डिजिटल आँख की क्रांति: स्मार्टफोन कैमरे के पीछे का विज्ञान और सीएमओएस सेंसर की कार्यप्रणाली
आज के स्मार्टफोन और डिजिटल कैमरों का हृदय माने जाने वाले सीएमओएस (CMOS) इमेज सेंसर की संरचना, कार्यपद्धति और सीसीडी तकनीक पर हासिल की गई विजयगाथा की गहरी समझ।

कैमरे की क्रांति का हृदय: सीमोस तकनीक क्या है?
आज हम स्मार्टफोन से पल भर में जो सुस्पष्ट फोटोग्राफ्स लेते हैं, सोशल मीडिया पर सेल्फी साझा करते हैं या हाई-डेफिनिशन वीडियो रिकॉर्ड करते हैं, उसके पीछे एक छोटी सी लेकिन अत्यंत तीव्र सिलिकॉन चिप काम कर रही है। इस चिप को सीमोस इमेज सेंसर (CMOS - Complementary Metal-Oxide-Semiconductor Image Sensor) के रूप में जाना जाता है। सरल भाषा में कहें तो, सीमोस सेंसर डिजिटल कैमरे की 'कृत्रिम आँख' है, जो लेंस से आने वाले प्रकाश के फोटोन (photon) कणों को पकड़कर उसे इलेक्ट्रॉनिक डिजिटल चित्र में बदलती है।
प्रत्येक इमेज सेंसर में लाखों या करोड़ों छोटे-छोटे कोशिकाएं होती हैं, जिन्हें हम पिक्सेल (pixel - चित्र की सबसे छोटी इकाई) कहते हैं। आधुनिक सीमोस सेंसर में प्रत्येक पिक्सेल स्वयं ही प्रकाश मापता है, उसे विद्युत प्रवाह में रूपांतरित करता है और उसी जगह सिग्नल को एम्पलीफाई (संकेत मजबूत) भी करता है। इस सिद्धांत को एक्टिव-पिक्सेल सेंसर (APS - Active-Pixel Sensor) कहा जाता है। इसी तकनीक के कारण आज के कैमरे आकार में बेहद छोटे, बिजली की कम खपत करने वाले और अद्भुत प्रकाशग्राह्य क्षमता वाले बने हैं।

सीसीडी से सीमोस तक: डिजिटल फोटोग्राफी का इतिहास
डिजिटल इमेजिंग की शुरुआत 1969 में बेल लेबोरेटरीज में विलार्ड बॉयल और जॉर्ज ई. स्मिथ द्वारा चार्ज-कपलड डिवाइस (CCD - Charge-Coupled Device) की खोज के साथ हुई थी। सीसीडी सेंसर ने लंबे समय तक कैमरे के क्षेत्र में राज किया। परंतु सीसीडी की एक बड़ी सीमा यह थी कि उसमें सभी पिक्सेल का विद्युत आवेश चिप के एक कोने से क्रमिक रूप से गुजारकर पढ़ना (readout) पड़ता था। इस चार्ज ट्रांसफर प्रक्रिया में जरा भी गलती नहीं चल सकती थी, इसलिए सीसीडी सेंसर में प्रचुर मात्रा में बिजली खर्च होती थी, चिप गर्म हो जाती थी और इसकी निर्माण प्रक्रिया बेहद जटिल थी।
1960 के दशक में पीटर नोबल और जी. वेकलर ने पैसिव-पिक्सेल सेंसर (PPS) की अवधारणा दी थी, लेकिन उसमें एम्पलीफिकेशन न होने के कारण इलेक्ट्रॉनिक नॉइज (धुंधलापन या शोर) बहुत अधिक आता था। 1967 में पीटर नोबल ने प्रत्येक पिक्सेल के अंदर ही ट्रांजिस्टर रखकर 'एक्टिव पिक्सेल' की कल्पना प्रस्तुत की। उसके बाद 1985 में ओलंपस (Olympus) कंपनी की त्सुतोमु नाकामुरा की टीम ने चार्ज मॉड्यूलेशन डिवाइस (CMD) आधारित पहला माइक्रोन-स्तर का मोस (MOS) एक्टिव-पिक्सेल सेंसर बनाया और 'एक्टिव पिक्सेल सेंसर' (APS) शब्द दिया।

परंतु असली क्रांति तब आई जब 1980 में एनईसी (NEC) के नोबुकाजु तेरानिशि और उनकी टीम ने 'पिंड फोटोडायोड' (PPD - Pinned Photodiode) की खोज की। इस इनोवेशन को 1984 में कोडाक कंपनी के बी.सी. बर्की द्वारा पिंड फोटोडायोड नाम दिया गया। PPD की वजह से इमेज में आने वाला लेग (खिंचाव), डार्क करंट (अंधेरे में आने वाला नॉइज) और इलेक्ट्रॉन लीकेज पूरी तरह से घट गए। 1992 में मित्सुबिशि इलेक्ट्रिक और 1993 में नासा (NASA) की जेट प्रोपल्शन लेबोरेटरी (JPL) में सीमोस एक्टिव-पिक्सेल सेंसर का सफल विकास हुआ, जिसने आज के आधुनिक कैमरे की नींव रखी।
सीमोस सेंसर की संरचना और कार्यपद्धति
आधुनिक सीमोस सेंसर का पिक्सेल मुख्य रूप से 4T (चार ट्रांजिस्टर) आर्किटेक्चर पर काम करता है। इसके अंदर पिंड फोटोडायोड (PPD), फ्लोटिंग डिफ़्यूजन नोड (FD - Floating Diffusion), और चार माइक्रोस्कोपिक ट्रांजिस्टर मौजूद होते हैं। आइए समझें कि यह सिस्टम प्रकाश की एक किरण को डिजिटल डेटा में कैसे रूपांतरित करता है।
सबसे पहले, जब कैमरे का शटर खुलता है, तब प्रकाश के फोटॉन पिंड फोटोडायोड पर पड़ते हैं। फोटो-इलेक्ट्रिक असर से फोटॉन सिलिकॉन के अणुओं से इलेक्ट्रॉन मुक्त करते हैं। ये इलेक्ट्रॉन फोटोडायोड में जमा होते हैं। इसके बाद ट्रांसफर गेट (TG) ऑन होता है और यह जमा हुआ चार्ज फ्लोटिंग डिफ़्यूजन (FD) नामक छोटे से कैपेसिटर में ट्रांसफर होता है। इस प्रक्रिया को बिना कोई डेटा गंवाए पूरा करने में PPD टेक्नोलॉजी मददगार साबित होती है।
- १. फोटॉन शोषण (PPD)लेंस से आने वाले प्रकाश के फोटॉन पिंड फोटोडायोड में इलेक्ट्रॉन मुक्त करते हैं.
- २. चार्ज ट्रांसफर (TG)ट्रांसफर गेट ऑन होते ही वीजभार फ्लोटिंग डिफ़्यूज़न (FD) नोड पर ट्रांसफर होता है.
- ३. वोल्टेज एम्पलीफिकेशन (SF)सोर्स फ़ॉलोअर ट्रांजिस्टर वीजभार को वोल्टेज में बदलकर सिग्नल को एम्पलीफाई करता है.
- ४. डिजिटल रूपांतरण (ADC)कॉलम ADC एनालॉग वोल्टेज सिग्नल को ० और १ के डिजिटल डेटा में रूपांतरित करता है.
इसके बाद, इस चार्ज को सोर्स फॉलोअर (SF) ट्रांजिस्टर द्वारा वोल्टेज सिग्नल में बदला जाता है और एम्पलीफाई किया जाता है। सिलेक्ट ट्रांजिस्टर (SEL) इस पिक्सेल को प्रोसेसिंग लाइन के साथ जोड़ता है, और रीसेट ट्रांजिस्टर (RST) काम पूरा होने के बाद FD नोड को खाली करके अगली फ्रेम के लिए तैयार करता है। इस तरह हर पिक्सेल अपना वोल्टेज सिग्नल चिप के किनारे पर लगे एनालॉग-टू-डिजिटल कन्वर्टर (ADC) को भेजता है, जहां वह 0 और 1 के डिजिटल कोड में बदल जाता है।
महत्वपूर्ण आंकड़े, माइलस्टोन और बाजार पर कब्जा
सीमोस सेंसर ने अपनी शुरुआत के दो दशकों में सीसीडी टेक्नोलॉजी को बाजार से लगभग अप्रासंगिक कर दिया। 2000 के दशक की शुरुआत में सीमोस का इस्तेमाल केवल सस्ते वेबकैम और सिक्योरिटी कैमरों में होता था क्योंकि सीसीडी में कलर और इमेज क्वालिटी बेहतर थी। लेकिन 2000 के दशक में 1999 में हुंडई इलेक्ट्रॉनिक्स द्वारा 0.5 um DRAM प्रोसेस में 800x600 कलर सीमोस सेंसर बनाया गया, जिसमें Integrated ADCs और 4T PPD थे।
सोनी (Sony) कंपनी ने 2007 में हर कॉलम के लिए अलग एनालॉग-टू-डिजिटल कन्वर्टर (Column ADC) सर्किट विकसित किया, जिससे रीडआउट स्पीड कई गुना बढ़ गई और नॉइज बहुत कम हो गया। इस सफलता की वजह से बाजार में सीमोस सेंसर की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी।
२००७ तक वैश्विक इमेज सेंसर मार्केट में सीमॉस (CMOS) की हिस्सेदारी ५४% हो गई और पहली बार यह सीसीडी (CCD) से आगे निकल गया। २०१२ तक यह हिस्सेदारी बढ़कर ७४% हो गई और २०१७ में सीमॉस ने संपूर्ण विश्व के इमेज सेंसर बिक्री के ८९% हिस्से पर अपना एकछत्र अधिकार जमा लिया। सोनी, ओमनीविज़न (OmniVision), सैमसंग और सिलिकॉन फाउंड्रीज़ ने इस क्षेत्र में अरबों डॉलर का निवेश किया।
| वर्ष | टेक्नोलॉजी / खोज | संस्था / संशोधक |
|---|---|---|
| १९६९ | सीसीडी (CCD) सेंसर की खोज | विलार्ड बॉयल और जॉर्ज स्मिथ (बेल लैब्स) |
| १९६७ | एक्टिव पिक्सेल कॉन्सेप्ट (APS) | पीटर नोबल |
| १९८० | पिंड फोटोडायोड (PPD) | तेरानिशी, शिराकी, इशिहारा (NEC) |
| १९८५ | प्रथम MOS एक्टिव-पिक्सेल सेंसर | त्सुतोमु नाकामुरा टीम (Olympus) |
| १९९३ | CMOS एक्टिव-पिक्सेल सेंसर | नासा JPL / मित्सुबिशी |
| २००९ | बैक-इल्यूमिनेटेड (BSI) CMOS | Sony Commercialization |
बैक-इल्यूमिनेशन और स्टैक्ड सेंसर: आधुनिक कैमरे की ताकत
पारंपरिक फ्रंट-इल्यूमिनेटेड (Front-Illuminated) सीमॉस सेंसर में सिलिकॉन के ऊपरी हिस्से में धातु के वायरिंग और ट्रांजिस्टर के स्तर आए हुए थे। इसके कारण लेंस से आने वाला लगभग ३०% से ४०% प्रकाश इन तारों से टकराकर व्यर्थ हो जाता था, जिसकी वजह से रात में या कम प्रकाश में फोटोग्राफी खराब आती थी।
२००९ में Sony ने व्यावसायिक तौर पर बैक-इल्यूमिनेटेड (BI या BSI - Back-Illuminated) सीमॉस सेंसर पेश किया। इस नई डिज़ाइन में सिलिकॉन वेफर को पतला करके उल्टे कर दिया गया, जिससे धातु का वायरिंग सेंसर के पीछे चला गया और फोटोडायोड सीधे प्रकाश के संपर्क में आ गया। BSI तकनीक से सेंसर की प्रकाश के प्रति संवेदनशीलता दोगुनी (2x) हो गई।
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इसके बाद २०१२ में सोनी ने 'स्टैक्ड सीमॉस सेंसर' (Stacked CMOS Sensor) लॉन्च किया। इसमें पिक्सेल एरे (सिलिकॉन का ऊपरी हिस्सा) और लॉजिक प्रोसेसिंग सर्किट (नीचे का हिस्सा) को दो अलग-अलग स्तरों में बनाकर एक-दूसरे पर चिपका दिया गया। इससे स्मार्टफोन के छोटे सेंसर में भी बहुत बड़ा पिक्सेल एरिया मिलने लगा और प्रोसेसिंग स्पीड में अभूतपूर्व वृद्धि हुई।
स्मार्टफोन, भारत और भविष्य की क्वांटा इमेजिंग
आज स्मार्टफोन में बड़े DSLRs जैसे सेंसर फिट करना संभव हुआ है। Canon EOS 5D Mark IV जैसे बड़े फुल-फ्रेम कैमरे के सेंसर और स्मार्टफोन के नन्हे-मुन्ने सेंसर के बीच आकार का बहुत बड़ा अंतर है, फिर भी सॉफ्टवेयर, BSI आर्किटेक्चर और कम्प्यूटेशनल फोटोग्राफी के चलते स्मार्टफोन कैमरे अकल्पनीय गुणवत्ता देते हैं। २०१४ में Phase One ने Sony सेंसर के साथ मीडियम-फॉर्मेट डिजिटल बैक लॉन्च करके प्रोफेशनल फोटोग्राफी से भी सीसीडी का अंत कर दिया था।
भारत जैसे देश में ज़मीनी स्तर पर सोशल मीडिया, डिजिटल कंटेंट क्रिएशन, आधार कार्ड बायोमेट्रिक्स और स्मार्ट सिटी सीसीटीवी फ्रेमवर्क सीमॉस सेंसरों के सस्ते उत्पादन और उच्च कार्यक्षमता पर ही निर्भर हैं। मेडिकल क्षेत्र में रक्तकोशिकाओं के लेंसलेस इमेजिंग से लेकर ऑटोनामस कारों के LiDAR और कैमरे विजन में सीमॉस सेंसर अनिवार्य हैं।
इमेजिंग साइंस में अब अगली क्रांति 'क्वांटा इमेजिंग सेंसर' (QIS - Quanta Image Sensor) के रूप में आ रही है। QIS का उद्देश्य प्रकाश के एक-एक सिंगल फोटॉन को गिनना (count) है। इसमें सेंसर पर 'जॉट्स' (jots) नामक सब-माइक्रोन आकार के अरबों फोटोइलिमेंट्स होंगे, जो एक सेकंड में सैकड़ों या हज़ारों बार बिट-प्लेन रीडआउट करेंगे और प्रति सेकंड टेराबिट्स (Terabits/sec) का डेटा जनरेट करेंगे। यह भविष्य की डिजिटल आँख अंधेरे शब्द को कैमरे के शब्दकोश से हमेशा के लिए मिटा देगी।



