प्रकाश द्वारा पत्थर पर नक्काशी: सिलिकॉन चिप और फोटोलिथोग्राफी का विज्ञान
रेत से बनने वाले सिलिकॉन वेफर पर अरबों ट्रांजिस्टर कैसे उकेरे जाते हैं? पराबैंगनी किरणों, रासायनिक प्रतिक्रिया और अति-सूक्ष्म नैनोमीटर स्तर के फैब्रिकेशन की पूरी कहानी।
आधुनिक मानव सभ्यता आज सिलिकॉन चिप्स की अदृश्य नींव पर टिकी हुई है। स्मार्टफोन, कंप्यूटर, कार या सुपरकंप्यूटर में धड़कने वाले माइक्रोप्रोसेसर दरअसल अरबों बेहद सूक्ष्म स्विचों यानी ट्रांजिस्टर (transistor) से बने होते हैं। मानव बाल की मोटाई से भी हजारों गुना पतली इन संरचनाओं को किसी यांत्रिक उपकरण या सुई से नहीं बनाया जा सकता है। इसके निर्माण के लिए जिस अद्भुत तकनीक का उपयोग किया जाता है, उसे सेमीकंडक्टर डिवाइस फैब्रिकेशन (semiconductor device fabrication) और विशेष रूप से फोटोलिथोग्राफी (photolithography) कहा जाता है। यह वह प्रक्रिया है जिसमें प्रकाश की किरणों का उपयोग करके अतिटिल इलेक्ट्रॉनिक सर्किट को सिलिकॉन की सतह पर छापा जाता है।
ग्रीक भाषा में 'फोटो' (photo) का अर्थ प्रकाश, 'लिथू' (litho) का अर्थ पत्थर और 'ग्राफी' (graphy) का अर्थ लेखन या चित्रण होता है। यह शब्द प्राचीन काल में चूने के पत्थर पर स्याही से होने वाली पारंपरिक लिथोग्राफिक प्रिंटिंग पद्धति से आया है। परंतु आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स में इस 'पत्थर' का अर्थ अतिशुद्ध सिलिकॉन क्रिस्टल की पतली तख्ती है, जिसे वेफर (wafer) कहते हैं। फोटोलिथोग्राफी की मदद से इस वेफर पर नेनोमीटर (nanometer: मीटर का एक अरबवां भाग) आकार की डिजाइन तैयार की जाती है। यह पूरी उत्पादन प्रक्रिया अत्यंत विशिष्ट सुविधाओं में होती है, जिन्हें फैब्स (fabs) या फाउंड्री (foundry) के रूप में जाना जाता है।
क्लीनरूम और उत्पादन का वातावरण
सेमीकंडक्टर चिप बनाने वाली फैक्ट्री सामान्य औद्योगिक इकाइयों जैसी नहीं होती है। इसका मुख्य हिस्सा क्लीनरूम (cleanroom) कहलाता है। हवा में तैरता सामान्य धूल का एक भी कण यदि वेफर पर बैठ जाए, तो वह पूरी चिप के सर्किट को नष्ट कर सकता है। इसलिए क्लीनरूम की हवा को लगातार अति-सूक्ष्म फिल्टरों द्वारा शुद्ध किया जाता है। वहां काम करने वाले वैज्ञानिक और इंजीनियर सिर से पैर तक विशेष आवरण वाला सूट पहनते हैं।

फैब्रिकेशन प्लांट के अंदर सिलिकॉन वेफर को खुली हवा में नहीं ले जाया जाता है। उन्हें विशेष सीलबंद प्लास्टिक के बॉक्स में ले जाया जाता है, जिन्हें फाउप (FOUP - Front Opening Unified Pod) कहते हैं। तांबे की वायरिंग का ऑक्सीडेशन (oxidation) न हो, इसलिए इस बॉक्स के अंदर नाइट्रोजन गैस का निष्क्रिय वातावरण बनाए रखा जाता है। इस विशिष्ट बॉक्स को प्रोसेसिंग मशीन में डालने के लिए इक्विपमेंट फ्रंट एंड मॉड्यूल (EFEM) नामक प्रणाली का उपयोग किया जाता है, जो बाहरी क्लीनरूम की तुलना में भी अधिक शुद्ध वातावरण वेफर को प्रदान करती है। अत्याधुनिक 7, 10 या 14 नेनोमीटर नोड्स वाली चिप्स के उत्पादन में औसतन 11 से 13 सप्ताह लगते हैं, और कुछ जटिल चरणों में यह अवधि 15 सप्ताह तक पहुंच सकती है।
फोटोलिथोग्राफी की कार्यपद्धति: प्रकाश द्वारा सर्किट का आलेखन
फोटोलिथोग्राफी की मूल प्रक्रिया फोटोग्राफी से काफी मिलती-जुलती है। जैसे पुराने जमाने के कैमरे में नेगेटिव फिल्म पर प्रकाश डालकर फोटो डेवलप किया जाता था, वैसे ही यहाँ सिलिकॉन वेफर पर सर्किट की डिजाइन उकेरी जाती है। पूरी प्रक्रिया निश्चित क्रमबद्ध चरणों में विभाजित होती है।
सबसे पहले वेफर की रासायनिक सफाई की जाती है। सतह से कार्बनिक या अकार्बनिक अशुद्धियों को दूर करने के लिए हाइड्रोजन पेरोक्साइड युक्त घोल से ‘RCA क्लीन’ पद्धति या एसीटोन, मेथेनॉल या ट्राइक्लोरोएथिलीन का उपयोग किया जाता है। इसके बाद सतह की नमी को दूर करने के लिए वेफर को 150 °C तापमान पर दस मिनट तक गर्म किया जाता है। वेफर पर मौजूद सिलिकॉन डाइऑक्साइड (silicon dioxide) तरल को आकर्षित करता है, इसलिए उस पर फोटोरेसिस्ट मजबूती से चिपके इसके लिए हेक्सामिथाइलडिसिलाजेन (HMDS) नामक रसायन लगाया जाता है। यह रसायन सतह को कार के वैक्स की तरह अत्यधिक जल-प्रतिरोधी (water repellent) बनाता है।
इसके बाद स्पिन कोटिंग (spin coating) द्वारा तरल फोटोरेसिस्ट (photoresist: प्रकाश के प्रति संवेदनशील रासायनिक परत) बिछाई जाती है। वेफर को अत्यधिक गति से गोल घुमाया जाता है, जिससे अपकेंद्रीय बल के कारण अतिरिक्त रसायन बाहर फेंका जाता है और सतह पर बेहद पतली, एकसमान परत बन जाती है। 125 नैनोमीटर से छोटी डिजाइन के लिए फोटोरेसिस्ट की परत 0.5 माइक्रोन से भी कम रखी जाती है। स्पिनिंग के बाद वेफर को 90 से 100 °C तापमान पर 30 से 60 सेकंड के लिए प्रीबेक (prebake) किया जाता है ताकि विलायक (solvent) उड़ जाए।
अब मुख्य चरण आता है: एक्सपोजर (exposure)। स्टेपर या स्कैनर नामक अत्यधिक सटीक मशीन में फोटोमास्क (photomask: सर्किट की मूल डिजाइन वाली कांच या क्वार्ट्ज की प्लेट) रखा जाता है। मास्क से तीव्र प्रकाश वेफर पर डाला जाता है। प्रकाश पड़ने से फोटोरेसिस्ट में रासायनिक परिवर्तन होता है। पॉजिटिव रेसिस्ट में प्रकाशित हुआ हिस्सा ‘डेवलपर’ नामक तरल में घुलनशील बन जाता है और धुल जाता है; जबकि नेगेटिव रेसिस्ट में अप्रकाशित हिस्सा घुल जाता है। डीप अल्ट्रावाइलेट (DUV) प्रक्रिया में केमिकली एम्पलीफाइड रेसिस्ट (CAR) का उपयोग किया जाता है, जिसमें फोटॉन टकराने पर एसिड पैदा होता है जो प्रक्रिया को तेज करता है।
- सफाई और तैयारीवेफर की रासायनिक सफाई कर उस पर HMDS रसायन लगाया जाता है।
- स्पिन कोटिंगवेफर पर तरल फोटोरेसिस्ट की पतली परत बिछाई जाती है।
- एक्सपोज़रफोटोमास्क द्वारा तीव्र प्रकाश फेंककर सर्किट की डिज़ाइन छापी जाती है।
- डेवलपमेंटविलायक (सॉल्वेंट) से असुरक्षित भाग धोकर डिज़ाइन खोली जाती है।
डेवलपमेंट के बाद जो डिजाइन खुली होती है, उस पर एचिंग (etching: अतिरिक्त द्रव्य को एसिड या प्लाज्मा द्वारा खोदकर दूर करना), आयन इम्प्लांटेशन (ion implantation: अशुद्धियों को जोड़कर विद्युत चालन बदलना) या डिपोजिशन (नए धातु या अछूते स्तर जमा करना) जैसी प्रक्रियाएँ की जाती हैं। एक जटिल इंटीग्रेटेड सर्किट बनाने के लिए एक ही वेफर को ऐसी फोटोलिथोग्राफी साइकिल से 50 के करीब बार गुजरना पड़ता है।

ऐतिहासिक सफर: नेचुरल डामर से सुपरचिप तक
प्रकाश-संवेदनशील सामग्री का उपयोग १८२० के दशक में नाइसफोर नीप्से (Nicephore Niepce) ने शुरू किया था। उन्होंने ‘बिटुमेन ऑफ जुडिया’ नामक प्राकृतिक डामर का उपयोग दुनिया के पहले फोटोरेसिस्ट के रूप में किया था। १९४० में ऑस्कर सुसे (Oskar Süß) ने डायजोनेप्थोक्विनोन का उपयोग करके सबसे पहला पॉजिटिव फोटोरेसिस्ट बनाया। १९५४ में लुईस प्लेम्बेक ने डायक्रिल पॉलिशर प्लेट बनाई।
सेमीकंडक्टर के क्षेत्र में लिथोग्राफी की नींव १९५० के दशक में रखी गई थी। १९५२ में यू.एस. सेना द्वारा जे. डब्ल्यू. लाथ्रोप और जेम्स आर. नाल को प्रॉक्सिमिटी फ्यूज (proximity fuze) के लिए इलेक्ट्रॉनिक सर्किट को छोटा बनाने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। विमान के पंखों में रिवेट के छेदों की सीमा तय करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले तरल से प्रेरणा लेकर उन्होंने जर्मेनियम ट्रांजिस्टर को सुरक्षित रखने और प्रकाश की मदद से पैटर्न बनाने की यह पद्धति विकसित की। १९५८ में वाशिंगटन डी.सी. में आयोजित एक कॉन्फ्रेंस में उन्होंने पहली बार ‘फोटोलिथोग्राफी’ शब्द का उपयोग किया था। उन्होंने ‘फोटोएंचिंग’ के बजाय इस शब्द को इसलिए चुना क्योंकि यह अधिक हाई-टेक लगता था। उनका यह पेटेंट ९ जून १९५९ को मंजूर हुआ था।
लगभग इसी कालखंड में, १९५५ में बेल लैब्स में कार्ल फ्रोश और लिंकन डेरीक ने अनजाने में सिलिकॉन पर सिलिकॉन डाइऑक्साइड की परत विकसित की और इसके सतह निष्क्रियिकरण (passivation) प्रभावों को दर्ज किया। १९५७ में उन्होंने मास्किंग पद्धति से दुनिया के पहले प्लानर फील्ड इफेक्ट ट्रांजिस्टर (FET) बनाए, जिसमें ड्रेन और सोर्स एक ही सतह पर सटे हुए थे। १९५७ में ही बेल लैब्स के जूल्स एंड्रयूज ने भी सेमीकंडक्टर फोटोलिथोग्राफी का पेटेंट हासिल किया था। १९६३ में सीएमओएस (CMOS) तकनीक की खोज हुई, जिसे आरसीए (RCA) कंपनी ने १९६८ में व्यावसायिक आधार पर २० माइक्रोन से शुरू करते हुए १० माइक्रोन तक विकसित किया।
साइज का विस्तार: १ इंच से ३०० मिलीमीटर वेफर
जैसे-जैसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की मांग बढ़ती गई, वैसे-वैसे अधिक चिप्स एक साथ बनाने के लिए सिलिकॉन वेफर का व्यास बड़ा किया गया। वेफर का आकार बड़ा होने से एक ही बार में अधिक संख्या में डाइ (die: वेफर से काटकर अलग की जाने वाली सिंगल चिप) प्राप्त किए जा सकते हैं, जिससे उत्पादन लागत घट जाती है।
१९६० के दशक में वेफर का आकार केवल २५ मिमी (१ इंच) था। उस समय इंजीनियर चिमटे (tweezers) से वेफर को पकड़ते थे। १९७० के दशक में वैक्यूम वैंड्स और वेफर कैसेट्स आए। १५० मिमी के आगमन के साथ मैनुअल हैंडलिंग खतरनाक हो गई और रोबोटिक्स अनिवार्य बन गया। २००० से ३०० मिमी के वेफर वैश्विक मानक बन चुके हैं। अब पुराने और सरल चिप्स (जैसे एनालॉग या पावर आईसी) २०० मिमी पर बनाए जाते हैं, जबकि अत्याधुनिक प्रोसेसर केवल ३०० मिमी पर ही बनते हैं।
મિમી
प्रोसेस नोड्स और आधुनिक भू-राजनीति
सेमीकंडक्टर उद्योग में ‘प्रोसेस साइज़’ या ‘फीचर साइज़’ (feature size) का अर्थ चिप पर उकेरी जा सकने वाली न्यूनतम रेखा की चौड़ाई (linewidth) होता है। ऐतिहासिक रूप से 90 नैनोमीटर या 350 नैनोमीटर जैसे नाम ट्रांजिस्टर के गेट की लंबाई दर्शाते थे। परंतु 1994 के बाद यह मापदंड अधिक मार्केटिंग शब्द बन गया है। उदाहरण के लिए, इंटेल की 10 नैनोमीटर प्रोसेस में फिनफेट (FinFET) के छोर की चौड़ाई वास्तव में 7 नैनोमीटर होती है, जो टीएसएमसी (TSMC) की 7 नैनोमीटर प्रोसेस जितनी ही ट्रांजिस्टर घनत्व रखती है।
आज नैनोमीटर स्तर की चिप्स बनाने के लिए अति-छوٹی तरंगदैर्ध्य वाले प्रकाश की आवश्यकता पड़ती है। एक्सट्रीम अल्ट्रावायलेट लिथोग्राफी (EUVL) मशीनें बनाने में नीदरलैंड्स की ASML कंपनी दुनिया में मोनोपॉली रखती है। ये मशीनें इतनी संवेदनशील और रणनीतिक हैं कि 2019 में ट्रम्प प्रशासन ने दबाव डालकर ASML द्वारा चीन को EUV मशीनों की बिक्री पर प्रतिबंध लगवा दिया था। इस तकनीकी स्पर्धा के बीच 2026 में चीन की स्थानीय कंपनी ने डीप अल्ट्रावायलेट (DUV) इमर्सन लिथोग्राफी टूल्स ग्राहकों को भेजना शुरू कर दिया है। विश्लेषक ग्रेगरी सी. एलन के अनुसार चीन 2026 में 5 और 2027 में 20 इमर्सन मशीनें बनाने की अपेक्षा रखता है, जो ASML द्वारा 2003-2005 के दौरान व्यावसायिक मूल्यांकन के लिए रखी गई 13 मशीनों की गति के साथ संगत है।
| वर्ष | बनाने की अपेक्षा रखने वाली मशीनों की संख्या |
|---|---|
| 2026 | 5 |
| 2027 | 20 |
भारत जैसे देशों के लिए सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन क्षेत्र में कदम रखना केवल आर्थिक मामला नहीं है बल्कि भू-राजनीतिक स्वायत्तता का प्रश्न है। स्मार्टफोन से लेकर रक्षा प्रणालियों तक की हर चीज़ इन सिलिकॉन तख्तियों पर आधारित है। रेत से शुद्ध सिलिकॉन प्राप्त कर, उस पर अल्ट्रावायलेट प्रकाश की तरंगों द्वारा अदृश्य पैमानों में अरबों ट्रांजिस्टर छापने की यह वैज्ञानिक कला मानव इतिहास की सबसे जटिल और प्रभावशाली उपलब्धियों में से एक है।


