तुर्की में होने वाले COP31 में भारत क्लाइमेट फाइनेंस और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर जोर देगा
केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव ने 9 से 20 नवंबर के दौरान होने वाले शिखर सम्मेलन के लिए भारत की प्राथमिकताएं घोषित कीं
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
5 नवंबर 2026, शाम 4:23 · अपडेट शाम 4:37 · 6 मिनट का पाठ
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केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री श्री भूपेंद्र यादव ने तुर्की के अंताल्या में 9 से 20 नवंबर 2026 के दौरान आयोजित होने वाले UNFCCC COP31 के लिए भारत की मुख्य प्राथमिकताएं घोषित की हैं। नई दिल्ली में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने बताया कि भारत इस शिखर सम्मेलन में समाधान-केंद्रित दृष्टिकोण के साथ क्षमता विकास, ज्ञान के आदान-प्रदान और भूगोल-विशिष्ट समाधानों पर ध्यान केंद्रित करेगा। भारत जी-77 और चीन, एलएमडीसी (LMDC) और बेसिक (BASIC) समूहों के साथ मिलकर काम करेगा और ग्लोबल साउथ की चिंताओं को आवाज देगा।
पीआईबी (PIB) और न्यूज़18 (News18) की रिपोर्ट के अनुसार, क्लाइमेट फाइनेंस भारत के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता होगी। भारत COP31 में 'क्लाइमेट फाइनेंस वर्क प्रोग्राम' शुरू करने के लिए निर्णय की मांग करेगा, जिसका प्रस्ताव ब्राजील के बेलेम में COP30 के दौरान प्रस्तुत किया गया था। श्री यादव ने स्पष्ट किया कि पेरिस समझौते के अनुच्छेद 9.1 के तहत विकसित देशों की जिम्मेदारी है कि वे विकासशील देशों को वित्तीय सहायता प्रदान करें। यह फाइनेंस अनुमानित, मुख्य रूप से सार्वजनिक और रियायती दरों पर होना चाहिए, ताकि विकासशील देशों पर कर्ज का बोझ न बढ़े।
द हिंदू (The Hindu) की रिपोर्ट के अनुसार, विकासशील देशों ने सालाना कम से कम 1-1.3 ट्रिलियन डॉलर के क्लाइमेट फाइनेंस की मांग की है। भारत का तर्क है कि 2035 तक का वार्षिक 300 बिलियन डॉलर का लक्ष्य अत्यंत अपर्याप्त है। जबकि विकसित देश 300 बिलियन डॉलर के लक्ष्य को स्वीकार करते हैं, लेकिन वे 1.3 ट्रिलियन डॉलर के आंकड़े तक पहुंचने के लिए सार्वजनिक और निजी फाइनेंस के साथ-साथ बहुपक्षीय विकास बैंकों के योगदान पर जोर देते हैं।
भारत जलवायु परिवर्तन को रोकने के लक्ष्यों (mitigation) और ग्लोबल स्टॉकटेक (GST) की समीक्षा प्रक्रिया को पार्टी-संचालित, सुविधाजनक और गैर-दंडात्मक रखने पर जोर देगा। भारत एनडीसी (NDC) की राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित प्रकृति का सम्मान करेगा और विकासशील देशों पर नए टॉप-डाउन लक्ष्य थोपने के प्रयासों का विरोध करेगा। भारत 'फॉसिल फ्यूल कट्स' या उनके चरणबद्ध कटौती जैसी भाषा की ओर झुकाव नहीं रखता है, क्योंकि वह पहले से ही नवीकरणीय ऊर्जा बढ़ाने, वन क्षेत्र बढ़ाने और ऊर्जा दक्षता सुधारने के मार्ग पर है।
अनुकूलन (Adaptation) भी भारत के लिए प्राथमिकता रहेगा। ग्लोबल गोल ऑन एडेप्टेशन (GGA) के तहत विकसित किए जा रहे संकेतक स्वैच्छिक होने चाहिए और वे फाइनेंस प्राप्त करने की शर्त नहीं बनने चाहिए। श्री यादव ने बताया कि सफलतापूर्वक पैरामीटर्स की संख्या को लगभग एक हजार से घटाकर 59 कर दिया गया है। इसके अलावा, भारत 'जस्ट ट्रांजिशन वर्क प्रोग्राम' (JWT) को जारी रखना चाहता है, जिसका उद्देश्य फॉसिल फ्यूल अर्थव्यवस्था पर निर्भर श्रमिकों को री-स्किल कर ग्रीन जॉब्स की ओर मोड़ना है।
टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के संबंध में भारत जोर देकर कहेगा कि यह विकसित देशों की जिम्मेदारी है। लागत, आईपीआर (IPR) और व्यापार संबंधी बाधाओं को दूर करना आवश्यक है। कार्बन मार्केट में भागीदारी स्वैच्छिक रहनी चाहिए। प्रेसीडेंसी एक्शन एजेंडा के तहत स्वैच्छिक पहल वार्ताओं से अलग रहनी चाहिए और वैश्विक लक्ष्य राष्ट्रीय परिस्थितियों के अनुरूप होने चाहिए।
भारत कृषि, खाद्य सुरक्षा और छोटे तथा सीमांत किसानों की आजीविका पर प्रभाव और अनुकूलन की आवश्यकता के बीच संबंधों पर भी प्रकाश डालेगा। COP31 में स्वीडन के साथ लीडआईटी 3.0 (LeadIT 3.0), तटीय लचीलेपन पर उच्च-स्तरीय कार्यक्रम, आईबीसीए (IBCA) और वन पैनल शामिल होंगे।
यह शिखर सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है जब नेपाल में 26 अगस्त की विनाशकारी बाढ़ के बाद 'लॉस एंड डैमेज' फंडिंग की मांग बढ़ी है। हिमालय में बर्फ और चट्टानों के खिसकने से आई बाढ़ से नेपाल में कम से कम 1,400 लोगों की मौत हुई और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान हुआ। नेपाल की रिकवरी और पुनर्निर्माण के लिए 4.7 बिलियन डॉलर की आवश्यकता है, जिसके मुकाबले फंड द्वारा केवल 21.6 मिलियन डॉलर आवंटित किए गए हैं, जो कुल आवश्यकता के 1% से भी कम है।
श्री यादव ने अन्य दो महत्वपूर्ण परिणामों के बारे में भी जानकारी दी। आर्मेनिया के येरेवन में CBD COP17 के दौरान, भारत ने कुनमिंग-मॉन्ट्रियल ग्लोबल बायोडायवर्सिटी फ्रेमवर्क (KMBGF) के न्यायसंगत कार्यान्वयन की पुष्टि की। भारत ने विकासशील देशों पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ का विरोध किया और डिजिटल सीक्वेंस इंफॉर्मेशन (DSI) के संदर्भ में न्यायसंगत लाभ-साझाकरण की मांग की। मंगोलिया के उलानबटोर में UNCCD COP17 में भारत ने 2030 तक 26 मिलियन हेक्टेयर से अधिक भूमि को बहाल करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की और सूखे से लड़ने के लिए अंतरराष्ट्रीय फाइनेंस की मांग की। भारत ने घास के मैदानों और अन्य खुले प्राकृतिक इको-सिस्टम के लिए अपनी पहली गाइडलाइन भी शुरू की है।
श्री यादव ने कहा कि जिन देशों ने ऐतिहासिक उत्सर्जन में सबसे अधिक योगदान दिया है, उन्हें जलवायु परिवर्तन की कार्रवाई में अधिक जिम्मेदारी लेनी चाहिए। 'कॉमन बट डिफरेंशिएटेड रिस्पॉन्सिबिलिटीज़' (CBDR) का सिद्धांत इस कार्रवाई के केंद्र में होना चाहिए। इस अवसर पर पर्यावरण मंत्रालय के सचिव श्री नरेंद्र भूषण और अन्य वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।
पेरिस समझौता लगभग 200 देशों द्वारा की गई एक वैश्विक समझ थी, जिसका उद्देश्य पृथ्वी के तापमान में होने वाली वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखना था। इस समझौते के दस साल बाद अब दुनिया इस बात का मूल्यांकन कर रही है कि देशों ने अपने वादे निभाए हैं या नहीं।
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