नई दिल्ली में अप्रैल २०२७ में अंतरराष्ट्रीय कृषि साइंस एंड पार्टनरशिप वीक आयोजित होगा
५,००० से अधिक प्रतिनिधियों की उपस्थिति के बीच भारत वैश्विक कृषि नवाचारों का प्रदर्शन करेगा
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
31 अक्टूबर 2026, रात 10:57 · 6 मिनट का पाठ
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भारत २०२७ के अप्रैल महीने में नई दिल्ली में 'CGIAR साइंस एंड पार्टनरशिप वीक' का आयोजन करने जा रहा है। यह वैश्विक कार्यक्रम १२ से १७ अप्रैल, २०२७ के दौरान आयोजित होगा। इस इवेंट का आयोजन भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और CGIAR द्वारा किया गया है। ICAR यह भारत सरकार के कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय के तहत आने वाले कृषि अनुसंधान और शिक्षा विभाग (DARE) का हिस्सा है।
इस कार्यक्रम में दुनियाभर के शोधकर्ता, किसान, सरकारें, स्टार्टअप्स और विभिन्न व्यवसायों के प्रतिनिधि नई दिल्ली में एकत्रित होंगे। इस सप्ताह के दौरान किसानों तक पहुँच रही वर्तमान नवाचारों पर चर्चा की जाएगी और अधिक से अधिक लोगों तक यह तकनीक कैसे पहुँचाई जा सकती है इसके लिए आवश्यक गतिविधियों की समीक्षा की जाएगी।
भारत को इस कार्यक्रम के लिए एक प्राकृतिक मेजबान माना जाता है क्योंकि ICAR दुनिया की सबसे बड़ी राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणालियों में से एक का नेतृत्व करती है। ICAR के वैज्ञानिक पिछले ५० वर्षों से अधिक समय से CGIAR के साथ मिलकर कार्य कर रहे हैं। वर्तमान में भारत में फसलों, पानी, पशुधन, मछली, पोषण और नीति विषयक क्षेत्रों पर काम करने वाले दस CGIAR अनुसंधान केंद्र कार्यरत हैं।
भारत का कृषि विज्ञान अपनी सीमाओं को लाँघकर भी प्रभाव डाल रहा है। ICRISAT द्वारा सहेजे गए और साझा किए गए भारत का मूंगफली का एक नमूना आज मलावी, युगांडा, मोजाम्बिक और जाम्बिया में उगाई जाने वाली किस्मों में मददगार साबित हुआ है। इसके अलावा, हैदराबाद स्थित 'सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर साउथ-South कोऑपरेशन इन एग्रीकल्चर' एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में कृषि क्षेत्र में साबित हुई नवीनताएँ साझा करने का कार्य करता है।
DARE के सचिव और ICAR के महानिदेशक डॉ. एम. एल. जाट ने बताया कि भारत और CGIAR के बीच की लंबे समय की साझेदारी ने देश में कृषि अनुसंधान और विकास को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने जोड़ा कि CGIAR यह १०० से अधिक देशों में कार्यरत १५ अनुसंधान केंद्र रखने वाली अंतरराष्ट्रीय साझेदारी है, जिसने वैश्विक कृषि प्रगति में बड़ा योगदान दिया है। भारत के साथ इसके सहयोग से फसल सुधार, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन, खाद्य सुरक्षा और कृषि उत्पादकता में उल्लेखनीय विकास हुआ है।
हरित क्रांति के बाद भारत के कृषि परिवर्तन को याद करते हुए डॉ. जाट ने कहा कि CIMMYT, IRRI और ICRISAT जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के सहयोग से भारत की खाद्य उत्पादन क्षमता मजबूत बनी है। भारत जो देश अनाज की कमी रखता था और आयात पर निर्भर था, वह आज मुख्य खाद्य उत्पादक और निर्यातक देश के रूप में उभर कर आया है। उन्होंने आगे बताया कि २०२७ का यह कार्यक्रम वैज्ञानिक ज्ञान, तकनीक और सर्वोत्तम पद्धतियों के आदान-प्रदान के लिए एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान करेगा।
डॉ. जाट ने और अधिक स्पष्ट किया कि भारत की प्राथमिकता दक्षिण-दक्षिण सहयोग (South-South Cooperation) को प्रोत्साहन देने की और इसकी सफल कृषि नवीनताओं को ग्लोबल साउथ (Global South), विशेषकर अफ्रीकी देशों के साथ साझा करने की रहेगी। उन्होंने जलवायु-लचीला कृषि, डिजिटल कृषि, एग्रीस्टैक (AgriStack), कृषि यंत्रीकरण, बाजरा, प्राकृतिक खेती और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अंतरराष्ट्रीय सहयोग के लिए मुख्य क्षेत्र बताए। इस इवेंट में जलवायु लचीलापन, जल प्रबंधन, मिट्टी का स्वास्थ्य, सार्वजनिक-निजी साझेदारी, स्टार्टअप्स, युवाओं और महिलाओं की भागीदारी तथा कृषि विज्ञान के संचार में मीडिया की भूमिका जैसे विषयों पर चर्चा होगी।
CGIAR के कार्यकारी प्रबंध निदेशक डॉ. इस्माहाने इलोआफिए ने बताया कि यह कार्यक्रम अगले ५० वर्षों के कृषि सहयोग के लिए भविष्योमुखी एजेंडा तैयार करने के साथ लंबी अवधि की साझेदारी की उपलब्धियों का जश्न मनाएगा। उन्होंने कहा कि भारत ने दर्शाया है कि मजबूत राष्ट्रीय विज्ञान व्यापक स्तर पर क्या हासिल कर सकता है। भारत का बीज और ज्ञान पहले से ही एशिया और अफ्रीका के किसानों की मदद कर रहा है। अप्रैल में आयोजित होने वाले इस कार्यक्रम के माध्यम से विज्ञान के द्वारा और कहाँ काम किया जा सकता है इस बात पर मिलकर विचार किया जाएगा।
उन्होंने मानव कल्याण और खाद्य प्रणालियों को मजबूत करने में वैज्ञानिकों के योगदान की सराहना करने पर जोर दिया। अप्रैल २०२५ में केन्या के नैरोबी में आयोजित पहले सफल संस्करण का जिक्र करते हुए उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि भारत का यह संस्करण वैश्विक साझेदारी को और अधिक मजबूत बनाएगा।
ICRISAT के महानिदेशक डॉ. हिमांशु पाठक ने बताया कि अनाज की कमी वाले देश से मुख्य उत्पादक और निर्यातक देश बनने की भारत की यात्रा विज्ञान, तकनीक और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी की ताकत दर्शाती है। उन्होंने जोड़ा कि इस कार्यक्रम के माध्यम से भारत की उपलब्धियाँ प्रदर्शित करने का और वैश्विक प्रगति से सीखकर कृषि और खाद्य प्रणालियों की चुनौतियों के लिए समाधान खोजने का उद्देश्य है।
उल्लेखनीय है कि पहला CGIAR साइंस वीक अप्रैल २०२५ में नैरोबी, केन्या में आयोजित हुआ था। नई दिल्ली में आयोजित होने वाला यह संस्करण विज्ञान से प्रभाव (impact) की ओर कैसे आगे बढ़ना है और साझेदारी के माध्यम से दक्षिण-दक्षिण सहयोग को कैसे बढ़ाना है इस पर ध्यान केंद्रित करेगा। इसके अलावा, यह २०४७ के भारत के विजन में कृषि अनुसंधान और नवाचार कैसे योगदान दे सकते हैं इसकी भी जाँच करेगा। कार्यक्रम और वक्ताओं का विवरण आने वाले महीनों में घोषित किया जाएगा।
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