १३ अगस्त २०२५ के सुप्रीम कोर्ट निजी डेवलपर के निर्देश देले रहे कि ऊ प्रशासनिक भवन समेत संबंधित प्लॉट के खाली आ शांतिपूर्ण कब्जा बीएमसी के सौंप दे। ई जमीन ३,४०० वर्ग मीटर क्षेत्रफल में फैलल रहे। अदालत बीएमसी के तीन महीना के समय देले रहे कि ऊ जमीन के कब्जा ले ले, कानून के मुताबिक बाकी अतिक्रमण हटा ले आ बस स्टेशन के पूरी तरह चालू कर दे।
एह बाद, २८ जुलाई २०२६ के सुप्रीम कोर्ट फेरु से बीएमसी के ई काम पूरा करे आ तीन महीना में अतिक्रमण हटावे खातिर निर्देश देले रहे। अदालत साफ क देले रहे कि महाराष्ट्र क्षेत्रीय आ नगर रचना अधिनियम, १९६६ के तहत नोटिसन के खिलाफ दीवानी अदालत के कार्रवाई अतिक्रमण हटावे में कवनो बाधा ना बन पाई, काहेकि सिविल कोर्ट कवनो अंतरिम रोक ना लगवले बा।
मंगर के सुनवाई के दौरान बीएमसी के तरफ से हाजिर वरिष्ठ वकील आर.पी. भट्ट अदालत में बार-बार भरोसा दिलावे के कोशिश कइले कि नागरिक निकाय ३० दिन के भीतर आदेशन के पालन कर ली। एह पर कटाक्ष करत मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत कहले रहन कि अगर ऊ आदेश के पालन करिहैं त अदालत उनकरा के प्रशस्ति पत्र (एप्रिहिएसन सर्टिफिकेट) दी। अदालत ई भी कहलस कि ई एगो पूरा, जानबूझ के कइल गइल तावड़तोड़ उल्लंघन बा आ अधिकारी अतिक्रमणकारी लोगन के बचा रहल बाड़न।
सुनवाई के दौरान बीएमसी के तरफ से अउरी दलील दीहल गइल कि स्थानीय अधिकारीयन के अतिक्रमण हटावे के कार्रवाई से पहिले मराठी दस्तावेज के अंग्रेजी में अनुवाद करावे के जरूरत बा। एह दलील पर अदालत भारी गुस्सा जवले। न्यायाधीश बागची सवाल कइले कि हलफनामा दाखिल करे वाला अधिकारी डॉ. तांबे बाड़न, त का अदालत ई मान ले कि उनकरा मराठी भाषा ना आवेला?
फिलहाल खातिर अदालत कमिश्नर आ उनकर निजी स्टाफ के वेतन रोके के आदेश दे देले बा आ अगला समय में एह मामला में अउरी सख्त कदम उठावे के संकेत देले बा।
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