अंताल्या में होने वाले COP31 में भारत जलवायु न्याय और वित्तीय सहायता पर जोर देगा
केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि भारत विकसित देशों से जिम्मेदारी से और अनुमानित जलवायु फंड की मांग करेगा।
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
5 नवंबर 2026, दोपहर 1:55 · 4 मिनट का पाठ
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केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री भूपेंद्र यादव ने आगामी 9 से 20 नवंबर 2026 के दौरान तुर्की के अंताल्या में आयोजित होने वाली यूएनएफसीसीसी (UNFCCC) की COP31 कॉन्फ्रेंस के लिए भारत की प्राथमिकताओं को स्पष्ट किया है। नई दिल्ली में मीडिया को संबोधित करते हुए मंत्री ने कहा कि भारत इस वैश्विक मंच पर एक समाधान-उन्मुख दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ेगा, जिसमें क्षमता निर्माण, ज्ञान के आदान-प्रदान और भूगोल-विशिष्ट समाधानों पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। भारत इस प्रक्रिया में जी-77, चीन, एलएमडीसी (LMDC) और बेसिक (BASIC) देशों के साथ मिलकर काम करेगा।
श्री यादव ने जोर देकर कहा कि जलवायु वित्त यानी वित्तीय सहायता भारत के लिए सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा रहेगा। पेरिस समझौते के अनुच्छेद 9.1 के तहत विकसित देशों की जिम्मेदारी है कि वे विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए धन उपलब्ध कराएं। मंत्री के अनुसार, यह वित्तीय सहायता अनुमानित, बड़े पैमाने पर सार्वजनिक और रियायत वाली होनी चाहिए, ताकि विकासशील देशों पर कर्ज का बोझ न बढ़े। भारत COP31 में 'क्लाइमेट फाइनेंस वर्क प्रोग्राम' शुरू करने के लिए निर्णय लेने की मांग करेगा। द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, भारत का मानना है कि 2035 तक सालाना 300 अरब डॉलर का लक्ष्य बेहद अपर्याप्त है, जबकि विकासशील देश सालाना कम से कम 1 से 1.3 ट्रिलियन डॉलर की मांग कर रहे हैं।
जलवायु शमन (Mitigation) और अनुकूलन (Adaptation) को लेकर भारत का रुख स्पष्ट है कि यह पक्ष-संचालित और गैर-दंडात्मक होना चाहिए। भारत नए टॉप-डाउन लक्ष्यों को थोपने के किसी भी प्रयास का विरोध करेगा और राष्ट्रीय निर्धारित योगदान (NDCs) की प्रकृति का सम्मान करने की वकालत करेगा। मंत्री ने स्पष्ट किया कि भारत जीवाश्म ईंधन में कटौती या इसे चरणबद्ध तरीके से बंद करने जैसी भाषा के पक्ष में नहीं है, क्योंकि भारत पहले से ही नवीकरणीय ऊर्जा, वन क्षेत्र में वृद्धि और ऊर्जा दक्षता में सुधार के लिए प्रतिबद्ध है। इसके अलावा, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण विकसित देशों की जिम्मेदारी है और लागत, बौद्धिक संपदा अधिकारों (IPR) तथा व्यापार से संबंधित बाधाओं को दूर किया जाना चाहिए।
भारत 'जस्ट ट्रांजिशन वर्क प्रोग्राम' को जारी रखने का समर्थन करेगा, जिसका उद्देश्य जीवाश्म ईंधन पर निर्भर कामगारों को फिर से कौशल देकर ग्रीन जॉब्स की ओर मोड़ना है। जलवायु न्याय, विकास का अधिकार और सस्ती ऊर्जा तक पहुंच भारत की प्राथमिकताओं में शामिल हैं। COP31 में भारत स्वीडन के साथ 'लीडआईआईटी 3.0' (LeadIT 3.0) में भाग लेगा और तटीय स्थिरता, आईडीसीए (IBCA) तथा जंगलों पर उच्च स्तरीय पैनल चर्चाओं में शामिल होगा।
इसके अलावा, श्री यादव ने आर्मेनिया के येरेवन में आयोजित सीबीडी (CBD) COP17 और मंगोलिया के उलानबटार में आयोजित यूएनसीसीडी (UNCCD) COP17 के परिणामों पर भी प्रकाश डाला। सीबीडी COP17 में भारत ने कुनमिंग-मॉन्ट्रियल ग्लोबल बायोडायवर्सिटी फ्रेमवर्क (KMGBF) के कार्यान्वयन के लिए राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को महत्व दिया था। भारत ने डिजिटल सीक्वेंस इंफॉर्मेशन (DSI) के लिए केली फंड सहित बहुपक्षीय तंत्रों के माध्यम से न्यायसंगत लाभ-बंटवारे की वकालत की थी। यूएनसीसीडी COP17 में भारत ने 2030 तक 26 मिलियन हेक्टेयर से अधिक भूमि को पुनर्जीवित करने की अपनी प्रतिबद्धता को दोहराया था और सूखे से निपटने के लिए विज्ञान-आधारित दृष्टिकोण पर जोर दिया था।
एक अन्य महत्वपूर्ण वैज्ञानिक खोज में, शोधकर्ताओं को मेघालय की एक गुफा से 6,000 साल पुराने मानसून के रिकॉर्ड मिले हैं। यह खोज दर्शाती है कि भारतीय मानसून अतीत में वर्तमान की तुलना में अधिक शक्तिशाली था और उस पर सूर्य की गतिविधियों तथा अटलांटिक महासागर का प्रभाव पड़ता था। इस खोज को जलवायु परिवर्तन के इतिहास को समझने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
यूएनएफसीसीसी (UNFCCC) यानी यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज जलवायु परिवर्तन के जोखिमों को कम करने के लिए बनाई गई एक अंतरराष्ट्रीय संधि है। यह संस्था हर साल कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज (COP) का आयोजन करती है, जिसमें दुनिया के देश मिलकर वैश्विक तापमान में वृद्धि को रोकने और पर्यावरण की रक्षा के लिए नीतियां तय करते हैं। भारत इस संधि का एक सक्रिय सदस्य देश है और लंबे समय से विकासशील देशों के हितों का प्रतिनिधित्व कर रहा है।
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