वैवाहिक विवाद गर्भपात का आधार नहीं बन सकते: सुप्रीम कोर्ट
25 सप्ताह के गर्भपात की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने पति को पत्नी के खिलाफ सभी आरोप वापस लेने का आदेश दिया
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
6 नवंबर 2026, सुबह 7:11 · अपडेट सुबह 7:24 · 5 मिनट का पाठ
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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि पति-पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद या कड़वे शब्दों का आदान-प्रदान गर्भपात कराने का आधार नहीं बन सकता। जस्टिस बीवी नागरथना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने स्पष्ट किया कि केवल पति के साथ झगड़े के कारण कोई महिला गर्भपात का निर्णय नहीं ले सकती।
इस मामले में एक महिला ने अपने 25 सप्ताह के गर्भपात के लिए आवेदन किया था, जिसका पति विरोध कर रहा था। सुप्रीम कोर्ट ने पति को निर्देश दिया है कि उसे अपनी पत्नी के खिलाफ मौखिक, लिखित या डिजिटल माध्यम से लगाए गए सभी आरोपों को वापस लेने के लिए एक हलफनामा (एफिडेविट) दाखिल करना होगा। इन आरोपों में फैमिली व्हाट्सएप ग्रुप पर की गई बातें भी शामिल हैं। कोर्ट ने आगे कहा कि पति को अपने आरोपों पर पश्चाताप व्यक्त करना चाहिए और पत्नी से माफी मांगनी चाहिए।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने गौर किया कि इस जोड़े के बीच मतभेद इतने बढ़ गए हैं कि महिला अपने पहले गर्भधारण की स्थिति में गर्भपात चाहती है, जबकि चिकित्सकीय रूप से ऐसा करने का कोई कारण नहीं है। पीठ ने सवाल किया कि क्या हर वैवाहिक असहमति को गर्भपात के निर्णय की ओर ले जाना चाहिए? कोर्ट ने सख्त शब्दों में कहा, "कड़वे शब्दों के आदान-प्रदान के कारण हम गर्भपात की अनुमति नहीं दे सकते। आपका अहंकार सब कुछ खत्म कर देता है।"
महिला के वकील ने कोर्ट को बताया कि दंपत्ति के बीच एक मुलाकात के दौरान पति ने धमकी दी थी कि यदि वह गर्भपात कराएगी तो वह शादी जारी नहीं रखेगा। यह आरोप भी लगाया गया कि पति ने फैमिली व्हाट्सएप ग्रुप पर पत्नी के चरित्र पर आरोप लगाकर और अविवाहित संबंधों में शामिल होने का दावा कर उसकी मानहानि की। महिला अपने निर्णय पर अडिग रही और उसके वकील ने दलील दी कि गर्भधारण जारी रखने से उसे गहरा मानसिक आघात लग सकता है और यह बच्चे के स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर सकता है। वकील ने बताया कि महिला अब शादी भी जारी नहीं रखना चाहती।
दूसरी ओर, पति के वकील ने व्हाट्सएप पर चरित्र के बारे में कोई संदेश भेजने से इनकार किया, लेकिन दावा किया कि उनके पास पत्नी के खिलाफ सबूत हैं जिन्हें उन्होंने जानबूझकर छिपाया क्योंकि वे रिश्ते बचाने में अधिक रुचि रखते थे। सुप्रीम कोर्ट ने पति से कहा कि यदि वह माफी मांगने के लिए तैयार है, तो ऐसे आरोपों और सामग्री को वापस लिया जा सकता है और उन्हें अतीत में छोड़ा जा सकता है। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि गर्भ में पल रहा बच्चा उसका भी है और दंपत्ति के बीच आरोपों का आदान-प्रदान गर्भपात के लिए पर्याप्त कारण नहीं माना जा सकता।
पीठ ने महिला के वकील से सवाल किया, "क्या आप अभी भी परस्पर वैवाहिक बंधन में नहीं जुड़े हैं?" कोर्ट ने नोट किया कि दंपत्ति की शादी अभी जारी है और विवाद के कारण उनकी वैवाहिक स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है। कोर्ट ने आगे कहा, "यह यौन हमला या बलात्कार का मामला नहीं है। यह वैवाहिक जीवन के भीतर है। कल अगर कोई महिला कहे कि 'मेरे पति के साथ झगड़ा हुआ है इसलिए मुझे गर्भपात कराना है', तो हम किस दिशा में जा रहे हैं?"
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पति या ससुराल पक्ष द्वारा इस्तेमाल किए गए अपशब्द या कड़वे शब्द गर्भपात का स्वतः कारण नहीं बन सकते। कोर्ट ने इस स्थिति को उन मामलों से अलग बताया जिनमें महिला पहले ही तलाक ले चुकी हो। कोर्ट ने कहा कि क्या सिर्फ इसलिए कि पति कुछ कहता है, आप गर्भपात कराएंगी? दंपत्ति को रिश्तों में आने वाले मतभेदों को सहने में सक्षम होना चाहिए। कोर्ट ने पति को आदेश दिया है कि उसे फैमिली व्हाट्सएप ग्रुप पर पत्नी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को वापस लेकर सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी होगी। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि गर्भ स्वस्थ है और महिला चिकित्सकीय रूप से फिट है, इसलिए गर्भपात के लिए कोई चिकित्सीय कारण नहीं है। इस मामले की अगली सुनवाई 4 नवंबर को तय की गई है।
पिछले हफ्ते भी कोर्ट ने इस विवाद में हस्तक्षेप किया था और अलग हो चुके दंपत्ति से अनुरोध किया था कि महिला की गर्भपात याचिका पर निर्णय लेने से पहले वे अपने छह महीने पुराने वैवाहिक जीवन को एक और मौका दें।
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