आसमान में रंगों की होली और जमीन पर अंधेरा: सौर तूफान पावर ग्रिड को कैसे ठप कर सकते हैं?
ध्रुवीय ज्योति के पीछे छिपा जटिल विज्ञान और पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में आने वाले विक्षोभ के गंभीर प्रभावों की विस्तृत व्याख्या।

जब हम उत्तर ध्रुव के आसमान में हरे और लाल रंग के पर्दों की तरह लहराती रोशनी देखते हैं, तो यह केवल प्रकृति का एक सुंदर दृश्य नहीं है, बल्कि अंतरिक्ष में चल रहे एक भयानक युद्ध का संकेत है। इस घटना को हम 'ओरोरा' (aurora) या ध्रुवीय ज्योति कहते हैं। जमीन से देखने पर यह रोशनी भले ही दूर और अस्पष्ट लगे, लेकिन यह सीधे तौर पर पृथ्वी के भीतर बहने वाली विद्युत धारा से जुड़ी है। हालिया शोध दर्शाते हैं कि इस सुंदरता के पीछे पावर ग्रिड और तकनीक को नुकसान पहुँचाने की क्षमता छिपी हुई है।
इस पूरी प्रक्रिया को समझने के लिए हमें सूर्य और पृथ्वी के बीच के संबंध को समझना पड़ता है। सूर्य लगातार आवेशित कणों का प्रवाह छोड़ता है, जिसे 'सोलर विंड' (solar wind) या सौर पवन कहा जाता है। कभी-कभी सूर्य की सतह पर बड़े विस्फोट होते हैं, जिन्हें 'कोरोनल मास इजेक्शन' (coronal mass ejection - CME) कहा जाता है। इस विस्फोट के द्वारा अरबों टन आवेशित कण और चुंबकीय क्षेत्र अंतरिक्ष में फेंके जाते हैं। जब इन कणों का बादल पृथ्वी की तरफ आता है, तो वह पृथ्वी के सुरक्षा कवच से टकराता है।

पृथ्वी के आसपास एक अदृश्य चुंबकीय कवच है जिसे 'मैग्नेटोस्फेयर' (magnetosphere) कहा जाता है। यह कवच पृथ्वी के आंतरिक भाग में मौजूद पिघले हुए लोहे की हलचल से पैदा होता है। सामान्य तौर पर यह कवच हमें सूर्य के हानिकारक विकिरणों से बचाता है। लेकिन जब सूर्य से आने वाले कणों का दबाव बढ़ता है, तब यह मैग्नेटोस्फेयर दब जाता है। सूर्य की तरफ के हिस्से में यह कवच संकुचित होता है और पीछे के हिस्से में यह लंबी पूंछ की तरह खींच जाता है, जिसे 'मैग्नेटोटेल' (magnetotail) कहा जाता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, यदि सूर्य से आने वाले चुंबकीय क्षेत्र की दिशा पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र के अनुकूल हो, तो दोनों क्षेत्र एक-दूसरे के साथ जुड़ जाते हैं। इस प्रक्रिया के कारण पृथ्वी के पीछे की तरफ मौजूद मैग्नेटोटेल में प्रचुर मात्रा में चुंबकीय ऊर्जा जमा होती है। जब यह ऊर्जा हद से ज्यादा बढ़ जाती है, तब यह अचानक विस्फोटक रूप से मुक्त होती है। इस घटना को 'सबस्टॉर्म' (substorm) या चुंबकीय उप-तूफान कहा जाता है। यह ऊर्जा पृथ्वी से लगभग 45,000 से 65,000 किलोमीटर दूर मुक्त होती है।
- सौर विस्फोटसूर्य की सतह से कोरोनल मास इजेक्शन (CME) द्वारा चार्ज किए गए कण मुक्त होते हैं।
- चुंबकीय जुड़ावसौर पवन पृथ्वी के मैग्नेटोस्फेयर से टकराती है और चुंबकीय रेखाएं खींचकर मैग्नेटोटेल बनाती हैं।
- ऊर्जा मुक्तिमैग्नेटोटेल में चुंबकीय रेखाएं फिर से जुड़ने पर (reconnection) प्रचुर ऊर्जा मुक्त होती है।
- वातावरण संबंधी टक्करतेज़ कण पृथ्वी के वातावरण में गैस से टकराकर अरोरा और विद्युत प्रवाह पैदा करते हैं।
- ग्राउंड इंडक्शनचुंबकीय बदलाव ज़मीन और पावर लाइनों में अनावश्यक विद्युत प्रवाह (GIC) पैदा करते हैं जो ग्रिड को नुकसान पहुँचाते हैं।
इस विस्फोट के दौरान, ऊर्जावान कण पृथ्वी की चुंबकीय रेखाओं पर बहुत तेजी से पृथ्वी की ओर दौड़ते हैं। जब ये कण पृथ्वी के वायुमंडल में मौजूद ऑक्सीजन और नाइट्रोजन के परमाणुओं से टकराते हैं, तो उनसे प्रकाश पैदा होता है। यही प्रकाश हमें जमीन से ओरोरा के रूप में दिखाई देता है। सामान्य तौर पर यह टक्कर जमीन से 90 से 150 किलोमीटर की ऊँचाई पर होती है। लेकिन यह केवल प्रकाश का खेल नहीं है; ये कण पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल में शक्तिशाली विद्युत धारा भी पैदा करते हैं।
बिजनेस लाइन की रिपोर्ट के अनुसार, मिशिगन विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने NASA के THEMIS और NOAA के GOES उपग्रहों के डेटा का उपयोग करके एक महत्वपूर्ण खोज की है। उन्होंने पाया कि जब मैग्नेटोटेल में चुंबकीय रेखाएं फिर से जुड़ती हैं, तो उसके केवल 7 मिनट के भीतर पृथ्वी की सतह पर चुंबकीय क्षेत्र में बड़ा बदलाव देखा जाता है। इसका अर्थ यह है कि अंतरिक्ष में हजारों किलोमीटर दूर होने वाली घटना का प्रभाव पृथ्वी की तकनीक पर मिनटों में पड़ सकता है।
nT (નેનો-ટેસ્લા)
जब आकाश में ये चुंबकीय परिवर्तन होते हैं, तो वे जमीन के भीतर और पावर लाइनों में विद्युत प्रवाह पैदा करते हैं। इसे 'जियोमैग्नेटिकली इंड्यूस्ड करंट्स' (GIC) कहा जाता है। यह विद्युत प्रवाह इतना शक्तिशाली हो सकता है कि यह पावर ग्रिड के ट्रांसफार्मर को जला सकता है या सर्किट ब्रेकर्स को ट्रिप कर सकता है। इससे पूरे शहरों या देशों में ब्लैकआउट हो सकता है। 1989 में कनाडा के क्यूबेक में ऐसा ही हुआ था, जहां केवल 9 सेकंड में पूरी पावर ग्रिड विफल हो गई थी और 60 लाख लोग 9 घंटे तक अंधेरे में रहे थे।
भू-चुंबकीय तूफानों की तीव्रता मापने के लिए वैज्ञानिक 'Dst इंडेक्स' (Disturbance - Storm Time index) का उपयोग करते हैं। यह इंडेक्स पृथ्वी की भूमध्य रेखा पर चुंबकीय क्षेत्र में होने वाले बदलाव को नैनो-टेस्ला (nT) में मापता है। सामान्य समय में यह मान +20 से -20 nT के बीच होता है। यदि यह मान -50 nT से नीचे चला जाता है, तो इसे चुंबकीय तूफान माना जाता है। इतिहास का सबसे बड़ा तूफान 1859 में आया था, जिसे 'कैरिंगटन इवेंट' (Carrington Event) कहा जाता है। उस समय Dst इंडेक्स लगभग -1760 nT तक पहुंच गया था, ऐसा माना जाता है।
| स्केल | तीव्रता | पावर ग्रिड पर असर |
|---|---|---|
| G1 | हल्का | पावर ग्रिड में मामूली उतार-चढ़ाव हो सकता है। |
| G2 | मध्यम | उच्च अक्षांश पर वोल्टेज अलार्म आ सकता है, ट्रांसफार्मर को नुकसान हो सकता है। |
| G3 | मजबूत | वोल्टेज कंट्रोल में समस्या और प्रोटेक्शन डिवाइस में गलत ट्रिपिंग हो सकती है। |
| G4 | गंभीर | व्यापक वोल्टेज कंट्रोल समस्याएं और ग्रिड में अस्थिरता आ सकती है। |
| G5 | अत्यंत तीव्र | ग्रिड पूरी तरह से बैठ सकता है और ट्रांसफॉर्मर जल सकते हैं। |
कैरिंगटन इवेंट के समय दुनिया में आज जैसी पावर ग्रिड नहीं थी, लेकिन उस समय टेलीग्राफ नेटवर्क था। इस तूफान के कारण टेलीग्राफ के तारों में इतना विद्युत प्रवाह पैदा हुआ कि ऑपरेटरों को बिजली के झटके लगे और मशीनों में आग लग गई। यदि आज ऐसा तूफान आता है, तो यह आधुनिक उपग्रहों, GPS सिस्टम और इंटरनेट केबलों को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है। 2003 के 'हैलोवीन तूफान' के दौरान स्वीडन में 50,000 लोगों की बिजली चली गई थी और जापान का एक उपग्रह स्थायी रूप से बंद हो गया था।

पृथ्वी पर इन तूफानों का असर हर जगह एक जैसा नहीं होता है। शोधकर्ताओं ने गौर किया है कि दो स्टेशन जो केवल कुछ किलोमीटर दूर हों, वहां भी चुंबकीय परिवर्तन अलग-अलग हो सकते हैं। इसका कारण जमीन की संरचना है। यदि जमीन में नमी अधिक हो या चट्टानों की संरचना ऐसी हो जो बिजली को बेहतर तरीके से प्रवाहित कर सके, तो वहां अधिक नुकसान होने की संभावना रहती है। इसीलिए पावर ग्रिड ऑपरेटरों को स्थानीय भूविज्ञान को ध्यान में रखकर सुरक्षा व्यवस्था करनी पड़ती है।
सौर तूफानों की भविष्यवाणी करना मौसम की भविष्यवाणी करने जितना ही कठिन है। सूर्य पर होने वाले विस्फोटों को देखकर वैज्ञानिक कुछ घंटों या दिनों पहले चेतावनी दे सकते हैं। NOAA द्वारा 'G-स्केल' (G-scale) का उपयोग किया जाता है, जो G1 (हल्का) से G5 (अत्यंत तीव्र) तक के स्तरों को दर्शाता है। G5 स्तर का तूफान पृथ्वी पर रेडियो संचार को पूरी तरह से ठप कर सकता है और पावर ग्रिड में व्यापक नुकसान पहुँचा सकता है।

भारत जैसे देशों के लिए भी यह चिंता का विषय है। हालांकि भारत भूमध्य रेखा के करीब होने के कारण यहाँ अरोरा (ध्रुवीय ज्योति) दिखने की संभावना कम है, लेकिन शक्तिशाली तूफानों के समय चुंबकीय क्षेत्र में होने वाले बदलाव भारतीय पावर ग्रिड को भी प्रभावित कर सकते हैं। विशेष रूप से लंबी ट्रांसमिशन लाइनों में GIC उत्पन्न होने का जोखिम अधिक रहता है। मई 2024 में आया तूफान पिछले दो दशकों का सबसे शक्तिशाली तूफान था, जिसने साबित कर दिया कि सूर्य की गतिविधियाँ अब अधिक सक्रिय हो रही हैं।
आगामी वर्षों में सूर्य अपने 11 वर्ष के चक्र के उच्चतम बिंदु (Solar Maxima) पर पहुँचेगा, जिसका अर्थ है कि सौर तूफानों की संख्या बढ़ेगी। वैज्ञानिक अब बेहतर मॉडलों और सैटेलाइट डेटा का उपयोग करके इन तूफानों के सटीक प्रभाव को समझने का प्रयास कर रहे हैं। आकाश में दिखने वाली वह सुंदर ध्रुवीय ज्योति हमें याद दिलाती है कि हम एक विशाल और गतिशील ब्रह्मांड का हिस्सा हैं, जहाँ सूर्य की एक छोटी सी हलचल भी हमारी आधुनिक जीवनशैली को पल भर में रोक सकती है।


