कांच के पतले तार में प्रकाश कैद करके दुनिया भर में इंटरनेट दौड़ाने वाले फाइबर ऑप्टिक्स का चमत्कार
समुद्र के तल और शहरों की सड़कों के नीचे बिछे कांच के अतिसूक्ष्म तागे किस प्रकार पूर्ण आंतरिक परावर्तन के नियम के आधार पर पूरी दुनिया का डेटा प्रवाहित कर रहे हैं, इसकी विस्तृत गाथा।

आज के डिजिटल युग में जब हम एक क्लिक पर दुनिया के दूसरे छोर पर स्थित सर्वर से वीडियो स्ट्रीम करते हैं या सेकंड के हजारवें हिस्से में संदेश भेजते हैं, तब यह सारा डेटा वास्तव में आसमान से नहीं बल्कि पृथ्वी के भीतर और महासागरों की तली में बिछी अति पतली कांच की तारों से बह रहा होता है। यह तकनीक यानी ऑप्टिकल फाइबर (optical fiber)। बिजली के तारों की जगह कांच या प्लास्टिक के अत्यंत लचीले तंतुओं के माध्यम से प्रकाश के रूप में सूचना का वहन करने की विधा को फाइबर ऑप्टिक्स (fiber optics) कहते हैं। इस क्षेत्र का नामकरण भारतीय मूल के भौतिकविज्ञानी Narinder Singh Kapany द्वारा किया गया था, जिन्हें इस तकनीक का पितामह माना जाता है।
धातु के पारंपरिक तांबे के तारों की तुलना में फाइबर केबल इसलिए बेहतर साबित हुए हैं क्योंकि प्रकाश के सिग्नल लंबी दूरी तक बिना किसी बड़े अवरोध के और अत्यंत उच्च बैंडविड्थ (bandwidth: डेटा वहन करने की क्षमता) के साथ यात्रा कर सकते हैं। तांबे के तार में बहने वाली विद्युत धारा बाहरी चुंबकीय क्षेत्रों से प्रभावित होती है, जबकि ऑप्टिकल फाइबर इलेक्ट्रोमैग्नेटिक इंटरफेरेंस (electromagnetic interference: विद्युतचुंबकीय विक्षेप) के खिलाफ पूरी तरह सुरक्षित है। परिणामस्वरूप आवाज़ या डेटा में कोई बाधा नहीं पहुंचती है और सिग्नल कमजोर पड़ने की दर यानी एटेन्यूएनेशन (attenuation) भी बहुत कम रहता है।
पूर्ण आंतरिक परावर्तन: कांच में प्रकाश को कैद करने का भौतिक सिद्धांत
ऑप्टिकल फाइबर की कार्यप्रणाली भौतिकी के एक बुनियादी नियम पर टिकी हुई है जिसे पूर्ण आंतरिक परावर्तन (total internal reflection - TIR) कहा जाता है। सामान्यतः जब प्रकाश की किरण एक पारदर्शी माध्यम से दूसरे माध्यम में प्रवेश करती है तब वह अपने सीधे मार्ग से थोड़ा मुड़ जाती है, जिसे अपवर्तन (refraction) कहते हैं। प्रकाश कितनी तेजी से मुड़ेगा इसका आधार उस माध्यम के अपवर्तनांक (refractive index) पर निर्भर करता है। जब प्रकाश अधिक अपवर्तनांक वाले माध्यम से कम अपवर्तनांक वाले माध्यम में जाता है, तब अपवर्तित किरण अभिलंब से दूर भागती है।

इस प्रक्रिया में आपतन कोण (angle of incidence) जैसे-जैसे बढ़ाया जाता है वैसे-वैसे एक निश्चित बिंदु ऐसा आता है जहाँ अपवर्तित किरण दोनों माध्यमों की सतह के समानांतर यानी 90 अंश के कोण पर बहने लगती है। इस विशेष कोण को क्रांतिक कोण (critical angle) कहते हैं। यदि आपतन कोण का मान इस क्रांतिक कोण से थोड़ा सा भी बढ़ा दिया जाए, तो प्रकाश की किरण दूसरे माध्यम में जाने के बजाय पूरी तरह से मूल माध्यम में ही अंदर की तरफ वापस लौट जाती है। अर्थात् प्रकाश का जरा भी नुकसान हुए बिना सौ प्रतिशत परावर्तन होता है।
| माध्यम (Medium) | क्रांतिकोण (अंशमां) |
|---|---|
| पानी (Water) | ४८°२७′ (आशरे ४८.६°) |
| सामान्य अथवा एक्रेफिक कांच (Common / Acrylic Glass) | आशरे ४१.८° - ४२° |
| फ्लिंट कांच (Flint Glass) | ३८°४१′ |
| हीरो (Diamond) | २३°४२′ |
सन् १८२३ में फ्रांसीसी भौतिकशास्त्री Augustin-Jean Fresnel द्वारा इस परिघटना के चरणबद्ध परिवर्तनों का विस्तृत गणितीय विश्लेषण प्रस्तुत किया गया था, जिसने प्रकाश के तरंग सिद्धांत को सुदृढ़ समर्थन दिया था। पानी से हवा में जाते प्रकाश के लिए क्रांतिकोण लगभग ४८.६° (अथवा ४८°२७′) होता है, जबकि सामान्य कांच से हवा में जाने के लिए यह कोण लगभग ४१.८° या ४२° के आसपास होता है। ऑप्टिकल फाइबर इसी प्राकृतिक नियम का चतुराई से उपयोग करता है, जिससे कांच के अंदर प्रवेश किया प्रकाश का किरण बार-बार अंदर की दीवारों से टकराकर हजारों किलोमीटर तक बाहर निकले बिना आगे बढ़ता रहता है।
प्रकाश को मार्गदर्शन देने की ऐतिहासिक यात्रा
प्रकाश को सीधी रेखा के अलावा टेढ़े-मेढ़े मार्ग पर मोड़ा जा सकता है—यह सबसे पहले पेरिस में १८४० के दशक की शुरुआत में Daniel Colladon और Jacques Babinet नामक वैज्ञानिकों ने पानी के बहते फव्वारे में प्रकाश का वहन करके प्रदर्शित किया था। उसके बारह वर्ष बाद लंदन में John Tyndall नामक वैज्ञानिक ने इस प्रयोग को सार्वजनिक व्याख्यान में दर्शाया और १८७० में अपनी पुस्तक में क्रांतिकोण और आंतरिक परावर्तन के नियमों को स्पष्ट किया था। उन्नीसवीं सदी के अंत भाग में वियना के चिकित्सकों ने शरीर के आंतरिक अंगों को देखने के लिए मुड़ी हुई कांच की नलियों द्वारा प्रकाश पहुँचाने का प्रयास शुरू किया था।
बीसवीं सदी के पूर्वाद्ध में Clarence Hansell और John Logie Baird जैसे शोधकर्ताओं ने पतली नलियों के मार्फत चित्र भेजने के प्रयोग किए, परंतु वास्तविक क्रांति १९५३ में आई। डच वैज्ञानिक Bram van Heel और लंदन की इम्पीरियल कॉलेज में Narinder Singh Kapany तथा Harold Hopkins ने हजारों कांच के तंतुओं को एकसाथ जोड़कर चित्र प्रसारित करने में सफलता प्राप्त की। Kapany ने १९६० में 'साइंटिफिक अमेरिकन' पत्रिका में लेख लिखकर "फाइबर ऑप्टिक्स" शब्द जगत्भर में प्रचलित किया और इस क्षेत्र पर सबसे पहली आधिकारिक पुस्तक लिखी।
संचार क्रांति और काओ की नोबेल विजेता खोज
शुरुआती ऑप्टिकल फाइबर में एक बड़ी सीमा थी: प्रकाश कुछ ही मीटरों में अवशोषित हो जाता था। १९६५ में Manfred Börner नामक जर्मन वैज्ञानिक ने टेलीफंकेन लैब्स में सबसे पहली डेटा ट्रांसमिशन सिस्टम बनाई। परंतु ऑप्टिकल फाइबर को विश्वव्यापी संचार माध्यम बनाने के लिए सिग्नल क्षीण होने की दर को घटाना अनिवार्य था। १९६५ में ब्रिटिश कंपनी Standard Telephones and Cables (STC) के वैज्ञानिकों Charles K. Kao और George A. Hockham ने क्रांतिकारी विचार प्रस्तुत किया कि फाइबर में प्रकाश का क्षीण होना भौतिक प्रकीर्णन के कारण नहीं, बल्कि कांच की अशुद्धियों के कारण होता है।
उन्होंने गणना करके बताया कि यदि अतिशुद्ध सिलिका कांच (silica glass) का उपयोग किया जाए तो एटेन्यूएशव (attenuation) को २० डेसिबल प्रति किलोमीटर (dB/km) से नीचे लाया जा सकता है, जो टेलीकम्युनिकेशन के लिए एक व्यावहारिक मील का पत्थर था। इस ऐतिहासिक सिद्धांत के लिए Charles K. Kao को २००९ में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया था। १९७० में अमेरिकी ग्लास निर्माता Corning Glass Works के वैज्ञानिकों Robert D. Maurer, Donald Keck, Peter C. Schultz और Frank Zimar ने सिलिका कांच में टाइटेनियम मिलाकर १७ dB/km क्षमता वाला फाइबर तैयार किया।
dB/km
तत्पश्चात जर्मेनियम डाइऑक्साइड के उपयोग से एटेन्यूएशन घटकर मात्र ४ dB/km हो गया। शुरुआत में कांच के उच्च गुणवत्ता वाले तार सेकंड में मात्र दो मीटर की गति से खींचे जा सकते थे। परंतु १९८३ में केमिकल इंजीनियर Thomas Mensah ने कॉर्निंग कंपनी में उत्पादन गति बढ़ाकर प्रति सेकंड ५० मीटर से अधिक कर दी, जिससे फाइबर केबल तांबे के तारों से भी सस्ते बन गए। १९७७ में इटली के तुरिन शहर में सबसे पहले मेट्रोपॉलिटन फाइबर केबल बिछाया गया था।
ऑप्टिकल फाइबर की आंतरिक संरचना और प्रकार
ऑप्टिकल फाइबर की भौतिक संरचना एक अत्यंत कुशल इंजीनियरिंग कमाल है। यह मुख्य रूप से दो मुख्य स्तरों से बनी बेलनाकार संरचना होती है। केंद्रभाग को कोर (core) कहा जाता है, जो अतिशुद्ध सिलिका ग्लास या प्लास्टिक का बना होता है और उसका अपवर्तनांक (refractive index) अपेक्षाकृत ऊंचा रखा जाता है। इस कोर के चारों ओर एक अन्य पारदर्शी परत चढ़ाई जाती है जिसे क्लैडिंग (cladding) कहते हैं। क्लैडिंग का अपवर्तनांक कोर से कम रखा जाता है। इन दोनों स्तरों के अपवर्तनांक के अंतर के कारण ही प्रकाश कोर की दीवार से टकराकर अंदर ही बना रहता है।
- १. विद्युत संकेतोतुं प्रकाशमां रूपांतरणकंप्यूटरनो डिजिटल बाइनरी डेटा लेसर अथवा एलईडी ट्रांसमीटर द्वारा प्रकाशना अति ઝડપી स्पंदनोंमां फेरवाय छे.
- २. पूर्ण आंतरिक परावर्तन द्वारा वहनप्रकाश सिलिका कांचना कोरमां प्रवेश छे अने क्लैडिंगनी दीवालो साथे क्रांतिकोणथी वधारे खूणे અથडાઈने सतत आगे बढते छे.
- ३. प्रकाशीय एम्प्लिफिकेशनलांबा अंतरे नबळा पडेला सिग्नलने EDFA जेवा एम्प्लिफायर द्वारा विद्युतमां फेरवया वगर सीधुं ज प्रकाशीय रीते पुन: बळवत्तर કરાય छे.
- ४. डिटेक्शन अने पुन: रूपांतरणछेवाडे रहेलुं ऑप्टिकल रिसीवर प्रकाशना संकेतो झीलीने तेने मूळ डिजिटल विद्युत डेटामां फेरवीने उपकरणने सोपे छे.
सिग्नल प्रसारण की पद्धति के आधार पर ऑप्टिकल फाइबर को मुख्य दो वर्गों में बांटा जाता है: सिंगल-मोड फाइबर (Single-mode fiber - SMF) और मल्टी-मोड फाइबर (Multi-mode fiber - MMF)। मल्टी-मोड फाइबर में कोर का व्यास बड़ा होता है, जिसके कारण प्रकाश की किरणें एक से अधिक मार्गों (modes) पर से गुजर सकती हैं। इसका उपयोग मुख्य रूप से कम दूरी की नेटवर्किंग और उच्च शक्ति वहन करने के लिए किया जाता है। दूसरी ओर सिंगल-मोड फाइबर में कोर अत्यंत पतला होता है, जिससे प्रकाश केवल एक ही सीधे मार्ग पर गमन करता है। १,०५० मीटर से अधिक लंबे सभी संचार नेटवर्क में सिंगल-मोड फाइबर का ही उपयोग किया जाता है।
प्रकाश द्वारा डेटा का अरबों बिट्स में रूपांतरण
ऑप्टिकल फाइबर में सूचना का प्रसारण मात्र एक चमक नहीं, बल्कि एक सुव्यवस्थित डिजिटल प्रक्रिया है। कंप्यूटर या फोन से निकलने वाला इलेक्ट्रिकल डेटा सबसे पहले ट्रांसमीटर में जाता है, जहाँ लेज़र या एलईडी (LED) डायोड उस सूचना को प्रकाश के सूक्ष्म स्पंदनों यानी पल्सों में परिवर्तित करता है। प्रकाश का चालू होना यानी '1' और बंद होना यानी '0' - यह बाइनरी कोड अति तीव्र गति से फाइबर के अंदर फेंका जाता है। वर्तमान कार्यप्रणाली में प्रति सेकंड 10 से 40 गीगाबिट्स (Gbit/s) की सामान्य डेटा दर उपलब्ध होती है।

इस क्षमता को असाधारण स्तर तक पहुँचाने के लिए वेवलेंथ-डिविजन मल्टीप्लेक्सिंग (Wavelength-Division Multiplexing - WDM) पद्धति का उपयोग किया जाता है। इस पद्धति में अलग-अलग तरंगदैर्ध्य (रंगों) वाले प्रकाश की किरणों को एक ही कांच के तार में एक साथ प्रवाहित किया जाता है। वर्ष 2008 तक व्यावसायिक डेंस WDM प्रणालियों में 80 जितनी स्वतंत्र चैनल एक साथ चलाई जाती थीं। लंबी दूरी पर सिग्नल कमज़ोर न पड़े, इसके लिए 1986 और 1987 में क्रमशः साउथम्पटन यूनिवर्सिटी के David N. Payne और बेल लैब्स के Emmanuel Desurvire ने एर्बियम-डोप्ड फाइबर एम्पलीफायर (Erbium-doped fiber amplifier - EDFA) विकसित किए। यह उपकरण प्रकाश सिग्नल को विद्युत में रूपांतरित किए बिना सीधे ही प्रकाशीय रूप से बूस्ट करता है, जिससे हर 70 से 150 किलोमीटर पर आसानी से रीपीटर रखा जा सकता है।

दो फाइबर के सिरों को जोड़ने की प्रक्रिया भी बिजली के तार जोड़ने जितनी सरल नहीं होती है। इसे अत्यंत सटीकता से काटना पड़ता है जिसे क्लीविंग कहा जाता है। स्थायी संबंध के लिए फ्यूजन स्प्लिसिंग (fusion splicing) पद्धति का उपयोग किया जाता है, जिसमें इलेक्ट्रिक आर्क की गर्मी से दोनों सिरों को पिघलाकर एकरस कर दिया जाता है। अस्थायी संबंध के लिए यांत्रिक स्प्लिस या विशेष ऑप्टिकल कनेक्टर्स का उपयोग किया जाता है, जैसे घर के ऑडियो उपकरणों में उपयोग होने वाले TOSLINK कनेक्टर्स।
संचार के अलावा अन्य नए क्षेत्र: सेंसर से लेकर युद्धभूमि तक
ऑप्टिकल फाइबर केवल टेलीफोन या इंटरनेट तक ही सीमित नहीं है। चिकित्सा क्षेत्र में फ़ाइब्रोस्कोप (fiberscope) और एंडोस्कोपी उपकरणों द्वारा शरीर के नाज़ुक आंतरिक भागों का जीवंत निरीक्षण संभव हुआ है। डेलाइटिंग (daylighting) तकनीक में बिल्डिंग की छत पर पैराबोलिक कलेक्टर लगाकर सूर्य के प्रकाश को एकत्रित कर फाइबर के गुच्छों के ज़रिए मकान के अंदर के अंधेरे कमरों में पहुँचाया जाता है।
इसके अलावा फाइबर का उपयोग संवेदनशील सेंसर के रूप में भी किया जाता है। तापमान, दबाव या खिंचाव के परिवर्तन से प्रकाश के आयाम, कला या तरंगदैर्ध्य में जो परिवर्तन होता है, उसे मापकर बड़े पुलों, बांधों और सुरंगों की संरचनात्मक सुरक्षा की जाँच की जाती है, जिसे डिस्ट्रिब्यूटेड एकॉस्टिक सेंसिंग कहते हैं। मार्च 2024 से रूस-यूक्रेन युद्ध में ऑप्टिकल फाइबर से जुड़े ड्रोन का उपयोग शुरू हुआ है। इन ड्रोनों के पीछे अति महीन फाइबर तार जुड़ा रहने के कारण वे किसी भी इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग या विद्युत चुम्बकीय अवरोध से प्रभावित हुए बिना दुश्मन पर सटीक हमला कर सकते हैं।
ई.स. १९९१ में फोटोनिक क्रिस्टल फाइबर (photonic crystal fiber) की नई संकल्पना आई, जो वर्ष २००० में व्यावसायिक स्तर पर उपलब्ध हुई। इन तंतुओं में पूर्ण आंतरिक परावर्तन के बजाय विवर्तन (diffraction) सिद्धांत का उपयोग होता है और इसका अंदर का भाग पोला (hollow core) भी हो सकता है। प्रकाश की गति से दौड़ने वाले इन अदृश्य कांच के तंतुओं ने मानव संस्कृति को भौगोलिक सीमाओं से परे जाकर एक-दूसरे के साथ अखंड रूप से जोड़े रखा है।


