राम मंदिर की जमीन का सर्वे करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल
२०१९ के फैसले में निर्धारित जमीन पर ही मंदिर बना है या नहीं, यह जाँचने के लिए स्वतंत्र समिति की माँग
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
31 अक्टूबर 2026, दोपहर 3:07 · 5 मिनट का पाठ
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अयोध्या में निर्मित राम मंदिर की जमीन की सीमाओं और उसकी शुद्धता की जाँच करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक नई याचिका दाखिल की गई है। इस याचिका द्वारा ऐसी माँग की गई है कि एक स्वतंत्र समिति या कमीशन का गठन किया जाए, जो यह तय कर सके कि अयोध्या में अभी जिस राम मंदिर का निर्माण किया गया है या जिसका विकास किया गया है, वह बराबर उसी जमीन और परिसर में स्थित है या नहीं, जिसका निर्धारण सुप्रीम कोर्ट ने अपने २०१९ के फैसले में किया था।
बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट के अनुसार, श्री राम जन्मभूमि केस ट्रस्ट द्वारा दाखिल की गई इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई आगामी २ नवंबर के दिन निर्धारित की गई है। सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर अपलोड की गई कोर्ट लिस्ट के अनुसार, इस केस की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के समक्ष की जाएगी।
याचिका में यह विनती की गई है कि अदालत द्वारा नियुक्त की गई एक योग्य स्वतंत्र समिति या कमीशन का गठन किया जाए। इस समिति में सर्वे, राजस्व, पुरातत्व और अन्य तकनीकी क्षेत्र के ऐसे योग्य विशेषज्ञों को शामिल किया जाए जिन्हें अदालत उचित माने। इस समिति का मुख्य कार्य यह जाँच करना होगा कि मंदिर का निर्माण उसी सटीक परिसर और जमीन पर हुआ है या नहीं जिसका उल्लेख २०१९ के फैसले में किया गया था। इस जाँच में जमीन की सटीक सीमाओं, कोऑर्डिनेट्स, क्षेत्रफल और स्थल की पहचान करना शामिल है।
याचिका में आगे बताया गया है कि यदि इस जाँच के दौरान सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित की गई जमीन और जिस जमीन पर मंदिर का निर्माण किया गया है, उसके बीच कोई महत्वपूर्ण विसंगति या अंतर दिखाई दे, तो २०१९ के फैसले के आदेश का पालन सुनिश्चित करने के लिए उचित निर्देश दिए जाएं। याचिकाकर्ता द्वारा संबंधित अधिकारियों और श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट से विनती की गई है कि वे मंदिर परिसर की पहचान, सीमांकन और विकास से संबंधित सभी मूल दस्तावेजों, नक्शों, योजनाओं, सर्वे और रिकॉर्ड्स को सुरक्षित रखें और उसे कोर्ट के समक्ष पेश करें।
जमीन के विषय के अलावा, याचिका में अन्य महत्वपूर्ण बातों पर भी जोर दिया गया है। याचिका में दुनियाभर से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए विभिन्न सुविधाओं का निर्माण करने के लिए निर्देश माँगे गए हैं। इसके अलावा, वित्तीय पारदर्शिता बनाए रखने और किसी भी प्रकार के कुप्रबंधन को रोकने के लिए मंदिर के हिसाब-किताब को लेकर भी माँग की गई है। याचिका में माँग की गई है कि दान, चढ़ावे और उसकी रसीदों का रोजाना डिजिटल स्वरूप में रिकॉर्ड रखा जाए और उसे लगातार प्रदर्शित किया जाए। इसके अलावा, भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (CAG) द्वारा वार्षिक ऑडिट किए जाने की भी माँग की गई है।
अयोध्या के इस विवाद का इतिहास काफी पुराना है। अयोध्या के विवादित स्थल पर १६वीं सदी की बाबरी मस्जिद स्थित थी, जिसे ६ दिसंबर, १९९२ के दिन हिंदू कारसेवकों द्वारा गिरा दिया गया था, जिसके कारण सांप्रदायिक दंगे हुए थे। इस विवाद के संदर्भ में, २०१० में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया था कि अयोध्या की २.७७ एकड़ विवादित जमीन को तीन पक्षों - सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और 'राम लल्ला' के बीच समान रूप से बाँटा जाए। इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में १४ अपीलें दाखिल की गई थीं।
इन अपीलों पर सुनवाई करके, ९ नवंबर, २०१० के बजाय २०१९ के दिन सुप्रीम कोर्ट की पाँच न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। इस सर्वसम्मति के फैसले में अदालत ने ठहराया था कि जिस २.७७ एकड़ विवादित जमीन पर अतीत में बाबरी मस्जिद थी, वह जमीन केंद्र सरकार के रिसीवर के पास रहेगी और मंदिर के निर्माण के लिए तीन महीने के भीतर ट्रस्ट को सौंपी जाएगी। इस फैसले ने ट्रस्ट द्वारा अयोध्या के विवादित स्थल पर राम मंदिर के निर्माण का रास्ता साफ किया था।
साथ ही, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया था कि सुन्नी वक्फ बोर्ड को नई मस्जिद बनाने के लिए उत्तर प्रदेश के इस पवित्र शहर में किसी "प्रमुख" स्थान पर पाँच एकड़ का वैकल्पिक प्लॉट आवंटित किया जाए। अब, नई याचिका द्वारा २०१९ के उस फैसले में तय की गई जमीन की सटीक पहचान और मंदिर परिसर के रिकॉर्ड की दोबारा जाँच करने की माँग की गई है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सभी प्रक्रियाएं अदालत के आदेश के अनुसार ही हुई हैं।
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