देवघर खजाने में हुई अनियमितताओं को लेकर झारखंड हाईकोर्ट में सुनवाई
लालू प्रसाद यादव की अपील पर सुनवाई के दौरान पूर्व डिप्टी कलेक्टरों की गवाही पेश की गई
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
6 नवंबर 2026, सुबह 3:11 · अपडेट सुबह 3:24 · 4 मिनट का पाठ
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झारखंड हाईकोर्ट में चारे घोटाले से जुड़े देवघर खजाने से की गई अवैध निकासी के मामले में सुनवाई चल रही है। इस मामले में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव और अन्य आरोपियों की अपीलों पर विचार किया जा रहा है। सुनवाई के दौरान देवघर जिले में तत्कालीन समय में तैनात रहे पूर्व डिप्टी कलेक्टरों की गवाही और उनके बयान अदालत के समक्ष पेश किए गए। इन गवाहों ने वर्ष 1990 से 1995 के बीच खजाने में हुई अनियमितताओं और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के बारे में विस्तृत जानकारी दी।
अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, पूर्व डिप्टी कलेक्टर सुखदेव सिंह की गवाही अदालत के समक्ष पेश की गई। सुखदेव सिंह वर्ष 1993-94 के दौरान देवघर के डिप्टी कलेक्टर के रूप में सेवा दे रहे थे। उन्होंने अदालत को बताया कि उन्हें जुलाई 1993 में एक शिकायत मिली थी। यह शिकायत बिहार भ्रष्टाचार निरोध अभियान संघ के महासचिव द्वारा की गई थी, जिसमें पशुपालन विभाग के अधिकारियों पर खजाने से अवैध रूप से बिल पास कराने का आरोप था। शिकायत मिलने के बाद डिप्टी कलेक्टर ने खजाना अधिकारी से चर्चा की और जिला पशुपालन अधिकारी से आवंटन पत्र मांगे थे। बार-बार स्मरण पत्र भेजने के बावजूद आवश्यक दस्तावेज नहीं मिलने पर, उन्होंने 16 मई 1994 को दुमका के कमिश्नर को पत्र लिखकर पूरे मामले की जानकारी दी और जरूरत पड़ने पर मजिस्ट्रेट की नियुक्ति का अनुरोध किया। इस घटनाक्रम के बाद डिप्टी कलेक्टर का तबादला हो गया था। जिरह के दौरान गवाह ने स्वीकार किया कि शिकायत मिलने से पहले उन्होंने अतिरिक्त निकासी की कोई जांच नहीं की थी और देवघर में डिप्टी कलेक्टर के रूप में यह उनकी पहली नियुक्ति थी।
अपीलकर्ता पक्ष के वकील ने अदालत में तर्क दिया कि सुखदेव सिंह की गवाही में जिन पत्रों का उल्लेख किया गया है, उन्हें कभी अदालत में पेश नहीं किया गया। हालांकि, गवाह ने दावा किया कि इन पत्रों का विवरण प्रदर्श-28 में दर्ज है। गवाह ने यह भी बताया कि उनके द्वारा भेजे गए मजिस्ट्रेट जांच रिपोर्ट पर बाद में क्या कार्रवाई की गई, इसकी उन्हें जानकारी नहीं है। अदालत ने अन्य आरोपियों द्वारा की गई जिरह के विवरण को भी रिकॉर्ड पर लिया, जबकि कुछ आरोपियों की ओर से जिरह नहीं की गई।
मामले के दूसरे गवाह आर.के. खंडेलवाल थे, जो 5 नवंबर 1995 से 11 जून 1996 तक देवघर के डिप्टी कलेक्टर के रूप में कार्यरत थे। उन्होंने अदालत को बताया कि फरवरी 1996 में वित्त विभाग के फैक्स के बाद एक जांच समिति का गठन किया गया था। इस समिति ने वर्ष 1980-81 से 1995-96 तक की निकासी की जांच की थी। जिरह के दौरान उन्होंने स्वीकार किया कि डिप्टी कलेक्टर खजाने के प्रमुख होते हैं, लेकिन खजाने का दैनिक कार्य खजाना अधिकारी देखते हैं। उन्होंने आगे बताया कि जांच रिपोर्ट में केवल चार वर्षों के आवंटन का विवरण था और बिलों की जांच के लिए अंतिम सक्षम प्राधिकारी महालेखाकार (एकाउंटेंट जनरल) होते हैं।
इस पूरी सुनवाई में 1990 से 1995 के बीच की अवधि के दौरान प्रशासनिक प्रक्रियाओं, जांच समिति के कार्यों और वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए हैं। अदालत अब इन सभी सबूतों और गवाहियों के आधार पर आगे की कार्रवाई करेगी।
लालू प्रसाद यादव बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री रहे हैं और वे राष्ट्रीय जनता दल के नेता के रूप में जाने जाते हैं। वे चारे घोटाले से जुड़े विभिन्न मामलों में आरोपी के रूप में सामने आए थे।
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