झारखंड हाईकोर्ट ने JSSC CGL परीक्षा रद्द करने के सरकार के फैसले को खारिज किया
कोर्ट ने इस निर्णय को अवैध और अन्यायपूर्ण बताते हुए 1,900 से अधिक उम्मीदवारों की नौकरी बचाई
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
6 नवंबर 2026, दोपहर 1:25 · अपडेट शाम 5:16 · 4 मिनट का पाठ
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झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा JSSC CGL (विज्ञापन संख्या 10/2023) परीक्षा रद्द करने के निर्णय को रद्द कर दिया है। जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने सरकार के इस कदम को अनुचित, अन्यायपूर्ण और अवैध बताया। इस फैसले के कारण लगभग 1,932 से 2,000 चयनित उम्मीदवारों की नौकरी पर लटकी तलवार हट गई है और वे झारखंड सरकार के साथ अपनी सेवाएं जारी रख सकेंगे। इस खबर को उम्मीदवारों के लिए दिवाली के तोहफे के रूप में देखा जा रहा है।
इस मामले में रमेश उरांव, आकाश गौरव और निरोज खेस सहित अन्य याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में आवेदन किया था, जिसके जवाब में शुक्रवार को यह महत्वपूर्ण फैसला आया। अदालत ने सरकार के उस निर्णय की कड़ी आलोचना की जिसमें पूरी भर्ती प्रक्रिया को रद्द कर दिया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सामूहिक स्तर पर या मास कैंसलेशन के आधार पर पूरी परीक्षा रद्द करना गलत है। अदालत ने नोट किया कि केवल जांच में कुछ नई सामग्री मिलने या कुछ गिरफ्तारियां होने के कारण सरकार पिछले न्यायिक निर्णयों को निष्प्रभावी नहीं कर सकती।
न्यायालय ने आगे कहा कि जब तक किसी उम्मीदवार के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही (Criminal Prosecution) न हो या उसका दोष सिद्ध न हो जाए, तब तक किसी भी निर्दोष या सफल उम्मीदवार को उसकी नौकरी से बर्खास्त नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा कि कार्यपालिका का कोई भी निर्णय न्यायालय या सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के विरुद्ध नहीं हो सकता। सरकार अदालतों के फैसलों की अनदेखी कर ऐसे मनमाने कदम नहीं उठा सकती।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर भी स्पष्टता दी गई। सुनवाई के दौरान यह तय हुआ कि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश यथावत रहेंगे। इसका अर्थ यह है कि यदि जांच एजेंसी द्वारा कोई विशिष्ट उम्मीदवार भ्रष्टाचार या अनियमितता में संलिप्त पाया जाता है, तो उसे भविष्य में रोजगार से प्रतिबंधित किया जाएगा। हाईकोर्ट ने आदेश दिया है कि पूरे मामले की जांच पूरी तरह निष्पक्ष और स्वतंत्र रूप से तार्किक निष्कर्ष तक जारी रहनी चाहिए। अदालत ने आशा व्यक्त की कि जांच में तेजी लाई जाएगी और याचिकाकर्ता भी इसमें पूरा सहयोग करेंगे। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि कोर्ट के इस आदेश से वर्तमान में चल रही आपराधिक जांच पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
इस कानूनी लड़ाई में राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा ने पक्ष रखा। जबकि सफल उम्मीदवारों और याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव रंजन, गोपाल शंकर नारायण, इंद्रजीत सिन्हा और अमरिश वत्स ने दलीलें पेश कीं।
इससे पहले, अगस्त महीने में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक के आरोपों के बीच सोरेन सरकार ने इस परीक्षा को रद्द कर दिया था। इस निर्णय के बाद उम्मीदवारों ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किया था और भर्ती प्रक्रिया में सुधार की मांग की थी। अनियमितताओं के इन आरोपों के बीच सरकार ने पहले कई भर्ती परीक्षाएं रद्द की थीं। इस मामले में क्रिमिनल इन्वेस्टिगेशन डिपार्टमेंट (CID) द्वारा परीक्षा में गड़बड़ी से जुड़े दो व्यक्तियों की गिरफ्तारी भी की गई थी। उम्मीदवार न्याय और भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रहे थे।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, उम्मीदवारों द्वारा किए गए विरोध और अनियमितताओं के आरोपों के बाद हाईकोर्ट ने यह निर्णय लिया है। अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस दीपक रोशन की कोर्ट ने सरकार के फैसले को अन्यायपूर्ण बताया था। इस फैसले से हजारों युवाओं को बड़ी राहत मिली है जो लंबे समय से अनिश्चितता और मानसिक तनाव से गुजर रहे थे। इस घटना ने साबित कर दिया है कि प्रशासनिक व्यवस्था में कानून का शासन सर्वोपरि है और सामूहिक कार्रवाई के नाम पर मेहनती युवाओं के अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता।
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