ड्रोन का होगा सफाया: कलाश्निकोव की MP-155 शॉटगन अब भारत में बनेगी, जानिए इसकी तकनीक और कार्यप्रणाली
रूस की प्रसिद्ध हथियार निर्माता कंपनी कलाश्निकोव कंसर्न भारत की कंपनी के साथ मिलकर MP-155 शॉटगन का उत्पादन करेगी, जो आधुनिक युद्ध में ड्रोन के खिलाफ अचूक हथियार साबित हो रही है।

रूस की विश्वविख्यात हथियार निर्माता कंपनी कलाश्निकोव कंसर्न (Kalashnikov Concern) ने भारत की एक स्थानीय कंपनी के साथ MP-155 शॉटगन के उत्पादन के लिए लाइसेंसिंग करार किए हैं। यह वही कंपनी है जिसने दुनिया की सबसे लोकप्रिय राइफल AK-47 बनाई है। कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एलेन लुशनिकोव ने इस समझौते की पुष्टि की है, जो भारत-रूस रक्षा सहयोग में एक नया अध्याय जोड़ेगा।
MP-155 मूल रूप से शिकार के लिए तैयार की गई सेमी-ऑटोमैटिक (semi-automatic) 12 गेज की शॉटगन है। हालांकि, हाल के युद्धों में यह आकाश में कम ऊंचाई पर उड़ने वाले ड्रोन के खिलाफ अत्यंत प्रभावी साबित हुई है। यह हथियार रूस के इजेव्स्क मैकेनिकल प्लांट (Izhevsk Mechanical Plant) में विकसित किया गया है और इसका उत्पादन 2012 से शुरू किया गया था।
MP-155 का इतिहास और विकास
यह शॉटगन अपने पूर्ववर्ती मॉडल MP-153 के आधार पर तैयार की गई है। MP-153 की तुलना में इस नए मॉडल में वजन घटाने और संतुलन सुधारने पर विशेष ध्यान दिया गया है। इजेव्स्क प्लांट का इतिहास 1807 से शुरू होता है, जब रूसी सम्राट अलेक्जेंडर प्रथम द्वारा इसकी स्थापना की गई थी। यह प्लांट दशकों से रूसी सेना के लिए अत्याधुनिक हथियार प्रदान करता रहा है।
कलाश्निकोव कंसर्न अभी रूस के 95% छोटे हथियारों का उत्पादन करती है और 27 से अधिक देशों में निर्यात करती है। MP-155 इसी परंपरा का आधुनिक संस्करण है। 2017 में कंपनी ने इस शॉटगन का नया वर्जन पेश किया था, जिसमें बाएं हाथ से शूटिंग करने वालों के लिए भी सुविधाएं जोड़ी गई थीं।
गैस-ऑपरेटेड मैकेनिज्म: यह कैसे काम करता है?
MP-155 एक गैस-ऑपरेटेड (gas-operated) सेमी-ऑटोमैटिक शॉटगन है। इस तकनीक में जब कारतूस छोड़ा जाता है, तब उससे उत्पन्न होने वाली गर्म गैस का एक छोटा हिस्सा बैरल (barrel) में मौजूद एक छेद के माध्यम से गैस पिस्टन (gas piston) की ओर मोड़ा जाता है। इस गैस का दबाव पिस्टन को पीछे धकेलता है, जो खाली खोखा बाहर निकालता है और मैगजीन से नया कारतूस लोड करता है।
इस शॉटगन की खासियत यह है कि इसके गैस पिस्टन में ऑटोमेशन इंजन के इम्पल्स (impulse) को एडजस्ट करने की मैकेनिज्म दी गई है। इससे शूटर विभिन्न प्रकार के कारतूस के अनुसार गैस के दबाव को नियंत्रित कर सकता है। इस सुविधा के कारण हथियार का संतुलन बना रहता है और गोली चलाते समय लगने वाला झटका यानी रिकोइल (recoil) कम महसूस होता है।
| विवरण | मानदंड |
|---|---|
| कैलिबर (Caliber) | 12/76 और 12/89 |
| कार्यपद्धति | गैस-ऑपरेटेड सेमी-ऑटोमैटिक |
| अधिकतम दबाव क्षमता | 1050 बार (Bar) |
| असरदार रेंज (ड्रोन के खिलाफ) | 50 से 100 मीटर |
| उत्पादन शुरुआत | वर्ष 2012 |
एंटी-ड्रोन संस्करण की विशेषताएं
ड्रोन विरोधी गतिविधियों के लिए MP-155 में कुछ महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं। इस टैक्टिकल (tactical) संस्करण में पिकाटिनी रेल (Picatinny rail) लगाई गई है, जिस पर रेड-डॉट साइट (red-dot sight) या नाइट विजन डिवाइस (night vision device) जैसे आधुनिक उपकरण जोड़े जा सकते हैं। इन उपकरणों की मदद से सैनिक तेजी से उड़ते ड्रोन को सटीक रूप से निशाना बना सकते हैं।
यह शॉटगन 12/76 और 12/89 कैलिबर (caliber) के कारतूस चला सकती है। एंटी-ड्रोन भूमिका में इसमें विस्तारित मैगजीन (extended magazine) का उपयोग किया जाता है, जिससे सैनिक अधिक राउंड फायर कर सकें। विशेष प्रकार के छर्रों (shot) वाले कारतूस का उपयोग करके यह 50 से 100 मीटर की दूरी तक के छोटे और तेज़ ड्रोनों को मार गिराने में सक्षम है।
- फायरिंग और गैस रिलीजजब ट्रिगर दबाया जाता है, तब कारतूस फूटता है और गैस उत्पन्न होती है।
- पिस्टन मूवमेंटबैरल के छेद से गैस पिस्टन की तरफ जाती है और उसे पीछे धकेलती है।
- इजेक्शनपिस्टन की पीछे की गति इस्तेमाल किए गए कारतूस के खाली खोल को बाहर फेंक देती है।
- रीलोडिंगस्प्रिंग के दबाव से पिस्टन वापस लौटता है और मैगजीन से नया कारतूस चैंबर में लोड करता है।
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| वजन | 3.15 से 3.8 किलोग्राम |
| कैलिबर | 12/76 और 12/89 |
| दबाव क्षमता | 1050 बार (Bar) |
| उत्पादन वर्ष | 2012 |
तकनीकी विशिष्टताएँ और आँकड़े
MP-155 का वजन 3.15 से 3.8 किलोग्राम के बीच होता है। वजन में यह कमी एल्युमिनियम एलॉय (aluminum alloy) के उपयोग के कारण संभव हुई है, जिससे इसकी रिसीवर (receiver) बॉडी बनाई जाती है। यह धातु मजबूत होने के साथ हल्की भी है, जो लंबे समय तक हथियार पकड़े रखने में सैनिकों के लिए मददगार होती है।
यह शॉटगन 1050 बार (Bar) तक के दबाव को सहन कर सके इस तरह डिज़ाइन की गई है। इसका अर्थ यह है कि यह स्टील और लेड (lead) दोनों प्रकार के छर्रों वाले शक्तिशाली कारतूस सुरक्षित रूप से फायर कर सकती है। इसकी डिज़ाइन ऐसी है कि यह अत्यधिक कठोर भौगोलिक परिस्थितियों में भी विश्वसनीयता के साथ काम कर सकती है।

ड्रोन के सामने शॉटगन ही क्यों?
आधुनिक युद्ध में एफपीवी (FPV) और कामिकाजे (kamikaze) ड्रोन का खतरा बढ़ रहा है। पारंपरिक राइफलें एक बार में एक ही गोली छोड़ती हैं, जिससे छोटे और अत्यधिक तेज ड्रोन को निशाना बनाने में कठिनाई उत्पन्न होती है। इसकी तुलना में शॉटगन एक साथ कई छोटे छर्रे हवा में फैलाती है, जो बड़े क्षेत्र को कवर करते हैं। ये छर्रे ड्रोन के प्रोपेलर या इलेक्ट्रॉनिक्स को नुकसान पहुँचाकर उसे तुरंत नीचे गिरा देते हैं।
यूक्रेन संघर्ष के दौरान सैनिकों ने महसूस किया है कि जब ड्रोन बहुत नजदीक आ जाता है, तब शॉटगन सबसे प्रभावी बचाव साधन है। कलाश्निकोव कंपनी ने इसी आवश्यकता को समझकर MP-155 को एंटी-ड्रोन भूमिका के लिए अनुकूल बनाया है। यह हथियार सस्ता है और इसका उपयोग करने के लिए सैनिकों को बहुत लंबी ट्रेनिंग की आवश्यकता नहीं पड़ती है।
भारत के लिए इसका महत्व
भारत पहले से ही अमेठी में इंडो-रशियन राइफल्स प्राइवेट लिमिटेड द्वारा AK-203 असॉल्ट राइफलों का उत्पादन कर रहा है। MP-155 का नया अनुबंध इस सहयोग को और गहरा बनाएगा। भारतीय सीमाओं पर ड्रोन द्वारा हथियारों और ड्रग्स की तस्करी के मामले बढ़ रहे हैं, तब यह शॉटगन सुरक्षा बलों के लिए एक महत्वपूर्ण साधन साबित हो सकती है।
यह प्रोजेक्ट भारत की 'आत्मनिर्भर भारत' नीति के अनुरूप है। शुरुआत में रूसी तकनीकी सहायता के साथ उत्पादन किया जाएगा और धीरे-धीरे इसमें स्थानीय सामग्री का हिस्सा बढ़ाया जाएगा। हालांकि भारतीय साझेदार का नाम और उत्पादन का सटीक आंकड़ा अभी घोषित नहीं किया गया है, लेकिन यह कदम भारत की आंतरिक और सीमा सुरक्षा को मजबूत बनाएगा।
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