सरकार विशेष संसद सत्र बुलाएगी और सुप्रीम कोर्ट ने सीट रोटेशन से इनकार किया
गृह मंत्री अमित शाह ने विशेष सत्र का संकेत दिया और सुप्रीम कोर्ट ने सीट रोटेशन की याचिका खारिज कर दी।
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
4 नवंबर 2026, रात 9:13 · 5 मिनट का पाठ
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गृह मंत्री अमित शाह ने मंगलवार को बताया कि सरकार मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) पर चर्चा करने के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाने के लिए तैयार है। द इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, विपक्षी दल इस प्रक्रिया की आलोचना कर रहे हैं और इसके कार्यान्वयन और इसके प्रभावों पर चर्चा की मांग कर रहे हैं। इस बीच, संसद के मानसून सत्र की स्थिति पर भी चर्चा चल रही है। NDTV इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, संसद का मानसून सत्र समाप्त हुए 83 दिन बीत चुके हैं, लेकिन इसका औपचारिक सत्रवसान अभी तक नहीं हुआ है। चर्चा है कि सरकार परिसीमन और महिला आरक्षण जैसे संवैधानिक संशोधन विधेयक पारित करने के लिए विशेष सत्र बुला सकती है.
राजनीतिक बहसों के बीच, सुप्रीम कोर्ट ने भी एक महत्वपूर्ण कानूनी निर्णय दिया है। द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (4 नवंबर, 2026) को संसद और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों के अनिवार्य रोटेशन (परिवर्तन) के लिए आवेदन खारिज कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमल्या बागची तथा जस्टिस वी. मोहना की खंडपीठ ने अवलोकन किया कि ऐसे निर्णय लेने का अधिकार विधायिका के पास है और अदालत ऐसे निर्णयों के लिए आदेश नहीं दे सकती है.
इस खंडपीठ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 9(1)(सी) को मान्य रखा गया था। यह धारा उन क्षेत्रों में आरक्षित सीटों की पहचान करने का प्रावधान करती है जहां अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की जनसंख्या का अनुपात तुलनात्मक रूप से अधिक होता है.
इस मामले में याचिकाकर्ता जगदीश सिंह थे, जो उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले की 191-कड़ीपुर विधानसभा सीट के मतदाता हैं। उन्होंने इस सीट के लगातार आरक्षित रहने को चुनौती दी थी और दावा किया था कि यह सीट अपने निर्माण से लगभग सात दशक से आरक्षित है। उन्होंने तर्क दिया था कि रोटेशन तंत्र का अभाव संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 19 का उल्लंघन करता है। सिंह के अनुसार, इस व्यवस्था के कारण मतदाताओं का चयन सीमित हो जाता है क्योंकि वे केवल अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों को ही चुन सकते हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि वर्तमान व्यवस्था व्यापक समुदाय के हितों को आगे बढ़ाने के बजाय सीमित राजनीतिक परिवारों को ही लाभ पहुँचाती है.
याचिकाकर्ता ने पंचायतों और नगरपालिकाओं के लिए संविधान के अनुच्छेद 243डी और 243टी के तहत प्रदान की गई रोटेशनल आरक्षण जैसी ही पद्धति की मांग की थी। हालांकि, सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि बहुदलीय लोकतंत्र में, मतदाताओं से राजनीतिक विचारधाराओं के आधार पर चुनावी विकल्प चुनने की अपेक्षा की जाती है, न कि जाति या धर्म के आधार पर। उन्होंने स्पष्ट किया कि राजनीतिक लोकतंत्र में विभिन्न विचारधाराओं वाले कई राजनीतिक दल हैं और मतदाताओं को पार्टी के लिए मतदान करना चाहिए, धर्म के लिए नहीं। आप किसी विशेष राजनीतिक विचारधारा को चुन सकते हैं या नापसंद कर सकते हैं, लेकिन उसका प्रतिनिधित्व कौन करता है, यह अप्रासंगिक हो जाता है.
खंडपीठ ने मतदान के अधिकार और किसी विशेष निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने के अधिकार के बीच अंतर भी स्पष्ट किया। अदालत ने अवलोकन किया कि सामान्य श्रेणी के उम्मीदवार गैर-आरक्षित सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए अभी भी पात्र हैं.
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने याचिकाकर्ता से कहा कि उन्होंने नीति में बदलाव के लिए गलत मंच का सहारा लिया है और ऐसी मांग संसद के समक्ष रखनी चाहिए। उन्होंने हल्के अंदाज में यह भी कहा कि याचिकाकर्ता सार्वजनिक विरोध और प्रदर्शनों के माध्यम से भी यह मुद्दा उठा सकते हैं। खंडपीठ ने अंत में नोट किया कि हालांकि आदर्श रूप से रोटेशन का पालन किया जाना चाहिए, लेकिन जैसा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अवलोकन किया था, अदालत इस प्रकार का आदेश नहीं दे सकती है और यह संसद के अधिकार क्षेत्र में है। याचिकाकर्ता सार्वजनिक प्रतिनिधियों से संपर्क कर सकते हैं और उन्हें रोटेशन के सिद्धांत को अपनाने के लिए समझा सकते हैं.
परिसीमन अधिनियम, 2002 ने निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को निर्धारित करने के लिए एक ढांचा प्रदान किया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पहले इस कानून के प्रावधानों को मान्य किया था।
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