डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन कानून प्रेस की स्वतंत्रता को प्रभावित नहीं करता, अश्विनी वैष्णव का दावा
सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि संविधान पत्रकारिता की स्वतंत्रता की गारंटी देता है
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
30 अक्टूबर 2026, सुबह 3:10 · अपडेट शाम 7:12 · 5 मिनट का पाठ
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केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बुधवार को कहा कि डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (DPDP) एक्ट प्रेस की स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं करता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि पत्रकारिता की स्वतंत्रता संविधान द्वारा सुनिश्चित की गई है और यह पूरी तरह से उपलब्ध है। वैष्णव ने कहा कि इस कानून का उद्देश्य मीडिया की स्वतंत्रता को नुकसान पहुंचाए बिना व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा करना है और पत्रकारिता की स्वतंत्रता को प्रभावित करने का उनका कोई इरादा नहीं है।
सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री ने मीडिया पेशेवरों और संपादकों को इस कानून के बारे में चिंताओं पर सरकार के साथ खुली चर्चा के लिए आमंत्रित किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि DPDP एक्ट सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के बाद पेश किया गया था जिसमें निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी गई थी। वैष्णव ने आगे कहा कि यह कानून समाचार पत्रों, टेलीविजन चैनलों, मीडिया प्रतिनिधियों और सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग सहित हितधारकों के साथ एक वर्ष से अधिक की परामर्श प्रक्रिया के बाद तैयार किया गया था। उन्होंने कहा कि DPDP एक्ट के प्रावधान कहीं भी प्रेस, पत्रकारिता और मीडिया की स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं करते हैं।
दूसरी ओर, डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (DNPA) द्वारा DPDP एक्ट, 2023 और इसके तहत 2025 में बनाए गए नियमों को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को नोटिस जारी किया है। सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकों के निजता के अधिकार और मीडिया की जांच और रिपोर्टिंग करने की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने इस मामले पर 17 नवंबर को सुनवाई करने का निर्णय लिया है। बेंच ने एसोसिएशन की उस याचिका पर भी नोटिस दिया है जिसमें चुनौती दिए गए प्रावधानों के कार्यान्वयन पर रोक लगाने की मांग की गई है।
DNPA की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने अदालत को बताया कि यह याचिका पारंपरिक समाचार प्रकाशकों का प्रतिनिधित्व करने वाले "लिगेसी मीडिया" द्वारा किया गया पहला व्यापक प्रयास है। उन्होंने तर्क दिया कि यह कानून पत्रकारिता करने की पद्धति को मौलिक रूप से बदल सकता है क्योंकि रिपोर्टिंग के लिए व्यक्तिगत जानकारी एकत्र करने या प्रोसेस करने वाली समाचार संस्थाओं को सहमति लेनी होगी। दीवान ने चेतावनी दी कि यदि समाचार के लिए अनुमति और सहमति लेनी पड़ी तो समाचार नए नहीं रहेंगे और यह ढांचा प्री-सेंसरशिप (पूर्व-सेंसरशिप) जैसा हो सकता है, जिसके कारण समाचार खंड सार्वजनिक अधिकारियों और सरकारी कार्यालयों से जुड़े मामलों पर काम करने में असमर्थ हो सकते हैं। उन्होंने आगे कहा कि इससे न्यूज रूम बंद हो जाएंगे और यदि कोई रिपोर्ट गलत है तो प्रकाशकों को उसके परिणाम भुगतने चाहिए, लेकिन पहले से अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है।
अदालत ने दीवान से पूछा कि वे कैसे सुझाव दे सकती हैं कि कानून का दुरुपयोग न हो, इसके लिए केंद्र सरकार और अदालत को क्या करना चाहिए। मुख्य न्यायाधीश कांत ने कहा कि निर्दोष नागरिकों के अधिकारों और आपके अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। अदालत ने एसोसिएशन को यह भी समझाने का सुझाव दिया कि वे कैसे सुनिश्चित करेंगे कि रिपोर्टिंग से व्यक्तियों के अधिकारों का उल्लंघन न हो।
इस विवाद के केंद्र में DPDP एक्ट की धारा 44(3) है, जिसने सूचना का अधिकार (RTI) एक्ट, 2005 की धारा 8(1)(जे) में संशोधन किया है। एसोसिएशन का कहना है कि इस संशोधन से व्यक्तिगत जानकारी के लिए पूर्व के जनहित के खुलासे के संरक्षण का अंत होगा और सार्वजनिक जवाबदेही से संबंधित रिकॉर्ड्स तक पहुंच सीमित हो सकती है। याचिका में तर्क दिया गया है कि डेटा प्रोटेक्शन ढांचा जनहित में की जाने वाली पत्रकारिता और अन्य प्रकार के डेटा प्रोसेसिंग के बीच अंतर करने में विफल रहता है। यदि अंतर नहीं रखा गया तो पत्रकारों को भ्रष्टाचार, कॉरपोरेट गड़बड़ी या सार्वजनिक अधिकारियों के कदाचार की जांच में प्रासंगिक जानकारी होने के बावजूद सहमति की मांग, सहमति वापस लेने या जानकारी मिटाने की मांग का सामना करना पड़ सकता है।
DNPA 21 समाचार प्रकाशकों का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें अडानी और अंबानी समूह से जुड़ी मीडिया कंपनियों के साथ-साथ कई प्रसिद्ध समाचार पत्र और टेलीविजन नेटवर्क शामिल हैं। एक उच्च सूत्र के अनुसार, यदि पत्रकारिता की गतिविधियों को स्पष्ट रूप से सुरक्षित करने के लिए कानून में संशोधन की आवश्यकता महसूस होती है तो सरकार उसके लिए भी तैयार है। सूत्र ने कहा कि यदि 'हार्डकोडिंग' आवश्यक है तो संशोधन किया जा सकता है क्योंकि सरकार का इरादा स्पष्ट है और कोई भी भ्रम संसद में संशोधन के माध्यम से दूर किया जा सकता है।
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