2036 तक प्राथमिक विद्यालयों के बच्चों की संख्या में 20 प्रतिशत की गिरावट आएगी
प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद की रिपोर्ट में फर्टिलिटी रेट घटने के कारण बच्चों की आबादी में कमी का अनुमान
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
6 नवंबर 2026, सुबह 3:26 · 5 मिनट का पाठ
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भारत में प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में आने वाले वर्षों में बड़ा बदलाव देखा जा सकता है। प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) द्वारा जारी एक नए वर्किंग पेपर के अनुसार, देश में 5 से 9 वर्ष के आयु वर्ग के प्राथमिक विद्यालय जाने वाले बच्चों की आबादी में 2011 से 2036 के दौरान लगभग 20 प्रतिशत की गिरावट आने का अनुमान है।
'हाउ इंडिया इज ट्रांसफॉर्मिंग एजुकेशन कैपेसिटी अंडर द न्यू एजुकेशन पॉलिसी 2020' शीर्षक के तहत इस शोध पत्र को एसबीआई के मुख्य आर्थिक सलाहकार और EAC-PM के सदस्य सौम्य कांति घोष तथा अर्थशास्त्री शशिधरन शर्मा द्वारा तैयार किया गया है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि प्राथमिक शिक्षा की उम्र के बच्चों के नामांकन में आने वाली यह गिरावट भारत की घटती कुल फर्टिलिटी रेट का पहला जनसांख्यिकीय प्रमाण है।
एबीपी न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, ये अनुमान राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग द्वारा 2011 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर तैयार किए गए हैं। सांख्यिकीय विवरणों पर नजर डालें तो, 2011 में 5 से 9 वर्ष की आयु के बच्चों की संख्या 12.53 करोड़ थी। अनुमान है कि 2026 तक यह संख्या घटकर 11.27 करोड़ हो जाएगी, जो 2011 की तुलना में लगभग 10 प्रतिशत की गिरावट दर्शाती है। इसके अलावा, 2036 तक यह आंकड़ा और घटकर 10.02 करोड़ पर आ जाएगा, जो 2011 के मुकाबले लगभग 20 प्रतिशत की गिरावट का संकेत देता है।
रिपोर्ट में रजिस्ट्रार जनरल और जनगणना आयुक्त के आंकड़ों का उल्लेख किया गया है, जिसके अनुसार देश की फर्टिलिटी रेट 2019 में 2.1 थी, जो 2024 में घटकर 1.9 पर आ गई है।
रिपोर्ट में इस बात पर भी प्रकाश डाला गया है कि राष्ट्रीय स्तर पर बच्चों की आबादी घटने का मतलब यह नहीं है कि पूरे देश में स्कूलों की मांग समान रूप से घट रही है। वास्तव में, ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों की ओर नामांकन में एक बड़ा बदलाव देखा जा रहा है। 2012-13 से 2021-22 के बीच ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों में कक्षा 1 से 12 तक का कुल नामांकन लगभग 78 लाख घटकर 18.71 करोड़ से 17.93 करोड़ हो गया है।
उसी अवधि के दौरान शहरी क्षेत्र के स्कूलों में लगभग 93 लाख नए छात्र जुड़े हैं, जिससे वहां नामांकन बढ़कर 7.64 करोड़ हो गया है। परिणामस्वरूप, कुल नामांकन में शहरों की हिस्सेदारी 26.4 प्रतिशत से बढ़कर 29.9 प्रतिशत तक पहुंच गई है।
राज्यवार आंकड़ों में भी बड़ा अंतर देखा गया है। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश में कुल नामांकन लगभग स्थिर रहा है, लेकिन आंतरिक रूप से देखने पर ग्रामीण नामांकन में 19.46 लाख की कमी आई है, जबकि शहरी नामांकन में 17.6 लाख की वृद्धि हुई है। बिहार में नामांकन और स्कूलों की संख्या दोनों में वृद्धि हुई है, जबकि तमिलनाडु में स्कूलों की संख्या बढ़ने के बावजूद कुल नामांकन में गिरावट दर्ज की गई है।
जनसंख्या के इस बदलाव का सीधा असर देश के स्कूल नेटवर्क पर पड़ रहा है। यूडीआईएसई प्लस (UDISE+) के आंकड़ों के अनुसार, 2018-19 में देश में कुल 15.51 लाख स्कूल थे, जो 2025-26 तक 5.4 प्रतिशत घटकर 14.67 लाख रह गए हैं। सबसे तेज गिरावट केवल कक्षा 1 से 5 तक शिक्षा देने वाले प्राथमिक स्कूलों में देखी गई है, जो 8.27 लाख से 12.6 प्रतिशत घटकर 7.22 लाख हो गए हैं।
इसके विपरीत, कक्षा 12 तक शिक्षा देने वाले स्कूलों की संख्या में 29.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और यह 1.30 लाख से बढ़कर 1.69 लाख हो गई है। रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि आंकड़ों में स्कूलों की संख्या घटने का मतलब सीधे तौर पर स्कूलों का बंद होना नहीं है। कई मामलों में प्राथमिक स्कूलों को अपग्रेड करके उनमें उच्च कक्षाएं जोड़ी गई हैं या उन्हें मर्ज किया गया है।
छोटे और कम बच्चों वाले स्कूलों में संसाधनों की कमी को दूर करने के लिए नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में 'स्कूल कॉम्प्लेक्स' और 'क्लस्टर मॉडल' का सुझाव दिया गया है। इस मॉडल के तहत आसपास के छोटे स्कूल और आंगनवाड़ी किसी भी स्कूल के भवन को बंद किए बिना शिक्षकों, प्रयोगशालाओं, खेल के मैदानों और नेतृत्व का परस्पर साझा उपयोग कर सकते हैं।
शोधकर्ताओं ने सलाह दी है कि केवल राष्ट्रीय आंकड़ों के आधार पर सोचे बिना दूरदराज या ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों को बंद नहीं किया जाना चाहिए। भविष्य की योजना में स्थानीय मांग, बच्चों के लिए स्कूल की दूरी और पड़ोसी स्कूलों की क्षमता को ध्यान में रखकर योजनाएं बनानी चाहिए।
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