विमानी बेड़ा बढ़ने से भारतीय एयरलाइंस देश में ही एमआरओ क्षमता बढ़ाने को तैयार
वर्ष २०३५ तक एयरफ्रेम, इंजन और घटकों का बाजार बढ़कर ९.५ अरब डॉलर पर पहुंच जाएगा।
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
4 नवंबर 2026, दोपहर 3:39 · अपडेट रात 8:42 · 4 मिनट का पाठ
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बिजनेस स्टैंडर्ड के एक रिपोर्ट के मुताबिक, देश में विमानों के बेड़े में लगातार हो रही वृद्धि को ध्यान में रखते हुए भारतीय एयरलाइंस ने देश के अंदर ही विमानों के रखरखाव, मरम्मत और ओवरहॉलिंग यानी एमआरओ गतिविधियों के लिए क्षमताओं को गति देने की दिशा में विचार करना शुरू कर दिया है ताकि आत्मनिर्भर बना जा सके।
दुनिया के सबसे तेजी से विकसित होते नागरिक उड्डयन बाजारों में से एक माने जाने वाले भारत में एयरफ्रेम, इंजन और विमान के विभिन्न घटकों के लिए बाजार वर्ष २०३५ तक बढ़कर ९.५ अरब डॉलर यानी तीन गुना हो जाने की संभावना है। वर्तमान स्थिति में वाइड-बॉडी विमानों के लिए अधिकांश विस्तृत एमआरओ काम विदेश में ही किया जाता है।
राष्ट्रीय राजधानी में आयोजित 'एविशन इंडिया एंड साउथ एशिया २०२६' कॉन्फ्रेंस के एक सत्र में एयर इंडिया के एसवीपी इंजीनियरिंग एंड मेंटेनेंस जेरेमी येवे ने बताया कि, वर्तमान परिस्थिति ने एयरलाइन को ऐसा सोचने पर मजबूर कर दिया है कि कितना एमआरओ काम इन-हाउस यानी खुद से ही किया जा सकता है। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि वाइड-बॉडी विमानों की एमआरओ गतिविधियों के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।
उन्होंने आगे बताया कि एयर इंडिया पश्चिमी एशिया की सुविधाओं में कुछ विमान भेजने की योजना बना रही थी, लेकिन जब इस क्षेत्र में संकट शुरू हुआ तो एयरलाइन को इस काम को पूरा करने के लिए अन्यत्र क्षमता प्राप्त करने में भारी संघर्ष करना पड़ा था। उनके मुताबिक स्वतंत्र एमआरओ के साथ परस्पर फायदेमंद संबंध हो सकते हैं। इन-हाउस क्षमताएं खड़े करने का मतलब यह नहीं है कि स्वतंत्र एमआरओ कंपनियों को नुकसान होगा, और वित्तीय मामले ठीक हों तथा गुणवत्ता और सुरक्षा के मानक बने रहें तब तक चर्चाएं हो सकती हैं, ऐसा उन्होंने जोड़ा।
आगामी वर्षों में ५४० से अधिक विमान प्राप्त करने वाली एयर इंडिया की बेंगलुरु स्थित अपनी एमआरओ सुविधा वर्ष २०२७ के अंत तक शुरू होने की उम्मीद है। विमानों के विस्तारक बेड़े की पृष्ठभूमि पर बात करते हुए इंडिगो के एसवीपी इंजीनियरिंग एंड मेंटेनेंस परिचय दत्ता ने बताया कि आत्मनिर्भर बनने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।
उन्होंने सत्र में बताया कि एयरलाइन के विस्तार की दर और एमआरओ सुविधाओं के विस्तार की दर अलग होने के कारण हमें आत्मनिर्भर बनना ही पड़ेगा। उन्होंने यह भी बताया कि एमआरओ कार्य के लिए साझेदारी वित्तीय और क्षमता दोनों दृष्टियों से सही पक्ष में होनी चाहिए। उन्होंने स्वीकार किया कि क्षेत्र में जटिलताएं हैं लेकिन देश के अंदर अधिक एमआरओ सुविधाएं खड़ी करने से वे कम हो रही हैं।
आकाश एयर के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट मेंटेनेंस एंड इंजीनियरिंग डेनियल साल्डन्हा ने बताया कि नोएडा एयरपोर्ट पर एयरलाइन की एमआरओ सुविधा वर्ष २०२८ में तैयार हो जाने की आशा है। वर्तमान में लगभग ८०० की संख्या वाला भारत का कमर्शियल विमानों का बेड़ा आगामी वर्षों में दोगुना होने की उम्मीद है क्योंकि एयरलाइंस बढ़ती यात्रा की मांग को पूरा करने के लिए अधिक विमान शामिल कर रही हैं।
इस सत्र में जीएमआर एयरो टेकनिक, सरकारी स्वामित्व वाली एआई इंजीनियरिंग सर्विसेज लिमिटेड, एयरवर्क्स और मैक्स एयरोस्पेस के शीर्ष अधिकारियों ने भी भाग लिया, जिन्होंने व्यापार के लिए वृद्धि की संभावनाओं के साथ-साथ देश के अंदर क्षमताओं को बढ़ाने पर जोर दिया।
इसी साल जनवरी में विमान बनाने वाली कंपनी एयरबस ने अनुमान लगाया था कि आगामी दशक में भारत का कमर्शियल विमानों का बेड़ा आकार में तीन गुना बढ़कर २,२५० हो जाएगा। तब एयरबस ने बताया था कि जैसे-जैसे बेड़ा तीन गुना होगा, वैसे-वैसे भारत तेजी से रखरखाव, मरम्मत और ओवरहॉलिंग के लिए एक हब बनने की ओर आगे बढ़ेगा और वर्ष २०३५ तक एयरफ्रेम, इंजन तथा घटकों का बाजार बढ़कर ९.५ अरब डॉलर हो जाएगा।
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