पत्नी को 'स्टूपिड' या 'यूजलेस' कहना अपराध नहीं: सुप्रीम कोर्ट
दहेज केस में सबूत के बिना पति या ससुराल वालों को जिम्मेदार न ठहराने की कोर्ट की नसीहत
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
2 नवंबर 2026, रात 9:56 · अपडेट दोपहर 12:15 · 3 मिनट का पाठ
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दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि पत्नी को 'स्टूपिड' (बेवकूफ) या 'यूजलेस' (निकम्मा) कहना कोई अपराध या क्रूरता नहीं माना जा सकता। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने नोट किया कि ऐसे शब्द पति के स्वभाव को दर्शाते हैं, लेकिन इसे इतना गंभीर आपराधिक रंग नहीं दिया जा सकता कि जिसके कारण पत्नी ने आत्महत्या की हो। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि दहेज हत्या या वैवाहिक विवादों के मामलों में अदालतों को अत्यंत सावधानी बरतनी चाहिए और केवल आरोपों के आधार पर सबूत के बिना किसी को भी 'बलि का बकरा' नहीं बनाना चाहिए।
इस मामले की जानकारी के अनुसार, संबंधित व्यक्ति की शादी 3 जनवरी 2021 को हुई थी। शादी के बाद यह दंपति फरवरी 2022 में कनाडा के टोरंटो में बस गया था। दुर्भाग्य से, 11 जून 2023 को पत्नी ने 22वीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली थी। मृतका ने अपने सुसाइड नोट में स्पष्ट रूप से लिखा था कि, 'एक साल से नौकरी नहीं मिली है, मैं जीवन में विफल रही हूं।' इस घटना के बाद महिला के पिता ने 30 जून 2023 को सतारा, औरंगाबाद में पति और ससुराल वालों के खिलाफ FIR दर्ज कराई थी। जिसमें IPC की धारा 304-बी (दहेज हत्या), 498-ए (क्रूरता), 323, 504 और दहेज निषेध कानून की विभिन्न धाराओं के तहत अपराध दर्ज किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने अवलोकन किया कि महिला के पिता द्वारा पति और ससुराल वालों पर मानसिक और शारीरिक क्रूरता तथा दहेज की मांग के जो आरोप लगाए गए थे, उनकी कोई पुष्टि नहीं हो सकी है। मामले में आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोपों का महिला की मृत्यु के साथ कोई सीधा संबंध साबित नहीं हुआ है। बेंच ने स्पष्ट किया कि IPC की धारा 304-बी लागू करने के लिए यह साबित करना अनिवार्य है कि मृत्यु के कुछ समय पहले महिला को दहेज के लिए क्रूरता या उत्पीड़न का सामना करना पड़ा था। इस मामले में वादी पक्ष ऐसा कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सका जो साबित करे कि पति ने दहेज की अवैध मांग की थी या इस मांग का पत्नी की आत्महत्या के साथ सीधा संबंध था।
कोर्ट ने आगे कहा कि, 'हम उस परिवार का दुख और पीड़ा समझते हैं जिसने अपनी बेटी खोई है। लेकिन पति और ससुराल वालों को तब तक जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता जब तक उनके किसी ऐसे कृत्य या लापरवाही साबित न हो, जिसके कारण महिला आत्महत्या करने के लिए मजबूर हुई हो।' केवल मौखिक या शारीरिक क्रूरता का आरोप लगाना प्रथम दृष्टया पर्याप्त नहीं है। ऐसे आरोपों के आधार पर यह मान लेना उचित नहीं है कि इन्हीं कृत्यों के कारण आत्महत्या हुई है। यह सिद्धांत उन सभी मामलों में लागू होता है जहां वादी पक्ष आत्महत्या और उत्पीड़न या क्रूरता के बीच संबंध साबित करना चाहता है। सुप्रीम कोर्ट ने अंत में नसीहत दी कि वैवाहिक विवादों की सुनवाई करते समय अदालतों को वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
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