एनीमिया की रोकथाम के लिए केवल आयोडीन युक्त नमक पर्याप्त नहीं: विशेषज्ञों की राय
भारत में एनीमिया के बढ़ते प्रसार को रोकने के लिए केवल नमक के फोर्टिफिकेशन पर निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है।
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
6 नवंबर 2026, दोपहर 3:27 · अपडेट दोपहर 3:36 · 2 मिनट का पाठ
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भारत में एनीमिया की गंभीर समस्या से निपटने के लिए सरकार और स्वास्थ्य संस्थानों द्वारा विभिन्न प्रयास किए जा रहे हैं। इस संदर्भ में, आयोडीन और आयरन युक्त 'डबल फोर्टिफाइड सॉल्ट' (DFS) को एक प्रभावी उपाय के रूप में पेश किया जा रहा है। हालांकि, 'द हिंदू' की एक रिपोर्ट के अनुसार, केवल नमक में आयरन मिलाने से एनीमिया की समस्या का पूर्ण समाधान नहीं हो सकता। विशेषज्ञों का मानना है कि एनीमिया के पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं, जिन्हें केवल एक पूरक तत्व के माध्यम से दूर नहीं किया जा सकता।
आयरन युक्त नमक के उपयोग के पीछे मुख्य तर्क यह है कि नमक हर व्यक्ति के आहार का एक अनिवार्य हिस्सा है, इसलिए इसके माध्यम से आयरन आसानी से लोगों तक पहुँचाया जा सकता है। लेकिन, यह सुविधाजनक दृष्टिकोण जन स्वास्थ्य की दृष्टि से विरोधाभासी साबित हो सकता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) द्वारा प्रतिदिन पांच ग्राम से अधिक नमक न खाने की सलाह दी जाती है, जबकि भारतीय औसतन इससे दोगुना नमक लेते हैं। वर्तमान में भारत में हर तीन में से एक वयस्क व्यक्ति हाइपरटेंशन से पीड़ित है। भारत की अपनी गैर-संचारी रोग (NCD) एक्शन प्लान के तहत नमक के सेवन में 30% की कमी लाने का लक्ष्य रखा गया है। ऐसी स्थिति में, नमक के उपयोग को बढ़ावा देने वाली नीतियां जन स्वास्थ्य के अन्य लक्ष्यों से टकराती हैं।
पांचवें नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-5) के आंकड़ों के अनुसार, भारत में आधी से अधिक महिलाएं और लगभग दो-तिहाई छोटे बच्चे एनीमिया से पीड़ित हैं। ये आंकड़े देश में एनीमिया के प्रसार की गंभीरता को दर्शाते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, एनीमिया के मूल कारणों को समझने और उन्हें दूर करने के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण की आवश्यकता है, जिसमें केवल नमक के फोर्टिफिकेशन पर निर्भर रहने के बजाय अन्य पोषक तत्वों और आहार पद्धतियों पर ध्यान देना भी अनिवार्य है।
NFHS-5 इस श्रृंखला का पांचवां राष्ट्रीय सर्वेक्षण था, जिसने भारतीय परिवारों की स्वास्थ्य स्थिति की विस्तृत तस्वीर पेश की थी।
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