करावल नगर मस्जिद आगजनी मामले में पांच आरोपी बरी
दिल्ली की अदालत ने गवाहों के बयानों में विरोधाभास और सीसीटीवी सबूतों की कमी के कारण पांच लोगों को बरी किया
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
6 नवंबर 2026, सुबह 2:10 · अपडेट सुबह 2:28 · 4 मिनट का पाठ
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दिल्ली की करकड़डूमा अदालत ने वर्ष 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली के करावल नगर इलाके में हुए दंगों के दौरान मस्जिद को तोड़ने और आग लगाने के आरोपी पांच व्यक्तियों को बरी कर दिया है। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयानों में गंभीर विरोधाभास और सीसीटीवी फुटेज साबित करने में हुई त्रुटियों के कारण आरोपियों की संलिप्तता स्थापित नहीं हो सकी। एडिशनल सेशंस जज परवीन सिंह ने 31 अक्टूबर को फैसला सुनाते हुए आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए सभी आरोपों से मुक्त कर दिया।
इस मामले में अंकित, सौरभ शर्मा, रोहित, राहुल कुमार और सचिन पर दंगा करने, गैरकानूनी सभा का सदस्य बनने, संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और मस्जिद में आग लगाने जैसे आरोप थे। इस मामले की शुरुआत 1 मार्च, 2020 को इमरान द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत से हुई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि करावल नगर इलाके की शहीद भगत सिंह कॉलोनी की गली नंबर 12 में स्थित अल्लाह वाली मस्जिद को 24 फरवरी को आग लगा दी गई थी। शिकायत के अनुसार, मस्जिद के प्रवेश द्वार के पास स्लैब पर मूर्ति रखी गई थी और मस्जिद की चार मंजिलों पर रखे सामान को जला दिया गया था। पुलिस ने शुरू में भारतीय दंड संहिता की धारा 147, 148, 149 और 436 के तहत मामला दर्ज किया था।
जांच के दौरान, दंगों से संबंधित एक अन्य प्राथमिकी (FIR) के खुलासे के आधार पर पुलिस ने तीन अन्य आरोपियों को गिरफ्तार किया था, लेकिन अदालत ने दिसंबर 2020 में उनके खिलाफ कार्रवाई करने से इनकार कर दिया था। इसके बाद, लोक निर्माण विभाग (PWD) द्वारा लगाए गए कैमरों के सीसीटीवी फुटेज मिलने के बाद जांच का दायरा बढ़ाया गया। 25 फरवरी, 2020 को इलाके में गश्त कर रहे दो पुलिसकर्मियों ने फुटेज में इन पांच व्यक्तियों की पहचान भीड़ के सदस्यों के रूप में की थी। मस्जिद के सामने रहने वाले निवासी अली अहमद को भी गवाह के रूप में पेश किया गया था और उन्हें फुटेज भी दिखाए गए थे।
हालांकि, अदालत ने नोट किया कि 25 फरवरी को हुए हमले के अभियोजन पक्ष के दावे को स्वतंत्र गवाह अली अहमद का समर्थन नहीं मिला। अहमद ने गवाही देते हुए बताया कि उन्होंने दंगों के दौरान रात करीब 8 से 8.15 बजे के बीच मस्जिद को तोड़े जाने और आग लगाए जाने की घटना देखी थी। उन्होंने बताया कि उन्हें तारीख याद नहीं है, लेकिन उन्होंने अभियोजन के इस दावे का समर्थन नहीं किया कि 25 फरवरी को सुबह 11 बजे के आसपास दूसरा हमला हुआ था। अहमद ने यह भी बताया कि घटना के बाद वे लगभग चार दिनों तक अपने घर में बंद रहे। अदालत ने पाया कि अहमद का बयान पुलिस गवाहों के इस दावे से मेल नहीं खाता कि 25 फरवरी को मस्जिद पर दोबारा हमला किया गया था।
जज ने पुलिसकर्मियों के बयानों और निवासी के बयानों के बीच स्पष्ट विरोधाभास पाया। अदालत ने एएसआई जुनैद और एएसआई मिथिलेश के बयानों में भी विसंगतियां पाईं। अदालत ने नोट किया कि अन्य दंगों के मामलों में उनके पिछले बयान संकेत देते हैं कि वे सुबह 10 से 11 बजे के बीच फोन आने के बाद करावल नगर के एक स्कूल गए थे और कुछ लोगों को बचाया था। यदि वे उस समय स्कूल में थे, तो वे उसी समय मस्जिद के पास मौजूद नहीं हो सकते और तोड़फोड़ नहीं देख सकते। जज ने आगे यह भी पाया कि यदि अभियोजन द्वारा प्रस्तुत सीसीटीवी फुटेज के साथ दिए गए प्रमाण पत्र कानूनी आवश्यकताओं को पूरा नहीं करते हैं, तो वे अदालत में स्वीकार्य नहीं हैं।
वर्ष 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों के दौरान करावल नगर इलाके में हिंसक घटनाएं हुई थीं, जिनमें मस्जिद और अन्य संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने और आग लगाने की कई घटनाएं दर्ज की गई थीं।
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