अंधेरी अंतरिक्ष यात्राओं का आणविक पावर हाउस: RTG की इंजीनियरिंग और कार्यप्रणाली
सूर्य के प्रकाश के बिना अरबों किलोमीटर दूर तैरते अंतरिक्ष यान दशकों तक निरंतर बिजली कैसे प्राप्त करते हैं? रेडियोआइसोटोप थर्मोइलेक्ट्रिक जनरेटर (RTG) के भौतिक विज्ञान, इतिहास और भविष्य की तकनीक की गहन समझ।

अंतरिक्ष विज्ञान में जब कोई स्पेसक्राफ्ट सौर मंडल की अति दूरस्थ सीमाओं की ओर प्रस्थान करता है, तब सूर्य का प्रकाश इतना क्षीण हो जाता है कि विशाल सोलर पैनल्स भी काम करना बंद कर देते हैं। ऐसे कठिन और अंधेरे वातावरण में मानव निर्मित उपकरणों को दशकों तक जीवित रखने का काम 'रेडियोआइसोटोप थर्मोइलेक्ट्रिक जनरेटर' (Radioisotope Thermoelectric Generator - RTG) करता है। जिसे सरल भाषा में 'न्यूक्लियर बैटरी' या रेडियोआइसोटोप पावर सिस्टम (Radioisotope Power System - RPS) के रूप में जाना जाता है। यह एक ऐसा अद्भुत उपकरण है जिसमें कोई गतिशील भाग (moving parts) नहीं होते, जिसके कारण इसके पुर्जों के घिसने या खराब होने का कोई भय नहीं रहता है।
RTG का मूल सिद्धांत दो अत्यंत जटिल विज्ञान क्षेत्रों का संयोजन करता है: रेडियोएक्टिव क्षय (radioactive decay) से उत्पन्न होने वाली अत्यधिक ऊष्मा और विद्युत इंजीनियरिंग की 'सीबेक इफेक्ट' (Seebeck effect)। सामान्य फ्यूल सेल, केमिकल बैटरी या यांत्रिक जनरेटर जहां विफल हो जाते हैं या भारी पड़ते हैं, वहां यह उपकरण सौ या कुछ सौ वाट विद्युत ऊर्जा लगातार दशकों तक प्रदान करता है। जमीन पर और अंतरिक्ष में बिना रखरखाव के वर्षों तक काम करने के लिए यह सिस्टम दुनिया भर की स्पेस एजेंसियों के लिए वरदान साबित हुआ है।

इस तकनीक की नींव वर्ष 1954 में माउंड लेबोरेटरीज (Mound Laboratories) के वैज्ञानिकों केनेथ सी. जॉर्डन (Kenneth C. Jordan) और जॉन बर्डन (John Birden) द्वारा रखी गई थी। इस खोज के लिए उन्हें वर्ष 2013 में 'नेशनल इन्वेंटर्स हॉल ऑफ फेम' में स्थान मिला था। 1 जनवरी 1957 से यूनाइटेड स्टेट्स आर्मी सिग्नल कॉर्प्स के अनुबंध के तहत पोलोनियम-210 (polonium-210) को ऊष्मा स्रोत के रूप में उपयोग करके थर्मोकपल्स के माध्यम से सीधे बिजली बनाने पर गहन शोध शुरू हुआ था। यू.एस. एटॉमिक एनर्जी कमीशन के साथ हुए अनुबंध के तहत डॉ. बर्ट्राम सी. ब्लैंक (Dr. Bertram C. Blanke) के नेतृत्व में ओहियो के मियामिसबर्ग में प्रथम व्यावहारिक RTG का विकास हुआ था।
- 1. रेडियोएक्टिव क्षयरेडियोएक्टिव ईंधन (जैसे कि प्लूटोनियम-238) के प्राकृतिक अल्फा क्षय द्वारा निरंतर अत्यधिक ऊष्मा पैदा होती है।
- 2. तापमान का अंतरअंदर के हॉट जंक्शन (ईंधन पात्र) और बाहर के कूलिंग ग्रिड से जुड़े कोल्ड जंक्शन के बीच बड़ा तापमान भेद उत्पन्न होता है।
- 3. सीबेक प्रभाव से विद्युत प्रवाहसीबेक प्रभाव (Seebeck effect) के तहत थर्मोकपल के अर्धचालक छत से तापमान भेद के कारण इलेक्ट्रॉन बहते हैं और विद्युत बनती है।
- 4. उपकरणों को पावर वितरणश्रेणीबद्ध जुड़े थर्मोकपल्स द्वारा उत्पन्न वोल्टेज स्पेसक्राफ्ट के कैमरा और उपकरणों को प्रदान किया जाता है।
अंतरिक्ष क्षेत्र में पहली यात्रा वर्ष 1961 में हुई, जब अमेरिका की यू.एस. नेवी के Transit 4A सैटेलाइट में SNAP 3B नामक पहला RTG लॉन्च किया गया, जिसमें 96 ग्राम प्लूटोनियम-238 (plutonium-238) मेटल का उपयोग हुआ था। इसके बाद पृथ्वी पर अलास्का के बंजर फेयरवे रॉक (Fairway Rock) में 1966 से 1995 तक नेवी द्वारा RTG का भूमिगत उपयोग किया गया। दूसरी ओर, सोवियत संघ ने 1980 के दशक के अंत तक उत्तरी ध्रुव के आर्कटिक सर्कल क्षेत्र में मानव रहित लाइटहाउस और नेविगेशन बीकन्स चलाने के लिए 1,007 जितने विशाल RTG (जिनमें Beta-M श्रेणी मुख्य थी) स्थापित किए थे। वर्ष 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद कई जनरेटर लावारिस हो गए थे, लेकिन रूसी और अंतरराष्ट्रीय प्रयासों से 2021 तक इन सभी इकाइयों को सुरक्षित रूप से डीकमीशन कर दिया गया था।
अमेरिकी वायुसेना ने भी अलास्का में स्थित 'Top-ROCC' और 'SEEK IGLOO' रडार प्रणालियों के लिए स्ट्रोंशियम-90 (strontium-90) से चलने वाली ज़मीनी और समुद्री तल की 100 से 150 के करीब RTG इकाइयों को 1970 और 1980 के दशक में तैनात किया था। एक समय चिकित्सा क्षेत्र में भी हृदय के पेसमेकर (pacemaker) में प्लूटोनियम की छोटी माइक्रो-बैटरी का उपयोग करने का प्रयोग 1 जून 1966 को माउंड लैब द्वारा शुरू किया गया था। लेकिन मानव शरीर के दाह संस्कार (cremation) के समय न्यूक्लियर ईंधन सुरक्षित रहेगा या नहीं, इस आशंका के कारण 1972 में यह प्रोग्राम बंद कर दिया गया; वर्ष 2004 में 90 और 2007 के अंत तक ऐसे केवल 9 पेसमेकर उपयोग में बचे थे।
अंतरिक्ष क्षेत्र में RTG का उपयोग अद्वितीय रहा है। नासा के विख्यात मिशन जैसे कि Pioneer 10 और 11, Voyager 1 और 2, Galileo, Ulysses, Cassini, और प्लूटो की ओर गया New Horizons पूरी तरह से RTG पावर पर निर्भर थे। भविष्य में शनि के उपग्रह टाइटन पर जाने वाले Dragonfly मिशन में भी RTG का उपयोग होगा। मून लैंडिंग के समय Apollo 12 से लेकर Apollo 17 तक के सभी मिशनों में उपकरणों को चलाने के लिए SNAP 27 नामक RTG रखे गए थे। हालांकि Apollo 13 मिशन बीच में ही रद्द होने के कारण उसका RTG दक्षिण प्रशांत महासागर की टोंगा ट्रेंच (Tonga Trench) की गहराई में समा गया था। मंगल ग्रह पर रोवर चलाने के लिए सोलर पैनल के बजाय Curiosity (जिसमें 4.8 किलोग्राम प्लूटोनियम-238 डाइऑक्साइड है) और Perseverance रोवर में RTG को चुना गया ताकि धूल के तूफानों के बीच भी वर्षों तक काम जारी रहे।

RTG की बनावट न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी के मानकों के अनुसार बहुत सरल लेकिन अत्यधिक मज़बूत होती है। इसके केंद्र में एक मज़बूत कंटेनर होता है जिसमें रेडियोएक्टिव ईंधन रखा जाता है। इस कंटेनर की दीवारों में थर्मोकपल्स (thermocouples) लगाए गए होते हैं। थर्मोकपल का अंदरूनी सिरा गर्म ईंधन के साथ और बाहरी सिरा बाह्य वातावरण या रेडिएटर पंखों (heat sink) के साथ जुड़ा होता है। थर्मोकपल ऐसा अर्धचालक (semiconductor) या धातु का बना उपकरण है जो 'सीबेक इफेक्ट' नामक भौतिकी के सिद्धांत पर काम करता है। जब बंद सर्किट में जुड़े दो धातु के जोड़ों (junctions) के बीच तापमान का बड़ा अंतर पैदा होता है, तब सर्किट में अपने आप विद्युत प्रवाह (electric current) बहने लगता है। वांछित वोल्टेज प्राप्त करने के लिए ऐसे सैकड़ों थर्मोकपल्स को श्रेणीबद्ध (series) जोड़ा जाता है।
यहाँ यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि RTG कोई न्यूक्लियर रिएक्टर (nuclear reactor) नहीं है। परमाणु संयंत्रों या अंतरिक्ष में उपयोग किए जाने वाले रिएक्टर (जैसे सोवियत रूस का BES-5 Buk या अमेरिका का SNAP-10A) न्यूक्लियर फिशन (nuclear fission) यानी परमाणु विखंडन की श्रृंखला अभिक्रिया (chain reaction) पर काम करते हैं। इन्हें न्यूट्रॉन अवशोषक कंट्रोल रॉड्स द्वारा नियंत्रित किया जा सकता है, इनकी विद्युत क्षमता को बढ़ाया-घटाया जा सकता है या इन्हें बंद भी किया जा सकता है। इसके विपरीत, RTG में कोई चेन रिएक्शन नहीं होती है। इसमें केवल ईंधन के परमाणुओं के स्वतःस्फूर्त क्षय (spontaneous decay) से ऊष्मा उत्पन्न होती है। इस ऊष्मा की दर ईंधन के अर्ध-आयु (half-life) पर निर्भर करती है और इसे बढ़ाया, घटाया या बंद नहीं किया जा सकता है। इसलिए अतिरिक्त विद्युत आवश्यकता के लिए सहायक रिचार्जेबल बैटरी का उपयोग करना पड़ता है और लॉन्चिंग के समय भी जनरेटर को लगातार कूलिंग की आवश्यकता होती है। RTG में मेल्टडाउन या परमाणु विस्फोट संभव नहीं है, लेकिन यदि रॉकेट फट जाए तो रेडियोधर्मी प्रदूषण का भय अवश्य रहता है।
ईंधन का चयन करते समय विशेष ध्यान रखना पड़ता है। ईंधन का अर्ध-आयु (half-life: पदार्थ की मात्रा आधी होने में लगने वाला समय) इतना लंबा होना चाहिए कि वह दशकों तक समान दर पर ऊष्मा दे सके। अंतरिक्ष मिशनों के लिए कम वजन और कम आकार में अधिक पावर (high power density) देने वाला ईंधन चाहिए। साथ ही, ईंधन से मुक्त होने वाला विकिरण मुख्य रूप से अल्फा क्षय (alpha decay) प्रकार का होना चाहिए। यदि बीटा या गामा रेडिएशन हो तो उसे रोकने के लिए भारी शील्डिंग (सीसे या भारी धातु की परत) बनानी पड़ती है, जो स्पेसक्राफ्ट का वजन बढ़ा देती है। प्लूटोनियम-238 इन सभी शर्तों पर खरा उतरता है।

वर्तमान में विश्व में प्लूटोनियम-238 की भारी कमी होने के कारण वैज्ञानिक नवीन सबक्रिटिकल रिएक्शन (subcritical reactions) वाले RTG पर काम कर रहे हैं। वर्ष 2012 में नासा की NSPIRE प्रतियोगिता में प्रस्तावित और 2013 में इडाहो नेशनल लेबोरेटरी के सेंटर फॉर स्पेस न्यूक्लियर रिसर्च (CSNR) द्वारा अध्ययन की गई इस प्रणाली में, प्लूटोनियम से निकलने वाले अल्फा कणों की बेरिलियम (beryllium) के साथ अभिक्रिया कराकर न्यूट्रॉन स्रोत तैयार किया जाता है। कंट्रोल फैक्टर Keff < 1 रखकर सबक्रिटिकल प्रक्रिया से सामान्य फिशन जनरेट किया जाता है। फिशन प्रक्रिया अल्फा क्षय (6 MeV) की तुलना में 30 गुना अधिक ऊर्जा (200 MeV) मुक्त करती है, इसलिए यह सिस्टम ईंधन की कार्यक्षमता में 10% की वृद्धि करता है, जिससे प्लूटोनियम का उपयोग घट जाता है।
इसके अलावा, अत्यंत दूर के तारामंडलों की ओर जाने वाले अंतरतारकीय मिशनों (interstellar missions), जैसे कि वर्ष 2003 से चल रहे 'Innovative Interstellar Explorer' प्रस्ताव के लिए अमेरिशियम-241 (241Am) ईंधन का प्रस्ताव 2002 में रखा गया था। अमेरिशियम की क्षय दर बहुत धीमी होने के कारण यह अंतरिक्ष यान को 1,000 वर्षों तक ऊर्जा दे सकता है। 1999 के एक प्रस्ताव में एडवांस्ड रेडियोआइसोटोप पावर सोर्स (ARPS) की मदद से 'रेडियोआइसोटोप इलेक्ट्रिक प्रोपल्शन' (REP) द्वारा आयन इंजन चलाने की अवधारणा प्रस्तुत की गई थी। प्रौद्योगिकी के ये नए क्षितिज दर्शाते हैं कि जब मानवजाति सौरमंडल के बाहर के अंधेरे अक्षांशों को पार करने निकलेगी, तब यही आणविक हृदय उसके विज्ञान और संपर्क प्रणाली को जीवित रखेगा।


