अंतरिक्ष में रूसी सैन्य उपग्रहों की खतरनाक चालें: व्यावसायिक उपग्रहों पर मंडराता नया खतरा
आशंका है कि रूस के सैन्य उपग्रह पश्चिमी देशों के व्यावसायिक उपग्रहों के अत्यंत करीब जाकर हमले का अभ्यास कर रहे हैं, जो अंतरिक्ष सुरक्षा के लिए गंभीर प्रश्न खड़े करते हैं।

अंतरिक्ष अब केवल अनुसंधान का केंद्र नहीं रहा, बल्कि ऐसा प्रतीत हो रहा है कि यह युद्ध का नया मैदान बनता जा रहा है। हाल ही में अक्टूबर 2026 के मध्य में घटी एक घटना ने वैश्विक सुरक्षा विशेषज्ञों की नींद उड़ा दी है। यह बात सामने आई है कि रूस के एक सैन्य उपग्रह, कॉसमॉस 2612 (Cosmos 2612) ने पश्चिमी देशों के एक व्यावसायिक उपग्रह के अत्यंत निकट जाकर खतरनाक पैंतरेबाज़ी की है। सैन्य विशेषज्ञों द्वारा यह आशंका व्यक्त की जा रही है कि यह घटना केवल एक दुर्घटना नहीं थी, बल्कि यह अंतरिक्ष में हमला करने की पूर्व तैयारी या रिहर्सल हो सकती है।
जापान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका के अंडर सेक्रेटरी ऑफ़ स्टेट थॉमस डिनान्नो ने सोशल मीडिया पर इस विषय पर गंभीर चिंता व्यक्त की थी। उन्होंने बताया था कि रूस का यह उपग्रह जानबूझकर व्यावसायिक उपग्रह के अत्यंत निकट जा रहा था, जो 'ऑन-ऑर्बिट वेपन्स ऑपरेशंस' (on-orbit weapons operations) अर्थात कक्षा में रहकर हथियारों के संचालन जैसी गतिविधि है। जिस उपग्रह को निशाना बनाया गया था, उसका नाम X36 (X36) है, जिसे फ़िनलैंड की कंपनी ICEYE (ICEYE) द्वारा संचालित किया जाता है। यह कंपनी पश्चिमी सरकारों और विशेष रूप से यूक्रेन को रडार इमेजरी (radar imagery) यानी रडार द्वारा प्राप्त तस्वीरें उपलब्ध कराती है।
પરીક્ષણોની સંખ્યા
इस प्रकार की गतिविधि को तकनीकी भाषा में 'क्लोज़-प्रॉक्सिमिटी मैन्युवर्स' (close-proximity maneuvers) कहा जाता है। इसका अर्थ यह होता है कि एक उपग्रह दूसरे उपग्रह के इतना निकट जाता है कि वह उसे क्षति पहुँचा सके या उसकी जासूसी कर सके। ICEYE के उपग्रह लो अर्थ ऑर्बिट (low Earth orbit) यानी पृथ्वी की निचली कक्षा में कार्यरत हैं, जहाँ सामान्यतः सैकड़ों व्यावसायिक उपग्रह परिक्रमा करते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, रूसी सैन्य यान द्वारा व्यावसायिक उपग्रह के इतनी निकट जाने की यह अब तक की सबसे निकटवर्ती घटनाओं में से एक है।
अंतरिक्ष युद्ध (space warfare) कोई नई कल्पना नहीं है, परंतु इसके स्वरूप बदल रहे हैं। विकिपीडिया के आँकड़ों के अनुसार, 1967 की आउटर स्पेस ट्रीटी (Outer Space Treaty) अंतरिक्ष में परमाणु हथियार रखने पर प्रतिबंध लगाती है, किंतु यह पृथ्वी की कक्षा के सैन्य उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाती है। शीत युद्ध (Cold War) के समय से ही अमेरिका और सोवियत संघ अंतरिक्ष में अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए प्रयत्नशील रहे हैं। 1950 के दशक में स्पुतनिक 1 (Sputnik 1) के प्रक्षेपण के साथ आरंभ हुई यह स्पर्धा अब उपग्रहों को नष्ट करने या उन्हें निष्क्रिय करने तक पहुँच चुकी है।

रूस की अंतरिक्ष गतिविधियों का संचालन रोसकोसमोस (Roscosmos) नामक सरकारी कॉर्पोरेशन द्वारा किया जाता है। रोसकोसमोस का इतिहास सोवियत संघ के विघटन के बाद के संघर्षों से भरा हुआ है। 1992 में रूसी अंतरिक्ष एजेंसी के रूप में स्थापित यह संस्था 2015 में एक कॉर्पोरेशन में बदल गई थी। रोसकोसमोस की रिपोर्टें दर्शाती हैं कि वे सोयुज (Soyuz) और प्रोटोन (Proton) जैसे शक्तिशाली रॉकेटों का उपयोग करते हैं। हालाँकि, 2022 में यूक्रेन पर आक्रमण के बाद रूस अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अकेला पड़ गया है, जिसके कारण उसकी अंतरिक्ष एजेंसी ने पश्चिमी देशों के साथ सहयोग लगभग समाप्त कर दिया है।
| रॉकेट का नाम | क्षमता का प्रकार | मुख्य उपयोग |
|---|---|---|
| प्रोटोन-एम (Proton-M) | हेवी-लिफ्ट | भारी उपग्रहों का प्रक्षेपण |
| सोयुज-2 (Soyuz-2) | मीडियम-लिफ्ट | मानव मिशन और उपग्रह |
| अंगारा ए5 (Angara A5) | हेवी-लिफ्ट | आधुनिक सैन्य पेलोड |
| अंगारा-1.2 (Angara-1.2) | स्मॉल-लिफ्ट | छोटे उपग्रह |
अंतरिक्ष में होने वाले हमलों को मुख्य रूप से तीन भागों में बाँटा जा सकता है: ग्राउंड-टू-स्पेस (ground-to-space), स्पेस-टू-स्पेस (space-to-space) और स्पेस-टू-ग्राउंड (space-to-ground)। रूस की हालिया हरकतें स्पेस-टू-स्पेस श्रेणी में आती हैं, जहाँ एक उपग्रह दूसरे उपग्रह पर हमला करता है। इसके लिए 'को-ऑर्बिटल वेपन्स' (co-orbital weapons) का उपयोग किया जाता है, जो लक्ष्य उपग्रह की समान कक्षा में रहकर उसके करीब पहुँचते हैं और उसे भौतिक रूप से टकराकर या लेज़र जैसे हथियारों से नष्ट कर सकते हैं।
यह प्रक्रिया कैसे काम करती है, यह समझने के लिए एक सादा उदाहरण लेते हैं। मान लीजिए हाईवे पर दो कारें जा रही हैं। एक कार वह व्यावसायिक उपग्रह है जो शांति से अपना काम कर रहा है, जबकि दूसरी कार सैन्य उपग्रह है। सैन्य उपग्रह धीरे-धीरे अपनी गति और दिशा बदलकर व्यावसायिक कार के एकदम पीछे या बगल में आ जाता है। इस स्थिति में वह कभी भी मुड़कर उस कार को टक्कर मार सकता है या उसके शीशे पर काला रंग छिड़ककर उसे अंधा कर सकता है। अंतरिक्ष में यही काम बेहद सटीकता के साथ किया जाता है।

ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो, चार देशों ने एंटी-सैटेलाइट (anti-satellite) मिसाइल का सफल परीक्षण किया है: अमेरिका, रूस, चीन और भारत। भारत ने 2019 में 'मिशन शक्ति' (Mission Shakti) के तहत लो अर्थ ऑर्बिट में मौजूद एक उपग्रह को नष्ट करके अपनी क्षमता साबित की थी। रूस ने 2021 में ए-235 (A-235) मिसाइल के ज़रिए ऐसा ही परीक्षण किया था। हालाँकि, मिसाइल द्वारा उपग्रह को तोड़ने से अंतरिक्ष में हज़ारों टुकड़ों का कचरा (space debris) पैदा होता है, जो अन्य उपग्रहों के लिए खतरनाक बनता है। यही वजह है कि अब देश 'सॉफ्ट किल' (soft kill) पद्धतियों की ओर बढ़ रहे हैं, जिसमें उपग्रह को तोड़ने के बजाय उसे निष्क्रिय किया जाता है।
- लॉन्चिंग और इंजेक्शनहमलावर उपग्रह को लक्ष्य उपग्रह की समान कक्षा में लॉन्च किया जाता है।
- रेंडेवू (Rendezvous)अपने इंजन का उपयोग करके हमलावर उपग्रह धीरे-धीरे लक्ष्य के करीब पहुंचता है।
- प्रॉक्सिमिटी ऑपरेशंसलक्ष्य से कुछ मीटर की दूरी पर रहकर उसके कमजोर बिंदुओं की जांच या जासूसी की जाती है।
- एग्जीक्यूशनभौतिक टक्कर, लेजर बीम या इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग द्वारा लक्ष्य उपग्रह को निष्क्रिय किया जाता है।
अमेरिका ने भी इस दिशा में बड़े कदम उठाए हैं। सितंबर २०२६ में यू.एस. स्पेस फोर्स (U.S. Space Force) के सेक्रेटरी ट्रॉय मेनके ने घोषणा की थी कि अमेरिका ने 'ऑन-ऑर्बिट स्पेस कंट्रोल वेपन्स' (on-orbit space control weapons) तैनात कर दिए हैं। ये हथियार दुश्मन देशों के हमलावर उपग्रहों के खिलाफ सुरक्षा देने के लिए सक्षम हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि अब अंतरिक्ष में केवल जासूसी ही नहीं, बल्कि सक्रिय रक्षा और आक्रमण की तैयारियां भी पूरी हो चुकी हैं।

आम लोगों के लिए यह समाचार क्यों महत्वपूर्ण है? आज हमारी बैंकिंग प्रणाली, जीपीएस (GPS) नेविगेशन, मौसम की भविष्यवाणी और इंटरनेट सेवाएं ज्यादातर उपग्रहों पर निर्भर हैं। यदि रूस जैसे देश व्यावसायिक उपग्रहों को निशाना बनाना शुरू करें, तो वैश्विक संचार व्यवस्था चरमरा सकती है। विशेष रूप से स्टारलिंक (Starlink) जैसे उपग्रहों ने यूक्रेन युद्ध में जो भूमिका निभाई है, उससे रूस नाराज है और उसने पहले भी ऐसे उपग्रहों को गिराने की धमकी दी है।
भारत के लिए भी यह चिंता का विषय है। भारत के पास अपने कई महत्वपूर्ण व्यावसायिक और सैन्य उपग्रह हैं। यदि अंतरिक्ष में इस प्रकार की अस्थिरता बढ़ती है, तो भारत को भी अपनी 'स्पेस सिचुएशनल अवेयरनेस' (space situational awareness) यानी अंतरिक्ष में कौन सा पिंड कहाँ है, इसकी जानकारी रखने की क्षमता बढ़ानी होगी। फिलहाल अंतरिक्ष में किस देश का उपग्रह क्या कर रहा है, इसकी सटीक जानकारी हासिल करना मुश्किल है, क्योंकि ज्यादातर देश अपनी सैन्य गतिविधियां गुप्त रखते हैं।

भविष्य में अंतरिक्ष कानूनों में बदलाव की जरूरत पैदा होगी। अब तक के कानून अंतरिक्ष के शांतिपूर्ण उपयोग पर जोर देते हैं, लेकिन रूस की हालिया हरकत दर्शाती है कि ये नियम अब पर्याप्त नहीं हैं। क्या किसी देश का सैन्य उपग्रह दूसरे देश के व्यावसायिक उपग्रह के इतने करीब जा सकता है? क्या इसे युद्ध की शुरुआत माना जाना चाहिए? यह ऐसे प्रश्न हैं जिनके उत्तर अंतरराष्ट्रीय समुदाय को जल्द से जल्द खोजने होंगे। यदि ऐसा नहीं हुआ, तो पृथ्वी पर होने वाले युद्ध अब अंतरिक्ष में भी लड़े जाएंगे, जिसकी कीमत पूरी मानवता को चुकानी पड़ सकती है।


