चीन का रहस्यमयी 'स्पेसप्लेन': अंतरिक्ष में ड्रैगन के नए पंख और भविष्य के अंतरिक्ष युद्ध की तैयारी
चीन का पुनःउपयोगी स्पेसक्राफ्ट पृथ्वी की कक्षा में क्या कर रहा है? अमेरिका के X-37B जैसी ही तकनीक और उससे भारत पर पड़ने वाले प्रभावों का गहन विश्लेषण।

अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में अभी एक शांत लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण युद्ध चल रहा है, जिसमें चीन अपनी गुप्त शक्तियों का प्रदर्शन कर रहा है। हाल ही में अमेरिका की डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी (US Defense Intelligence Agency) ने एक सैटेलाइट तस्वीर जारी करके पुष्टि की है कि चीन का प्रायोगिक पुन:उपयोगी स्पेसक्राफ्ट (reusable spaceplane) पृथ्वी की कक्षा में सक्रिय है। यह वाहन अमेरिका के अत्यंत गुप्त X-37B स्पेसप्लेन जैसी ही डिजाइन रखता है, जो दर्शाता है कि चीन अब अंतरिक्ष में लंबे समय तक टिक सकने वाले और पृथ्वी पर वापस लौट सकने वाले वाहनों को विकसित करने में सफल रहा है।
स्पेसप्लेन (spaceplane) एक ऐसा अद्भुत वाहन है जो पृथ्वी के वातावरण में सामान्य विमान की तरह पंख फैलाकर उड़ सकता है और ग्लाइड (glide) कर सकता है, जबकि बाहरी अंतरिक्ष में यह एक स्पेसक्राफ्ट की तरह कार्य करता है। विकिपीडिया की रिपोर्ट के अनुसार, अब तक विश्व में केवल चार ही ऐसे स्पेसप्लेन हैं जो सफलतापूर्वक कक्षा में लॉन्च हुए हैं, पृथ्वी के वातावरण में पुन:प्रवेश किया है और सुरक्षित रूप से लैंड हुए हैं। इस सूची में अमेरिका का स्पेस शटल (Space Shuttle), रूस का बुरान (Buran), अमेरिका का X-37 और चीन का शानलोंग (Shenlong) शामिल हैं।
चीन का यह रहस्यमयी स्पेसक्राफ्ट, जिसे 'शानलोंग' (Shenlong) या 'डिवाइन ड्रैगन' के रूप में जाना जाता है, उसे वर्ष 2020 से 2026 के दौरान कुल 4 बार लॉन्च किया गया है। इस वाहन को चीन के लॉन्ग मार्च 2F (Long March 2F) रॉकेट द्वारा अंतरिक्ष में भेजा जाता है। चीन की नेशनल स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (CNSA) इस प्रोजेक्ट के बारे में बहुत ही कम जानकारी सार्वजनिक करती है, जिसके कारण वैश्विक स्तर पर इस वाहन के उद्देश्य को लेकर अनेक तर्क-वितर्क हो रहे हैं। यह केवल वैज्ञानिक प्रयोगों के लिए है या फिर इसमें सैन्य क्षमताएं भी छिपी हुई हैं, यह एक बड़ा प्रश्न है।
| नाम | देश | स्थिति | लॉन्च पद्धति |
|---|---|---|---|
| Space Shuttle | अमेरिका | निवृत्त | वर्टिकल (रॉकेट) |
| Buran | रूस | रद्द | वर्टिकल (रॉकेट) |
| X-37B | अमेरिका | सक्रिय | वर्टिकल (रॉकेट) |
| Shenlong | चीन | सक्रिय (प्रायोगिक) | वर्टिकल (रॉकेट) |
स्पेसप्लेन कैसे काम करता है, यह समझना बहुत ही रोचक है। यह रॉकेट की तरह लंबवत (vertically) लॉन्च होता है, लेकिन जब यह पृथ्वी पर वापस लौटता है तो यह रनवे पर सामान्य विमान की तरह क्षैतिज (horizontally) रूप से उतरता है। इस प्रक्रिया में सबसे बड़ी चुनौती वातावरण में पुन:प्रवेश (re-entry) के दौरान पैदा होने वाली प्रचंड गर्मी की है। जब कोई वाहन कक्षा से पृथ्वी की ओर आता है, तब उसकी गति बहुत ही अधिक होती है। इस गति के कारण पैदा होने वाली गर्मी से बचने के लिए उस पर थर्मल प्रोटेक्शन सिस्टम (thermal protection system) यानी गर्मी से बचाने वाला कवच लगाया जाता है।
विकिपीडिया के डेटा के अनुसार, अमेरिका के स्पेस शटल की सतह का तापमान पुन: प्रवेश (re-entry) के दौरान 1,650 °C (3,000 °F) तक पहुंच जाता था, जो स्टील के गलनांक (melting point) से भी अधिक है। चीन का नया स्पेसप्लेन भी ऐसी ही उन्नत सामग्री से बना होने की संभावना है। एक बार वायुमंडल में प्रवेश करने के बाद, ये वाहन एयरोडायनामिक कंट्रोल सरफेस (aerodynamic control surfaces), यानी हवा में दिशा बदलने के लिए पंखों का उपयोग करके ग्लाइडर की तरह नीचे आते हैं। उल्लेखनीय बात यह है कि स्पेस शटल जैसे वाहन लैंडिंग के समय अपने इंजन का उपयोग नहीं करते हैं, बल्कि केवल अपनी गति और हवा के प्रतिरोध का उपयोग करके रनवे तक पहुंचते हैं।
- वर्टिकल लॉन्चवाहन को पारंपरिक रॉकेट के शीर्ष पर या उसके साथ जोड़कर खड़ा लॉन्च किया जाता है।
- ऑर्बिटल ऑपरेशन्सभ्रमणकक्षा में पहुँचने के बाद, यह सोलर पैनल द्वारा ऊर्जा प्राप्त करता है और प्रयोगों या उपग्रह तैनात करने का काम करता है।
- री-एंट्रीमिशन पूरा होने पर यह वातावरण में प्रवेश करता है, जहाँ थर्मल टाइल्स इसे 1,650 डिग्री गर्मी से बचाती हैं।
- हॉरिजॉन्टल लैंडिंगवातावरण में यह एक ग्लाइडर की तरह उड़ता है और रनवे पर सामान्य विमान की तरह लैंड होता है।
चीन केवल शानलोंग पर ही नहीं रुक रहा है। चेंगदू एयरक्राफ्ट रिसर्च एंड डिजाइन इंस्टीट्यूट द्वारा 'हाओलोंग' (Haolong) नाम का एक और पुन:उपयोगी स्पेसप्लेन विकसित किया जा रहा है। यह वाहन विशेष रूप से चीन के 'तियानगोंग' (Tiangong) स्पेस स्टेशन पर सामान पहुंचाने के लिए बनाया गया है। इसकी लंबाई 10 मीटर और चौड़ाई 8 मीटर है, और यह 1.8 टन तक पेलोड (payload), यानी सामान ढोने की क्षमता रखता है। इसके पंख फोल्डिंग (folding wings) प्रकार के हैं, जो इसे रॉकेट के अंदर समाहित होने में मदद करते हैं।
भारत भी इस दौड़ में पीछे नहीं है। इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन (ISRO) अभी रियूजेबल लॉन्च व्हीकल (RLV) पर काम कर रहा है। अप्रैल 2023 में, इसरो ने कर्नाटक के चित्रदुर्ग में एक महत्वपूर्ण परीक्षण किया था। जिसमें एक छोटे पैमाने के स्पेसप्लेन प्रोटोटाइप को चिनूक हेलीकॉप्टर द्वारा 4.5 किमी की ऊंचाई से छोड़ा गया था। इस वाहन ने स्वायत्त रूप से (autonomously) ग्लाइड करके रनवे पर सफल लैंडिंग की थी। भारत का लक्ष्य ऐसा वाहन बनाना है जो रॉकेट और विमान दोनों की क्षमता रखता हो और अंतरिक्ष में जाने का खर्च कम कर सके।
पुन:उपयोगी स्पेसप्लेन का सबसे बड़ा फायदा इसकी लागत है। पारंपरिक रॉकेट एक बार इस्तेमाल होने के बाद बेकार हो जाते हैं, जबकि स्पेसप्लेन को बार-बार इस्तेमाल किया जा सकता है। हालांकि, इसकी डिजाइन और रखरखाव अत्यंत जटिल और खर्चीले होते हैं। अमेरिका का X-37B अब तक हजारों दिन अंतरिक्ष में बिता चुका है। वह वहां क्या करता है यह रहस्य है, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इसका उपयोग जासूसी उपग्रह तैनात करने, नए सेंसर्स का परीक्षण करने या अन्य देशों के उपग्रहों पर नजर रखने के लिए किया जाता है। चीन का शानलोंग भी इसी प्रकार की क्षमताएं रखने वाला माना जाता है।
चीन की स्पेस एजेंसी CNSA की स्थापना 1993 में हुई थी और बहुत ही कम समय में उसने चंद्रमा के पिछले हिस्से में लैंडिंग (Chang'e 4) और मंगल पर रोवर (Tianwen-1) उतारने जैसी उपलब्धियां हासिल की हैं। CNSA अभी तियानगोंग स्पेस स्टेशन का विस्तार कर रही है और 2025 तक और नए मॉड्यूल्स जोड़ने की योजना रखती है। इस स्पेस स्टेशन के लिए हाओलोंग जैसे स्पेसप्लेन एक सस्ता और तेज़ परिवहन माध्यम बने रहेंगे। रूस का बुरान प्रोजेक्ट भले ही बंद हो गया हो, लेकिन उसकी डिज़ाइन आज भी आधुनिक स्पेसप्लेन के लिए प्रेरणास्रोत है।
भविष्य में, स्पेसप्लेन न केवल सामान बल्कि यात्रियों को भी पृथ्वी के एक छोर से दूसरे छोर तक बहुत तेज़ी से पहुँचाने के लिए इस्तेमाल किए जा सकते हैं। न्यूज़ीलैंड की कंपनी डॉन एयरोस्पेस (Dawn Aerospace) अभी 'Mk-II Aurora' नाम का सबऑर्बिटल स्पेसप्लेन विकसित कर रही है, जिसने नवंबर 2024 में ध्वनि की गति (Mach 1.12) को पार करके रिकॉर्ड बनाया था। यह दर्शाता है कि अब निजी कंपनियाँ भी इस क्षेत्र में बड़ी भूमिका निभा रही हैं।
आम लोगों के लिए इस तकनीक का अर्थ यह है कि भविष्य में सैटेलाइट इंटरनेट, मौसम की भविष्यवाणी और जीपीएस जैसी सेवाएँ अधिक सस्ती और सटीक होंगी। हालाँकि, अंतरिक्ष में बढ़ती यह प्रतिस्पर्धा 'स्पेस वॉर' (Space War) के खतरों को भी बढ़ाती है। चीन का रहस्यमयी स्पेसप्लेन इस बात का सबूत है कि अब युद्ध के मैदान केवल ज़मीन या समुद्र तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पृथ्वी की कक्षा तक विस्तृत हो गए हैं। भारत के लिए भी यह एक चेतावनी और अवसर दोनों है कि वह अपने RLV प्रोजेक्ट को और तेज़ बनाए।
निष्कर्ष में, चीन का प्रायोगिक स्पेसप्लेन केवल एक विमान नहीं है, बल्कि यह चीन की बढ़ती तकनीकी ताकत का प्रतीक है। भले ही इसकी जानकारियों को गुप्त रखा गया हो, लेकिन इसकी उपस्थिति ही अंतरिक्ष विज्ञान के एक नए युग की शुरुआत का संकेत देती है। जहाँ वाहन पृथ्वी और अंतरिक्ष के बीच मुक्त रूप से आवाजाही कर सकेंगे, और अंतरिक्ष वास्तव में मानव जाति के लिए एक नया पता बन जाएगा।


