बलात्कार के मामले में समझौते के आधार पर कार्यवाही बंद नहीं की जानी चाहिए
सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि गंभीर अपराधों में समझौते से केस रद्द नहीं किया जा सकता
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
2 नवंबर 2026, दोपहर 12:37 · 6 मिनट का पाठ
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बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों के मामलों में केवल आरोपी और शिकायतकर्ता के बीच समझौता हो गया है, इस आधार पर आपराधिक कार्यवाही रद्द नहीं की जानी चाहिए, ऐसी चेतावनी सुप्रीम कोर्ट ने दी है। सुप्रीम कोर्ट ने अवलोकन किया है कि ट्रायल या मामले की सुनवाई यह साबित करने का सबसे अच्छा तरीका हो सकता है कि क्या शिकायत केवल वित्तीय समझौता प्राप्त करने के लालच में की गई थी या फिर समझौते के लिए आरोपी द्वारा दबाव डाला गया था। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है जिसमें बलात्कार की शिकायत को रद्द कर दिया गया था।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की खंडपीठ ने यह महत्वपूर्ण अवलोकन किया था। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि ऐसे मामलों में समझौते के पीछे आरोपी का दबाव हो सकता है, साथ ही यह भी संभावना है कि बाद में समझौते के माध्यम से धन वसूलने के उद्देश्य से झूठे आरोप लगाए गए हों। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि समझौते के आधार पर आपराधिक कार्यवाही को स्वतः समाप्त करने के बजाय दोनों संभावनाओं का सूक्ष्म परीक्षण करना आवश्यक है।
यह पूरा विवाद मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के एक आदेश से शुरू हुआ था, जिसमें हाईकोर्ट ने पक्षों के बीच समझौता होने की रिपोर्ट के आधार पर अपनी अंतर्निहित शक्तियों का उपयोग करते हुए बलात्कार की शिकायत रद्द कर दी थी। यह मामला सुप्रीम कोर्ट में उस याचिका के माध्यम से आया था जिसमें आरोपी ने अग्रिम जमानत मांगी थी, क्योंकि हाईकोर्ट ने उसे यह अधिकार नहीं दिया था। सुनवाई के दौरान खंडपीठ को सूचित किया गया था कि शिकायतकर्ता और आरोपी ने अपने विवादों का समाधान कर लिया है और हाईकोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 528 के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का उपयोग करते हुए आपराधिक शिकायत रद्द कर दी थी। धारा 528 हाईकोर्ट को अंतर्निहित शक्तियां प्रदान करती है।
खंडपीठ ने केवल समझौते के आधार पर बलात्कार के मामले को रद्द करने की वैधता पर सवाल उठाए थे। कोर्ट ने ध्यान दिलाया कि बलात्कार एक गंभीर और गैर-शमन योग्य (non-compoundable) अपराध है, जिसे पक्षों के बीच केवल निजी विवाद नहीं माना जा सकता और इसमें समझौता नहीं किया जा सकता। समझौते के आसपास की परिस्थितियों को जानने के लिए, खंडपीठ ने शिकायतकर्ता के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से बातचीत करने की व्यवस्था की थी। यह बातचीत राजगढ़ जिले के पचोर स्थित डिस्ट्रिक्ट लीगल सर्विसेज अथॉरिटी के कार्यालय से की गई थी, जहाँ उसकी सचिव की उपस्थिति में महिला ने जजों से बात की थी।
इस बातचीत के दौरान शिकायतकर्ता महिला ने कोर्ट की शंकाओं को और मजबूत कर दिया। महिला ने जजों को बताया कि उसे समझौता करने के लिए दबाव डाला गया था और वह इस समझौते को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है, हालांकि उसे समझौते के लिए धन की आवश्यकता है। साथ ही, उसने स्पष्ट रूप से जोर देकर कहा कि उसने शिकायत दर्ज की थी और उसमें लगाए गए आरोप सही थे। खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि उसके आरोपों की सत्यता की जांच ट्रायल के दौरान की जाएगी और कोर्ट मामले के गुण-दोष पर कोई राय नहीं दे रही है। कोर्ट ने यह भी कहा कि उसके अवलोकन ट्रायल को प्रभावित नहीं करने चाहिए।
कानूनी स्थिति की जांच करते समय, कोर्ट ने पूर्व के ऐसे फैसलों के बीच अंतर स्पष्ट किया जिनमें समझौते के बाद आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की अनुमति दी गई थी। कोर्ट ने नोट किया कि वे मामले मुख्य रूप से व्यक्तिगत, नागरिक या वाणिज्यिक प्रकार के विवादों से संबंधित थे, जहाँ आपराधिक प्रक्रिया जारी रखने का बहुत कम उद्देश्य रहता था। गियान सिंह बनाम स्टेट ऑफ पंजाब (2012) और नरिंदर सिंह बनाम स्टेट ऑफ पंजाब (2014) जैसे फैसलों का संदर्भ देते हुए खंडपीठ ने दोहराया कि हाईकोर्ट की आपराधिक कार्यवाही रद्द करने की अंतर्निहित शक्ति (जो CrPC की धारा 482 और अब BNSS की धारा 528 है) CrPC की धारा 320 के तहत अपराधों को शमन योग्य बनाने की वैधानिक शक्ति से अलग है।
हालांकि अंतर्निहित अधिकार का उपयोग न्याय सुनिश्चित करने और कोर्ट की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए किया जा सकता है, लेकिन कोर्ट ने कहा कि बलात्कार, हत्या और लूट जैसे जघन्य और गंभीर अपराधों में पक्षों के बीच विवादों के समझौते के आधार पर कार्यवाही समाप्त करने के लिए इस शक्ति का उपयोग नहीं किया जा सकता है। खंडपीठ ने शंभू खारवार बनाम स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश के 2024 के अपने फैसले का भी उल्लेख किया था, जिसमें शादी का वादा तोड़ने के आरोप से उत्पन्न बलात्कार के मामले को रद्द किया गया था क्योंकि शिकायत से ही पता चला था कि संबंध सहमति से थे। हालांकि, वर्तमान मामले में अलग प्रश्न खड़ा हुआ था, क्योंकि हाईकोर्ट ने समझौता स्वीकार करने से पहले आवश्यक जांच नहीं की थी।
खंडपीठ ने अंत में कहा कि, "हमने गंभीर अपराधों वाले मामले को केवल समझौते के आधार पर रद्द करने के कानूनी मुद्दे पर पहले ही बता दिया है, जिसे हम अनुमति नहीं दे सकते हैं।'' इसके साथ ही कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए आपराधिक कार्यवाही को बहाल कर दिया और ट्रायल जारी रखने का निर्देश दिया। आपराधिक कार्यवाही बहाल करने के साथ-साथ, कोर्ट ने आरोपी की जमानत के लिए आवेदन स्वीकार कर लिया और ट्रायल कोर्ट द्वारा लगाई गई शर्तों के अधीन उसे रिहा करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने आरोपी को जांच में सहयोग करने और जब भी ट्रायल कोर्ट द्वारा बुलाया जाए, उपस्थित रहने का भी निर्देश दिया था।
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