केरल हाईकोर्ट ने श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय के १६ निलंबित छात्रों की परीक्षा पर प्रतिबंध लगाया
अदालत ने कहा कि शैक्षणिक संस्थान अध्ययन के लिए हैं, राजनीति के लिए नहीं
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
5 नवंबर 2026, दोपहर 2:24 · 5 मिनट का पाठ
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केरल हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि संवैधानिक लोकतंत्र में धरने, भूख हड़ताल और सत्याग्रह जैसी राजनीतिक गतिविधियों के लिए कोई स्थान नहीं है, विशेषकर शैक्षणिक संस्थानों में। यह अवलोकन अदालत ने कलाडी स्थित श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय के १६ निलंबित छात्रों के मामले की सुनवाई के दौरान किया। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने सिंगल जज द्वारा दिए गए उस अंतरिम आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें छात्रों को ४ नवंबर से शुरू होने वाली सेमेस्टर परीक्षाओं में बैठने की अनुमति दी गई थी।
जस्टिस अनिल के. नरेंद्रन और जस्टिस मुरली कृष्णा एस. की डिवीजन बेंच ने ३ नवंबर को यह निर्णय दिया। अदालत ने नोट किया कि सिंगल बेंच ने साक्ष्यों के अभाव में ये निर्देश दिए थे। छात्रों ने यह साबित नहीं किया था कि वे परीक्षा देने के लिए योग्य हैं, जैसे कि आवश्यक इंटरनल असेसमेंट मार्क्स और उपस्थिति। अदालत ने आगे कहा कि छात्रों ने उपस्थिति की कमी माफ करवाने के लिए कोई आवेदन भी दाखिल नहीं किया था। डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि कोई भी अदालत विश्वविद्यालय को कानून के खिलाफ काम करने के लिए निर्देश नहीं दे सकती है। इसके साथ ही अदालत ने इस बात पर भी ध्यान दिलाया कि सिंगल बेंच ने यह आदेश देने से पहले विश्वविद्यालय को जवाब देने का मौका नहीं दिया था।
इस पूरे विवाद की शुरुआत १३ अगस्त को हुई थी, जब विश्वविद्यालय में सिंडिकेट की बैठक के दौरान स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) से जुड़े छात्रों ने विरोध प्रदर्शन किया था। छात्र कैंपस में पानी की समस्या, बुनियादी सुविधाओं का अभाव और शिक्षकों की खाली जगहें भरने जैसी १८ मांगें कर रहे थे। प्रदर्शन के दौरान छात्रों ने एक नुक्कड़ नाटक पेश किया, जिसमें प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार दिखाए गए थे। विश्वविद्यालय प्रशासन और वाइस चांसलर सीजा थॉमस का आरोप है कि इस नाटक के जरिए उनका प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार किया गया था।
वाइस चांसलर सीजा थॉमस के अनुसार, सिंडिकेट बैठक के बाद जब वे कैंपस से बाहर निकल रही थीं, तब १८ से अधिक प्रदर्शनकारियों ने उन्हें रोका और धक्का दिया था। उन्होंने आरोप लगाया था कि प्रदर्शनकारियों ने उनके बाल खींचे थे और उनकी गाड़ी को नुकसान पहुंचाया था। इस घटना के बाद पुलिस ने १९ लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया था और SFI के चार कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया था। दूसरी तरफ, छात्रों ने दलील दी थी कि नुक्कड़ नाटक थिएटर डिपार्टमेंट के खराब साजो-सामान के विरोध में किया गया था।
विश्वविद्यालय सिंडिकेट ने २२ अगस्त को इस मामले की जांच के लिए समिति बनाने का फैसला किया था और उसके बाद १ सितंबर को १६ छात्रों को सस्पेंड कर दिया गया था। इन निलंबित छात्रों में MSW, MFA, MA, फोर-ईयर अंडरग्रेजुएट प्रोग्राम (FYUGP) और PhD के छात्र शामिल हैं। सस्पेंशन के बाद उनके कैंपस में प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया गया था और केवल जांच समिति की सुनवाई के लिए ही अनुमति दी गई थी।
छात्रों ने १२ अक्टूबर को हाईकोर्ट में अर्जी दी थी कि लंबे समय तक सस्पेंड रहने के कारण उनकी पढ़ाई खराब हो रही है और वे क्लास में उपस्थित नहीं हो पा रहे हैं। उन्होंने दलील दी थी कि उपस्थिति कम होने की जिम्मेदारी विश्वविद्यालय की है क्योंकि विश्वविद्यालय ने ही उन्हें कैंपस में आने से रोका था। हालांकि, विश्वविद्यालय ने अदालत में बताया कि छात्रों ने परीक्षा के लिए न्यूनतम उपस्थिति और इंटरनल परीक्षाएं पास करने की शर्तें पूरी नहीं की हैं। विश्वविद्यालय के मुताबिक, छात्रों ने तय समय में परीक्षा के लिए रजिस्ट्रेशन भी नहीं कराया था और उपस्थिति माफ करवाने के लिए जरूरी दस्तावेज या विभाग के प्रमुखों की सिफारिश पेश नहीं की थी।
अदालत ने कड़े शब्दों में कहा कि शैक्षणिक संस्थान शिक्षा देने के लिए हैं, राजनीति के लिए नहीं। राजनीतिक दल अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए शैक्षणिक संस्थान या अन्य अनुशासित छात्रों के शिक्षा के अधिकार को बंधक नहीं बना सकते हैं। अदालत ने चेतावनी दी कि धरने, भूख हड़ताल या सत्याग्रह जैसी गतिविधियों में शामिल छात्रों को संस्थान से निकाला (expelled/rusticated) जा सकता है। हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद, SFI से जुड़े १६ छात्रों ने अब सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है, क्योंकि उनका कहना है कि इससे उनका पूरा सेमेस्टर बर्बाद हो सकता है।
दूसरी तरफ, 'द टाइम्स ऑफ इंडिया' की रिपोर्ट के अनुसार, केरल में ही इंदिरा अम्मा नाम की ८५ वर्षीय महिला पिछले १० वर्षों से बच्चों को एक अनोखे तरीके से पढ़ा रही हैं। वे रेत और लकड़ी का इस्तेमाल करके बच्चों को मलयालम, हिंदी, अंग्रेजी और गणित के बुनियादी सिद्धांत सिखाती हैं। बच्चे रेत में अक्षर बनाकर आनंद के साथ सीखते हैं, जिससे कचरामुक्त और मनोरंजक शिक्षण का माहौल पैदा हुआ है।
श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय केरल के कलाडी में स्थित एक शैक्षणिक संस्थान है जो संस्कृत और अन्य शास्त्रों के अध्ययन के लिए जाना जाता है।
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