ग्रीन हाइड्रोजन: शून्य उत्सर्जन की ओर भारत और विश्व की महत्वाकांक्षी वैज्ञानिक यात्रा
पानी और नवीकरणीय ऊर्जा के मिश्रण से बनने वाला यह स्वच्छ ईंधन भविष्य में उद्योगों और परिवहन को प्रदूषण मुक्त बनाने की क्षमता रखता है।

विश्वभर में पारंपरिक जीवाश्म ईंधन (fossil fuel) पर निर्भरता घटाने और कार्बन उत्सर्जन को शून्य स्तर पर लाने के लिए हरित ऊर्जा पर अभूतपूर्व जोर दिया जा रहा है। इस दिशा में ग्रीन हाइड्रोजन (green hydrogen) भविष्य के सबसे सुरक्षित और स्वच्छ विकल्प के रूप में उभरा है। भारत भी इस क्षेत्र में वैश्विक अग्रणीय बनने के लक्ष्य के साथ तेजी से आगे बढ़ रहा है। हाल ही में अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इसके तकनीकी विकास और औद्योगिक उपयोग के लिए बड़ी रणनीतियाँ तैयार की जा रही हैं।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो हाइड्रोजन पूरे ब्रह्मांड का सबसे हल्का और प्रचुर मात्रा में मिलने वाला मूल तत्व है। हालांकि, पृथ्वी पर यह स्वतंत्र अवस्था में नहीं मिलता है, बल्कि पानी और प्राकृतिक गैस जैसे यौगिकों के रूप में मौजूद है। इसे उपयोग में लाने के लिए पानी या गैस से अलग करना पड़ता है। खास बात यह है कि हाइड्रोजन का अपना कोई रंग नहीं होता है, लेकिन इसे अलग करने की पद्धति और ऊर्जा के स्रोत के आधार पर इसे अलग-अलग रंगीन नाम दिए गए हैं।
ग्रीन हाइड्रोजन मुख्य रूप से इलेक्ट्रोलिसिस (electrolysis) प्रक्रिया द्वारा उत्पन्न होता है, जिसमें पुन प्राप्य स्रोतों से मिलने वाली बिजली का उपयोग करके पानी के अणुओं को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित किया जाता है। सोर्स २ के अनुसार, यह प्रक्रिया अधिकतम ८०% कार्यक्षम होती है। एक किलोग्राम हाइड्रोजन उत्पन्न करने के लिए लगभग ९ लीटर पानी की जरूरत पड़ती है। इस प्रक्रिया में जब सूर्यप्रकाश या पवन ऊर्जा जैसी स्वच्छ बिजली इस्तेमाल की जाती है, तब इसे 'ग्रीन' कहा जाता है क्योंकि इससे कार्बन उत्सर्जन शून्य रहता है।
- अक्षय बिजलीसूर्य या पवन ऊर्जा से स्वच्छ बिजली उत्पन्न की जाती है।
- इलेक्ट्रोलिसिसबिजली का उपयोग करके पानी के अणुओं को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजित किया जाता है।
- हाइड्रोजन संग्रहशुद्ध हाइड्रोजन गैस को अलग करके भविष्य के उपयोग के लिए संग्रहित किया जाता है।
- अक्षय ऊर्जासौर पैनलों या पवन चक्कियों द्वारा कार्बन-मुक्त बिजली उत्पन्न की जाती है।
- इलेक्ट्रोलिसिसइस बिजली को इलेक्ट्रोलाइज़र मशीन में भेजा जाता है जहाँ यह पानी (H2O) से गुजरती है।
- अणु विभाजनबिजली के प्रवाह से पानी के अणु टूटकर हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में अलग होते हैं।
- संग्रह और उपयोगमुक्त हुए हाइड्रोजन गैस को एकत्रित कर टैंकों में संग्रहित किया जाता है या सीधे उद्योगों में उपयोग किया जाता है।
इलेक्ट्रोलिसिस का इतिहास और विज्ञान
इलेक्ट्रोलिसिस एक ऐसी तकनीक है जो स्वाभाविक रूप से न होने वाली रासायनिक प्रक्रिया को चलाने के लिए डायरेक्ट इलेक्ट्रिक करंट (DC) का उपयोग करती है। सोर्स ३ के अनुसार, 'इलेक्ट्रोलिसिस' शब्द १८३४ में माइकल फैराडे द्वारा प्रस्तुत किया गया था। ग्रीक शब्द 'इलेक्ट्रॉन' यानी कि एंबर और 'लिसिस' यानी कि अलग करना, उस पर से यह नाम पड़ा है। हालांकि, इस प्रक्रिया की खोज फैराडे से पहले ही हो चुकी थी।
१७८५ में डच वैज्ञानिक मार्टिन वैन मेरुम ने इलेक्ट्रोस्टेटिक जनरेटर का उपयोग करके धातुओं को उनके लवण से अलग किया था। उसके बाद १८०० में विलियम निकोलसन और एंथनी कार्लेस्ल ने पानी का हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विभाजन करने की पहली सफल प्रक्रिया दर्शाई थी। १८०७ और १८०८ में हम्फ्री डेवी ने इसी पद्धति से पोटैशियम, सोडियम, बेरियम, कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे तत्वों की खोज की थी। यह इतिहास दर्शाता है कि जो तकनीक आज हम ग्रीन हाइड्रोजन के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं उसकी नींव सदियों पहले पड़ गई थी।
इलेक्ट्रोलिसिस की प्रक्रिया में मुख्य तीन घटक होते हैं: इलेक्ट्रोलाइट (electrolyte), इलेक्ट्रोड्स (electrodes) और बाहरी पावर स्रोत। इलेक्ट्रोलाइट वह पदार्थ है जो मुक्त आयनों को रखता है और बिजली का वहन कर सकता है। जब बिजली प्रवाहित की जाती है, तब धन भारित आयन (cations) ऋण ध्रुव यानी कैथोड (cathode) की ओर जाते हैं और ऋण भारित आयन (anions) धन ध्रुव यानी एनोड (anode) की ओर आकर्षित होते हैं। इस प्रक्रिया द्वारा पानी के अणु टूटकर गैस के रूप में हाइड्रोजन मुक्त करते हैं।
| तकनीक का प्रकार | तापमान रेंज | मुख्य विशेषता |
|---|---|---|
| अल्कलाइन (AE) | 70-90 °C | परिपक्व और कम कीमत की पद्धति |
| प्रोटॉन एक्सचेंज (PEM) | 50-80 °C | तेज़ प्रतिक्रिया, सौर ऊर्जा के लिए श्रेष्ठ |
| सॉलिड ऑक्साइड (SOEC) | 500-1000 °C | बहुत ही उच्च दक्षता |

हाइड्रोजन के विभिन्न प्रकार और अंतर
हाइड्रोजन के उत्पादन के लिए इस्तेमाल होने वाली पद्धति के आधार पर इसे ग्रे, ब्लू, ब्लैक और ग्रीन जैसे नाम दिए गए हैं। सोर्स १ के अनुसार, ग्रे हाइड्रोजन (grey hydrogen) प्राकृतिक गैस यानी मीथेन को भाप के साथ बहुत ऊंचे तापमान पर गर्म करके बनाया जाता है। इस प्रक्रिया को स्टीम-मीथेन रिफॉर्मिंग कहा जाता है। फिलहाल दुनिया में अधिकांश हाइड्रोजन इसी तरह बनती है, लेकिन इसमें प्रति किलो हाइड्रोजन पीछे ९ से ११ किलो कार्बन डाइऑक्साइड हवा में मुक्त होती है।
दूसरी ओर, कोयले के इस्तेमाल से बनने वाली हाइड्रोजन को ब्लैक या ब्राउन हाइड्रोजन कहा जाता है, जो पर्यावरण के लिए सबसे अधिक नुकसानदेह है। जब प्राकृतिक गैस से हाइड्रोजन बनाते समय निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड को पकड़कर जमीन के नीचे संग्रहीत किया जाता है (carbon capture), तब इसे ब्लू हाइड्रोजन (blue hydrogen) कहा जाता है। इस पद्धति से उत्सर्जन घटता है पर पूरी तरह बंद नहीं होता। केवल ग्रीन हाइड्रोजन ही ऐसा विकल्प है जिसमें उत्पादन के दौरान कोई प्रदूषण नहीं होता।
ग्रीन हाइड्रोजन की खूबी यह है कि जब इसे ईंधन के रूप में जलाया जाता है, तब इससे केवल पानी की भाप ही निकलती है। सोर्स २ बताता है कि हाइड्रोजन का ऊर्जा घनत्व (energy density) ३९.६ kWh/kg है, जो लिथियम बैटरी के ०.१५-०.२५ kWh/kg की तुलना में काफी ज्यादा है। इसी वजह से भारी उद्योगों और लंबी दूरी के परिवहन के लिए यह बैटरी से बेहतर विकल्प माना जाता है।
इलेक्ट्रोलाइज़र टेक्नोलॉजी के प्रकार
ग्रीन हाइड्रोजन बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाली मशीन को इलेक्ट्रोलाइज़र (electrolyzer) कहा जाता है। सोर्स २ के अनुसार, फिलहाल चार मुख्य प्रकार की इलेक्ट्रोलाइज़र टेक्नोलॉजी अस्तित्व में हैं। पहली है अल्लाइन इलेक्ट्रोलाइज़र (Alkaline Electrolyzers - AE), जो सबसे पुरानी और सस्ती टेक्नोलॉजी है। यह ७० से ९० डिग्री सेल्सियस तापमान पर काम करती है और बड़े पैमाने पर उत्पादन के लिए अनुकूल है, लेकिन यह पवन या सौर ऊर्जा जैसे अस्थिर स्रोतों के साथ तेजी से तालमेल नहीं बिठा सकती।
दूसरा प्रकार प्रोटॉन एक्सचेंज मेम्ब्रेन (Proton Exchange Membrane - PEM) है। यह सिस्टम ५० से ८० डिग्री सेल्सियस पर काम करता है और बहुत तेजी से चालू-बंद हो सकता है, जो इसे सौर और पवन ऊर्जा के लिए आदर्श बनाता है। हालांकि, इसमें प्लेटिनम और इरीडियम जैसी कीमती धातुओं का उपयोग होने के कारण इसकी लागत अधिक होती है। तीसरा प्रकार सॉलिड ऑक्साइड इलेक्ट्रोलाइज़र (Solid Oxide Electrolyzers - SOEC) है, जो ५०० से १००० डिग्री सेल्सियस के उच्च तापमान पर काम करता है और बहुत ही कुशल है।
चौथा और उभरता हुआ प्रकार एनियन एक्सचेंज मेम्ब्रेन (Anion Exchange Membrane - AEM) है। यह तकनीक अल्लाइन की किफायतीता और PEM की लचीलापन को जोड़ने का प्रयास करती है। इसके अलावा वैज्ञानिक जैविक हाइड्रोजन उत्पादन और थर्मोकेमिकल वाटर स्प्लिटिंग जैसी पद्धतियों पर भी शोध कर रहे हैं। सोर्स २ के अनुसार, २०२४ के एक अध्ययन में पाया गया है कि गाय के गोबर से बने बायोचार् (biochar) का उपयोग करके इलेक्ट्रोलिसिस की प्रक्रिया को ६ गुना अधिक कुशल बनाया जा सकता है।
| तकनीक | संचालन का तापमान | मुख्य विशेषता |
|---|---|---|
| अल्कलाइन (AE) | 70-90 °C | सबसे पुरानी और बड़े पैमाने पर सस्ती तकनीक |
| PEM | 50-80 °C | तेज़ी से चालू-बंद हो सकती है, पवन-सौर ऊर्जा के लिए उत्तम |
| SOEC | 500-1000 °C | ऊंचे तापमान पर काम करने वाली अत्यंत कुशल प्रणाली |
| AEM | विकास के अधीन | अल्कलाइन और PEM के गुणों का मिश्रण |

भारत में हाइड्रोजन क्रांति और प्रोजेक्ट्स
भारत सरकार ने ग्रीन हाइड्रोजन के क्षेत्र में बड़ी छलांग लगाई है। सोर्स १ के अनुसार, १७ जुलाई २०२६ को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की पहली स्वदेशी हाइड्रोजन संचालित ट्रेन 'नमो ग्रीन रेल' (Namo Green Rail) का उद्घाटन किया था। इसके अलावा, देश में ३७ हाइड्रोजन संचालित बसों और ट्रकों को पायलट प्रोजेक्ट के तहत १० अलग-अलग भौगोलिक मार्गों पर चलाया जा रहा है। ये वाहन १५ फ्यूल सेल (fuel cell) तकनीक पर और २२ हाइड्रोजन कम्बशन इंजन पर आधारित हैं।
भारी उद्योगों में भी ग्रीन हाइड्रोजन का उपयोग शुरू हो चुका है। टाटा स्टील और JSW जैसी कंपनियां हाइड्रोजन आधारित डायरेक्ट रिड्यूस्ड आयरन (H-DRI) प्लांट पर काम कर रही हैं। ओडिशा के अंगुल में जिंदल रिन्यूएबल्स का ग्रीन स्टील प्रोजेक्ट कार्यरत है। फरवरी २०२६ तक देश में १९ उत्पादन प्रोजेक्ट्स सक्रिय हो चुके थे, जिनकी कुल वार्षिक क्षमता ४,३०० टन से अधिक है। इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) पानीपत रिफाइनरी में १०,००० टन क्षमता का देश का सबसे बड़ा प्लांट स्थापित कर रहा है, जो दिसंबर २०२७ तक पूरा हो जाएगा।
कृषि क्षेत्र में भी ग्रीन हाइड्रोजन का प्रभाव दिखाई दे रहा है। सोलर एनर्जी कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (SECI) ने मार्च २०२६ में १३ फर्टिलाइज़र प्लांट्स को ७.२४ लाख टन ग्रीन अमोनिया की आपूर्ति के लिए अनुबंध किए हैं। इसके अलावा, वी.ओ. चिदंबरनार पोर्ट अथॉरिटी द्वारा जहाजों के लिए ग्रीन मेथेनॉल रिफ्यूलिंग की सुविधा विकसित की जा रही है। ये सभी प्रयास दर्शाते हैं कि भारत केवल हाइड्रोजन का उपयोग ही नहीं, बल्कि उसके उत्पादन में भी आत्मनिर्भर बनना चाहता है।

आर्थिक चुनौतियां और वैश्विक बाजार
ग्रीन हाइड्रोजन के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा इसकी उत्पादन लागत है। सोर्स २ के अनुसार, २०२४ में ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन जीवाश्म ईंधन से बनने वाले हाइड्रोजन से १.५ से ६ गुना महंगा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जब इसकी कीमत $२ प्रति किलोग्राम तक पहुँचेगी, तब यह बाज़ार में प्रतिस्पर्धी बनेगा। २०२२ में वैश्विक हाइड्रोजन बाज़ार $१५५ अरब का था, जिसमें ग्रीन हाइड्रोजन की हिस्सेदारी मात्र २.७% यानी $४.२ अरब थी।
$ અબજ
हालांकि, २००९ से २०२४ के दौरान सौर और पवन ऊर्जा के भावों में जिस तरह की गिरावट आई है, उसे देखते हुए भविष्य में ग्रीन हाइड्रोजन के भी सस्ते होने की आशा है। २०१० से २०२२ के बीच इलेक्ट्रोलाइज़र की कीमत में ६०% की गिरावट दर्ज की गई थी। अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुमान के मुताबिक २०३० तक दुनिया में ३७ मिलियन टन ग्रीन हाइड्रोजन का उत्पादन हो सकता है। ऑस्ट्रेलिया और ब्राज़ील जैसे देश भी इस क्षेत्र में बड़े निवेश कर रहे हैं, हालाँकि कई बड़े प्रोजेक्ट्स अभी भी आर्थिक कारणों से विलंब में हैं।
ग्रीन हाइड्रोजन सिर्फ एक ईंधन नहीं है, बल्कि वह ऊर्जा संग्रहण (energy storage) के लिए एक मज़बूत विकल्प है। जब पवन या सूर्य ऊर्जा अधिक मात्रा में हो, तब उसे हाइड्रोजन में रूपांतरित करके लंबे समय तक संग्रहित किया जा सकता है। यह तकनीक अभी विकास के चरण में है और कई चुनौतियाँ हैं, लेकिन पर्यावरण को बचाने के लिए वह अनिवार्य है। भारत जैसी बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था के लिए ग्रीन हाइड्रोजन ऊर्जा सुरक्षा और स्वच्छ पर्यावरण दोनों हासिल करने की चाबी है।



