केंद्र सरकार ने विमान टिकटों के किराए को नियंत्रित करने के लिए नए नियम जारी किए
असाधारण परिस्थितियों में जनहित को ध्यान में रखते हुए सरकार को विमान किराए के संबंध में सीधे निर्देश देने का अधिकार मिल गया है।
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
2 नवंबर 2026, दोपहर 2:12 · अपडेट रात 8:29 · 3 मिनट का पाठ
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केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्रालय द्वारा नए नियमों की घोषणा की गई है, जिसके तहत असाधारण परिस्थितियों में और जनहित में केंद्र सरकार एयरलाइन कंपनियों के विमान टिकटों के किराए में हस्तक्षेप कर सकेगी। NDTV की रिपोर्ट के अनुसार, यह कदम कच्चे तेल और एविएशन टर्बाइन फ्यूल यानी ATF की बढ़ती कीमतों के कारण बढ़ते विमान किराए की चिंताओं के बीच उठाया गया है।
केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्रालय द्वारा भारतीय विमानन नियम, 2026 के तहत यह निर्देश जारी किया गया है। इन नए नियमों के अनुसार, यदि सरकार को लगता है कि कोई असाधारण स्थिति उत्पन्न हुई है और जनहित में हस्तक्षेप करना आवश्यक है, तो केंद्र सरकार एयरलाइनों को किराए के संबंध में सीधे दिशा-निर्देश दे सकेगी। हालांकि, इस प्रकार के निर्देश वर्तमान परिस्थितियों के अनुसार आनुपातिक होने चाहिए और केवल निर्धारित अवधि के लिए ही लागू रहेंगे।
इन नए नियमों के अंतर्गत नियम 192 के अनुसार, शेड्यूल्ड एयर सर्विस संचालित करने वाली एयरलाइन को परिचालन लागत सहित विभिन्न कारकों को ध्यान में रखते हुए अपने किराए तय करने होंगे और किराए का यह विवरण निदेशालय महान नागरिक उड्डयन यानी DGCA के समक्ष प्रस्तुत करना होगा। DGCA शेड्यूल्ड एयरलाइनों द्वारा निर्धारित इस टैरिफ पर निरंतर नजर रखेगा। इसके अलावा, एयरलाइनों के लिए पारदर्शिता बनाए रखने और यात्रियों को सूचित रखने के लिए अपनी वेबसाइट और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी किराए प्रकाशित करना अनिवार्य कर दिया गया है।
टिकटों के किराए में पारदर्शिता की आवश्यकताओं को यह अधिसूचना और अधिक मजबूत बनाती है। इन नियमों के अनुसार, बुकिंग प्रक्रिया के दौरान और टिकट पर यात्रियों द्वारा भुगतान की जाने वाली कुल राशि दिखाना एयरलाइनों के लिए अनिवार्य है। इसके साथ ही, एयरलाइनों को बेस फेयर यानी मूल किराया, टैक्स, फीस, कैंसलेशन चार्जेस यानी रद्दीकरण शुल्क, रिफंड की शर्तें और अन्य लागू शुल्कों का अलग-अलग विवरण देना होगा। ये नियम विशेष रूप से सरकार को देय टैक्स और यात्रियों को प्रदान की जाने वाली सेवाओं या सुविधाओं के लिए एयरलाइनों द्वारा एकत्र किए जाने वाले शुल्क के बीच स्पष्ट अंतर करते हैं।
यहाँ उल्लेखनीय है कि भारत में वर्ष 1994 में एयरलाइन किराया निर्धारण प्रक्रिया को डीरेगुलेट किया गया था, ताकि विमान कंपनियां बाजार की स्थिति के आधार पर टिकटों के दाम तय कर सकें। नागरिक उड्डयन मंत्रालय द्वारा इस बात को बनाए रखा गया है कि एयरलाइन आमतौर पर मांग, परिचालन लागत और बुकिंग के समय के आधार पर किराया तय करती हैं, जिसमें यात्रियों के लिए विभिन्न प्राइस बैंड उपलब्ध होते हैं।
पूर्व के एयरक्राफ्ट रूल्स, 1937 के तहत, नियम 135(4) DGCA को उद्योग में अत्यधिक या शिकारी कीमतों यानी प्रीडेटरी प्राइसिंग या ओलिगोपोलिस्टिक प्रथाएं दिखने पर दिशा-निर्देश जारी करने का अधिकार देता था। हालांकि, हाल ही में प्रस्तावित नया नियम 192 एयरलाइन टैरिफ पर नजर रखने के प्रावधान को बनाए रखता है, लेकिन यह विशेष रूप से अत्यधिक या प्रीडेटरी प्राइसिंग और ओलिगोपोलिस्टिक प्रथाओं को सरकारी हस्तक्षेप के आधार के रूप में सूचीबद्ध नहीं करता है। फिर भी, यह नया ढांचा केंद्र सरकार को नियमों में निर्धारित शर्तों के अधीन रहते हुए असाधारण परिस्थितियों में एयरलाइन किराए के संबंध में आदेश जारी करने की व्यापक शक्ति प्रदान करता है।
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