सूरत के किसान की ITAT में जीत, जमीन की कीमत के संबंध में टैक्स डिमांड रद्द
विभागीय मूल्यांकन अधिकारी की रिपोर्ट के आधार पर इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल ने दी राहत
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
6 नवंबर 2026, दोपहर 2:58 · अपडेट दोपहर 3:11 · 5 मिनट का पाठ
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सूरत के कतारगाम क्षेत्र के एक किसान श्री देसाई ने इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (ITAT) सूरत में अपनी कानूनी लड़ाई जीत ली है। यह मामला महाराष्ट्र के रत्नागिरी में खरीदी गई जमीन की कीमत और उस पर टैक्स के दावों से जुड़ा था। आयकर विभाग ने जमीन की स्टैम्प ड्यूटी वैल्यू और खरीद कीमत के बीच के अंतर को आय मानकर टैक्स लगाया था, लेकिन अंततः ट्रिब्यूनल ने किसान के पक्ष में फैसला सुनाया है।
घटना की शुरुआत तब हुई जब श्री देसाई ने महाराष्ट्र के रत्नागिरी जिले के मोजे नखरे ताल में जमीन का एक टुकड़ा खरीदा था। यह जमीन खरीदते समय स्टैम्प ड्यूटी की कीमत और वास्तविक खरीद कीमत के बीच ₹18.24 लाख का अंतर था। आयकर अधिनियम की धारा 56(2)(vii)(b) के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति स्टैम्प ड्यूटी वैल्यू से कम कीमत पर संपत्ति खरीदता है, तो उस अंतर की राशि को उसकी आय माना जाता है और उस पर टैक्स देना पड़ता है। श्री देसाई इन जटिल नियमों से अनजान थे, जिसके कारण उन्होंने अपने इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) में इस बात का उल्लेख नहीं किया था।
श्री देसाई ने 14 अक्टूबर, 2014 को अपना ITR दाखिल किया था, जिसमें उन्होंने कुल ₹2.43 लाख की आय घोषित की थी। इस कुल आय में से ₹81,500 कृषि आय थी। हालांकि, आयकर विभाग के असेसिंग ऑफिसर (AO) जमीन की खरीद के बारे में पहले से जानते थे और वे किसान द्वारा इसकी घोषणा किए जाने का इंतजार कर रहे थे। जब श्री देसाई ने ITR में इस खरीद का उल्लेख नहीं किया, तो उनके मामले को लिमिटेड स्क्रूटिनी के लिए चुना गया और 1 सितंबर, 2015 को धारा 143(2) के तहत नोटिस भेजा गया। इसके बाद उन्हें कुछ और नोटिस भी भेजे गए थे।
इन टैक्स नोटिसों के जवाब में श्री देसाई ने लड़ाई लड़ी और उनके चार्टर्ड अकाउंटेंट अर्जव विदानी ने सभी कार्यवाहियों में उनकी पैरवी की। टैक्स ऑफिसर की मुख्य चिंता यह थी कि श्री देसाई ने ITR में अन्य सभी विवरण दिए थे, लेकिन रत्नागिरी की जमीन स्टैम्प ड्यूटी वैल्यू से कम कीमत पर खरीदने के तथ्य को छिपाया था। AO ने नोट किया कि श्री देसाई और अन्य सह-मालिकों ने दो जमीनें खरीदी थीं, जिनका मूल्य उनके द्वारा भुगतान की गई राशि से अधिक था। अतः, AO ने ₹18.24 लाख के अंतर को श्री देसाई की आय में जोड़ा और उस पर टैक्स लगाने का निर्णय लिया।
चार्टर्ड अकाउंटेंट अर्जव विदानी ने तर्क दिया था कि आय में इस अतिरिक्त ₹18.24 लाख को जोड़ने का निर्णय विभागीय मूल्यांकन अधिकारी (DVO) की सलाह के बिना लिया गया था। जब यह मामला CIT(A) के समक्ष अपील किया गया, तो गुण-दोष के आधार पर सुनवाई की गई और मामला DVO को भेजा गया। DVO ने रत्नागिरी की जमीनों का पुनर्मूल्यांकन किया और जमीन की कीमत ₹14.08 लाख निर्धारित की, जो ठीक वही राशि थी जो श्री देसाई ने भुगतान की थी।
लेकिन, इसके बाद एक मोड़ आया जब श्री देसाई का मामला अचानक दिल्ली के ADDL/JCIT(A)-7 को स्थानांतरित कर दिया गया। दिल्ली के अधिकारी ने मामले में हुई देरी को माफ नहीं किया और मेरिट पर कोई निर्णय लिए बिना तकनीकी आधार पर अपील खारिज कर दी। इस निर्णय में रिकॉर्ड पर मौजूद DVO के मूल्यांकन आदेश पर भी विचार नहीं किया गया था। अर्जव विदानी ने ITAT सूरत के समक्ष तर्क दिया कि मामले का अचानक NFAC दिल्ली में स्थानांतरित होना और देरी के आधार पर अपील खारिज करना इनकम टैक्स एक्ट के अनुसार उचित नहीं है।
AKM ग्लोबल के मैनेजिंग पार्टनर अमित माहेश्वरी ने ET वेल्थ ऑनलाइन को बताया कि श्री देसाई और एक सह-मालिक ने रत्नागिरी में कृषि भूमि ₹14.08 लाख में खरीदी थी, जबकि स्टैम्प ड्यूटी प्राधिकरण ने अज्ञात कारणों से इस जमीन की कीमत ₹50.56 लाख आंकी थी। AO ने विभाग के अपने मूल्यांकन अधिकारी की रिपोर्ट को नजरअंदाज करते हुए इस अंतर के 50% हिस्से यानी ₹18.24 लाख को धारा 56(2)(vii)(b) के तहत "अन्य स्रोतों से आय" मानकर टैक्स लगाया था।
अंततः, 28 अक्टूबर, 2026 को ITAT सूरत ने फैसला सुनाया कि CIT(A) मामले को रेफर करने के बाद DVO के मूल्यांकन की अनदेखी नहीं कर सकते। ट्रिब्यूनल ने AO को इस रिपोर्ट के आधार पर राहत देने का निर्देश दिया। इस प्रकार, विभाग के अपने वैल्यूअर के समर्थन से श्री देसाई यह मामला जीत गए।
इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (ITAT) आयकर संबंधी विवादों के समाधान के लिए एक न्यायिक संस्था है, जो करदाताओं और आयकर विभाग के बीच के मतभेदों में अपील सुनने का कार्य करती है।
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