भारत में दो से अधिक बच्चे होने वाले लोगों के खिलाफ कानून अब अनावश्यक
घटती फर्टिलिटी रेट के कारण जनसंख्या वृद्धि का डर अब अतीत हो गया है: सुप्रीम कोर्ट का अवलोकन
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
4 नवंबर 2026, रात 9:01 · अपडेट सुबह 6:29 · 5 मिनट का पाठ
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भारत में दो से अधिक बच्चे होने वाले लोगों को दंडित करने वाले कानून अब अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं, ऐसा सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा। अदालत ने टिप्पणी की कि देश में फर्टिलिटी रेट यानी प्रजनन दर घटने के कारण ये कानून अब अप्रासंगिक हो गए हैं। जस्टिस पीएस नरसिम्हा की अध्यक्षता वाली पीठ ने 37 पन्नों के फैसले में कहा कि ऐसे कानूनों का आधार, यानी अत्यधिक जनसंख्या का डर, पिछले कुछ दशकों में हुए जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के कारण अब टूट गया है।
अदालत ने अवलोकन किया कि जनसंख्या विस्फोट प्रगति में बाधा है, यह दशकों पुराना विचार अब पुराना हो चुका है। जनसंख्या का विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, यह पूर्व धारणा अब टिक नहीं सकती। समाज और अदालतों को अधिक जनसंख्या के नकारात्मक परिणामों के बारे में चिंता करने के बजाय, जनसंख्या के स्वस्थ विकास को बढ़ावा देने की आवश्यकता पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, ऐसा फैसले में जस्टिस नरसिम्हा द्वारा बताया गया।
भारत का कुल प्रजनन दर (TFR) 3.02 से घटकर 1.9 पर आ गया है। 2.1 का TFR, जिसे रिप्लेसमेंट रेट के रूप में जाना जाता है, एक पीढ़ी को पूरी तरह से बदलने के लिए पर्याप्त है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भले ही भारत की जनसंख्या अभी घट नहीं रही है, लेकिन TFR के रिप्लेसमेंट रेट से नीचे जाने से जल्द ही जनसंख्या का आयु वर्ग वृद्धों की ओर बदल जाएगा और कार्यशील आयु के लोगों का हिस्सा कम हो जाएगा। इसलिए, जनसंख्या वृद्धि को सीमित करने के उद्देश्य से बनाए गए कानून अब अपना महत्व खो चुके हैं।
जस्टिस नरसिम्हा के अनुसार, जनसांख्यिकीय परिवर्तनों को नजरअंदाज करना भारत के लिए गंभीर परिणाम ला सकता है। परिवर्तन को स्वीकार करने से इनकार करना न्याय पाने में बाधा है। परिवर्तन स्वीकार करने में विफलता न केवल अन्याय करती है, बल्कि यह सत्ता का दुरुपयोग भी है। अदालत ने नोट किया कि 60 वर्ष या उससे अधिक आयु के लोगों का हिस्सा 2014 में लगभग 8.3 प्रतिशत था, जो 2024 में बढ़कर 9.7 प्रतिशत हो गया है और सरकारी अनुमानों के अनुसार 2036 तक यह हिस्सा लगभग 15 प्रतिशत तक पहुंच जाएगा।
भारत में घटती प्रजनन दर यह संकेत देती है कि भविष्य में युवाओं का अनुपात कम होगा और इसके बजाय वृद्ध आबादी का अनुपात बढ़ेगा। यह मुद्दा हाल के वर्षों में चिंता का महत्वपूर्ण विषय रहा है। इस संदर्भ में, अदालत ने 2003 के जावेद बनाम हरियाणा राज्य के मामले में दिए गए फैसले पर पुनर्विचार करने के लिए बड़ी बेंच की आवश्यकता बताई थी। 2003 के उस फैसले में चीन की स्थिति का संदर्भ लिया गया था और जनसंख्या नियंत्रण के लिए चीन द्वारा उठाए गए कदमों से प्रेरणा ली गई थी।
यह फैसला मंगला भीमराव इंगले द्वारा दायर याचिका पर आधारित है। मंगला इंगले की महाराष्ट्र के काकोडा ग्राम पंचायत की सरपंच के रूप में उनकी चुनाव रद्द कर दी गई थी, क्योंकि उनके दो से अधिक बच्चे थे। निचली अदालतों और राज्य के अधिकारियों ने पाया था कि उन्होंने 2014 में तीसरे बच्चे को जन्म दिया था, फिर भी उन्होंने 2022 में पंचायत चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। अधिकारियों ने उन्हें महाराष्ट्र विलेज पंचायत एक्ट, 1959 की धारा 14(1)(j-1) के उल्लंघन के लिए दोषी ठहराया था, जो दो-बच्चे का नियम बनाए रखता है।
जस्टिस नरसिम्हा ने अवलोकन किया कि मातृत्व को राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जोड़ने वाले ऐसे कानून संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) का उल्लंघन हैं। ऐसे कानूनों को जारी रखने से नागरिकों के एक पूरे वर्ग को सार्वजनिक पद धारण करने की उनकी क्षमता के साथ बहुत कम तार्किक संबंध रखने वाले कारणों से राजनीतिक प्रतिनिधित्व से बाहर रखा जाता है। ये कानून व्यक्ति को बच्चे पैदा करने या लोकतंत्र में भाग लेने के बीच एक असुरक्षित चुनाव करने के लिए मजबूर करते हैं, जो अनुच्छेद 21 के तहत प्रजनन स्वायत्तता के अधिकार पर प्रहार करता है।
सुप्रीम कोर्ट ने 2003 के जावेद फैसले की तत्काल पुनर्विचार की मांग के साथ, अपीलकर्ता को काकोडा ग्राम पंचायत की निर्वाचित सरपंच के रूप में उनके पद पर बने रहने की अनुमति दी है और उनके खिलाफ किसी भी कार्यवाही पर रोक लगा दी है। जस्टिस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अरधे की पीठ ने यह महत्वपूर्ण निर्णय दिया है।
महाराष्ट्र विलेज पंचायत एक्ट, 1959 महाराष्ट्र में ग्राम पंचायतों के प्रशासन और उनकी संरचना को नियंत्रित करने वाला कानून है। इस कानून के तहत पंचायत सदस्यों और सरपंच की योग्यता निर्धारित की जाती है, जिसमें जनसंख्या नियंत्रण के नियम भी शामिल हैं।
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