कम अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों के अपमान पर रोक लगाने के लिए मुख्यमंत्री का बड़ा फैसला
गुजरात की कक्षा 9 से 12 की स्कूलों के लिए नया नियम लागू, मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षा अनिवार्य की गई।
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
2 नवंबर 2026, सुबह 1:29 · अपडेट दोपहर 3:41 · 4 मिनट का पाठ
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एबीपी अस्मिता और द टाइम्स ऑफ़ इंडिया (अहमदाबाद) के रिपोर्ट के अनुसार, गुजरात में विद्यार्थियों की मानसिक तंदुरुस्ती को प्राथमिकता देने के लिए मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने एक महत्वपूर्ण और बड़ा फैसला लिया है। अध्ययन और परीक्षाओं के लगातार बढ़ते दबाव को ध्यान में रखते हुए राज्य सरकार द्वारा यह कदम उठाया गया है। इस नए निर्णय के तहत कक्षा 9 से 12 की स्कूलों में विद्यार्थियों की मानसिक स्थिति सुधारने और उन्हें तनावमुक्त वातावरण प्रदान करने के लिए विशेष आदेश जारी किए गए हैं।
इस नए नियम के पीछे का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को तनावमुक्त वातावरण प्रदान करना और आत्महत्या जैसी गंभीर घटनाओं को रोकना है। रिपोर्टों के अनुसार, यह नया नियम सर्वोच्च न्यायालय के दिशानिर्देशों और एनसीईआरटी (NCERT) के 'उम्मीद' (UMMEED) मॉडल पर आधारित है। इस दिशा में आगे बढ़ते हुए शिक्षा विभाग ने गुजरात माध्यमिक और उच्च माध्यमिक शिक्षा विनियम, 1974 में एक नया नियम-16(क) जोड़ा है।
नए नियम के अनुसार राज्य की सभी पंजीकृत माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्कूलों के लिए 'स्कूल वेलनेस टीम' (SWT) का गठन करना अनिवार्य बनाया गया है। इस स्कूली सुशासन टीम (SWT) के प्रमुख के रूप में स्कूल के आचार्य रहेंगे। इस टीम में शिक्षकों, स्कूल प्रबंधन समिति के एक सदस्य और विद्यार्थियों में से चुने गए 'मनो-मित्र' (पीयर मॉनिटर) को शामिल किया जाएगा। इसके अलावा जीएससीएसईबी (GSHSEB) स्कूलों को भी विद्यार्थियों के लिए वेलनेस टीमों और काउंसलर की नियुक्ति करनी होगी।
विद्यार्थियों की संख्या को ध्यान में रखते हुए काउंसलर की नियुक्ति को लेकर भी स्पष्ट प्रावधान किए गए हैं। जिन स्कूलों میں 100 या उससे अधिक विद्यार्थी अध्ययन करते हों ऐसी स्कूलों ने योग्य काउंसलर या मनोवैज्ञानिक की नियुक्ति करना अनिवार्य है। जबकि 100 से कम विद्यार्थियों वाली स्कूलों ने नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र के साथ जुड़ाव या टाई-अप करना होगा।
विद्यार्थियों के साथ होने वाले भेदभाव और अपमान को रोकने के लिए अत्यंत सख्त नियम बनाए गए हैं। अंक या शैक्षणिक प्रदर्शन के आधार पर विद्यार्थियों को अलग छांटने या कक्षा में उनका अलगाव करने की सख्त मनाही फरमाई गई है। कम अंक प्राप्त करने वाले विद्यार्थी का सार्वजनिक रूप से अपमान करना या होशियार विद्यार्थियों के साथ तुलना करके उन्हें नीचा दिखाना अब अपराध माना जाएगा। नए नियमों के अंतर्गत सार्वजनिक रूप से शर्मनाक स्थिति में डालने या सार्वजनिक अपमान पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया है।
स्कूलों में सकारात्मक वातावरण बना रहे इस उद्देश्य से स्कूलों ने नियमित रूप से खेलकूद, योग, ध्यान, संगीत और एनसीसी जैसी पाठ्यक्रम से बाहर की गतिविधियों (एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटीज) का आयोजन करना होगा। स्कूलों में मदद के लिए बॉक्स (हेल्प बॉक्स) और बाल हेल्पलाइन नंबर प्रदर्शित करने होंगे। विद्यार्थियों की किसी भी प्रकार की निजी जानकारी या काउंसलिंग का विवरण पूरी तरह से गुप्त रखा जाएगा।
स्कूल के सभी स्टाफ के लिए मानसिक स्वास्थ्य को लेकर वर्ष में 2 बार विशेष प्रशिक्षण देना अनिवार्य किया गया है। यदि किसी विद्यार्थी में आत्महत्या या डिप्रेशन के लक्षण दिखाई दें, तो उसे तत्काल प्रभाव से मनोवैज्ञानिक प्राथमिक सहायता (साइकोलॉजिकल फर्स्ट ऐड) देनी होगी। रैगिंग, साइबर बुलिंग या अन्य किसी भी प्रकार के भेदभाव को रोकने के लिए स्कूल स्तर पर एक मजबूत शिकायत निवारण प्रणाली (ग्रीवेंस रिड्रेसल सिस्टम) बनाना आवश्यक है।
यदि स्कूल की लापरवाही के कारण कोई विद्यार्थी गंभीर नुकसान का शिकार बनता है या आत्महत्या करता है, तो इसे 'संस्थागत दोष' (इंस्टीट्यूशनल फॉल्ट) माना जाएगा। ऐसे संस्थागत दोष के मामलों में जिम्मेदार स्कूल संचालकों या अधिकारियों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी। स्कूलों में इन सभी नियमों का कड़ाई से पालन हो यह सुनिश्चित करने के लिए प्रशिक्षण, लापरवाही के खिलाफ कदम और जिला कलेक्टर की निगरानी को अनिवार्य बनाया गया है।
इस पूरी व्यवस्था की निगरानी के लिए जिला कलेक्टर या जिला मजिस्ट्रेट की अध्यक्षता में जिला स्तर पर एक विशेष मॉनिटरिंग कमेटी का गठन किया जाएगा। यह समिति पूरे जिले की स्कूलों में इन नियमों के क्रियान्वयन पर नजर रखेगी। स्कूलों में इन नियमों का सख्ती से पालन हो और विद्यार्थी भयमुक्त वातावरण में शिक्षा प्राप्त कर सकें इसके लिए यह पूरा एक्शन प्लान तैयार किया गया है।
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