वर्ष 2026 भारत के लिए 1991 जैसा महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है
मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन की रिपोर्ट के अनुसार भारत अभी एक निर्णायक आर्थिक मोड़ पर है
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
30 अक्टूबर 2026, सुबह 12:13 · अपडेट सुबह 7:56 · 3 मिनट का पाठ
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मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन के अनुसार, वर्ष 2025-26 भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है। उन्होंने वर्तमान समय की तुलना वर्ष 1991 से करते हुए बताया है कि भारत अभी एक निर्णायक आर्थिक मोड़ पर खड़ा है। द इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, नागेश्वरन के मत में वर्ष 2026 का 1991 जैसा ही महत्व है, हालांकि यह तुलना भुगतान संतुलन (बैलेंस ऑफ पेमेंट) के संकट के संदर्भ में नहीं है, लेकिन उस समय जिस तरह से आर्थिक मोड़ आया था, उसी तरह 2025-26 के वर्ष को भी अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जाना चाहिए।
नागेश्वरन द्वारा दिए गए इस विश्लेषण में हाल के वर्षों में वैश्विक झटकों और आपूर्ति पक्ष में उत्पन्न व्यवधानों द्वारा खड़े किए गए चुनौतियों पर विशेष जोर दिया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि भारत अभी एक ऐसे चरण में है जहां आर्थिक स्थिति में बड़ा बदलाव आ सकता है। इस संदर्भ में उन्होंने बताया कि 2026 का 1991 जैसा ही है, लेकिन यह भुगतान संतुलन के संकट के कारण नहीं, बल्कि यह एक महत्वपूर्ण मोड़ है।
आर्थिक स्थिरता और जोखिमों के प्रबंधन पर चर्चा करते हुए मुख्य आर्थिक सलाहकार ने बताया कि भारत की आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा के भावों में होने वाली उतार-चढ़ाव के सामने भारत को अधिक असुरक्षित बनाती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के भावों में आने वाले बदलाव भारत के लिए संवेदनशीलता बढ़ाते हैं। इसलिए, ऐसे जोखिमों का प्रभावी ढंग से प्रबंधन करने के लिए बाहरी व्यवधानों के सामने भारत की लचीलापन को मजबूत बनाना अत्यंत आवश्यक है।
वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों में आने वाले अप्रत्याशित बदलावों और आपूर्ति श्रृंखला में आने वाले अवरोधों ने भारत के सामने चुनौतियां खड़ी की हैं। इन चुनौतियों से निपटने के लिए और आर्थिक अस्थिरता से बचने के लिए देश की आर्थिक क्षमता को मजबूत बनाना जरूरी है। नागेश्वरन के मत में, 2025-26 की समयावधि भारत की आर्थिक दिशा तय करने में निर्णायक भूमिका निभा सकती है।
भारत की आर्थिक कमजोरियों के मुख्य कारणों में कच्चे तेल के आयात पर अत्यधिक निर्भरता सामने आ रही है। जब भी वैश्विक स्तर पर ऊर्जा के भावों में उथल-पुथल होती है, तब उसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। इस जोखिम को घटाने के लिए और बाहरी झटकों के सामने लड़ने के लिए देश की आर्थिक व्यवस्था में मजबूती लाना अभी की सबसे बड़ी जरूरत है।
इस प्रकार, मुख्य आर्थिक सलाहकार के मत में, भारत एक ऐसे मोड़ पर है जहां उचित आर्थिक नीतियों और लचीलेपन द्वारा भविष्य की प्रगति तय होगी। वर्ष 1991 के सुधारों ने भारत की अर्थव्यवस्था को एक नई दिशा दी थी, और अब 2025-26 के वर्ष को भी उतने ही महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में देखा जा रहा है, जो भारत की आर्थिक स्थिति को नई ऊंचाई पर ले जा सकता है या नई चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार कर सकता है।
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