लिथियम-सल्फर बैटरी: ऊर्जा भंडारण की नई क्षितिज और इसकी चुनौतीपूर्ण यात्रा
वर्तमान लिथियम-आयन बैटरी की तुलना में कई गुना अधिक क्षमता और कम कीमत वाली लिथियम-सल्फर तकनीक का विज्ञान और उसकी बाधाओं की गहरी समझ।

आज के इलेक्ट्रिक वाहनों और स्मार्टफोन के युग में ऊर्जा का भंडारण सबसे बड़ा चुनौती है। अभी हम जो लिथियम-आयन (Lithium-ion) बैटरियां उपयोग करते हैं, वे अपनी सीमा तक पहुँच रही हैं। इस स्थिति में वैज्ञानिकों का ध्यान लिथियम-सल्फर (Lithium-sulfur या Li-S) बैटरी की ओर गया है। यह बैटरी न केवल हल्की है, बल्कि यह लिथियम-आयन सेलों की तुलना में बहुत अधिक ऊर्जा संग्रहीत करने की क्षमता रखती है। लिथियम का कम परमाणु भार और सल्फर का मध्यम परमाणु भार इस बैटरी को पानी जैसी घनता देता है, जो इसे वजन में अत्यंत हल्की बनाती है। विकिपीडिया और अन्य समाचार स्रोतों के अनुसार, लिथियम-सल्फर बैटरी में ऊर्जा घनता (energy density) इतनी अधिक है कि यह भविष्य में लिथियम-आयन का स्थान ले सकती है।
लिथियम-सल्फर बैटरी का इतिहास काफी पुराना है। इसकी खोज 1960 के दशक में हर्बर्ट और उलाम द्वारा की गई थी। उन्होंने लिथियम एनोड और सल्फर कैथोड का उपयोग करके प्राथमिक बैटरी का पेटेंट प्राप्त किया था। 1980 के दशक के अंत तक, ईथर (ether) आधारित इलेक्ट्रोलाइट का उपयोग करके रिचार्जेबल लिथियम-सल्फर बैटरी का प्रदर्शन किया गया था। इस तकनीक की क्षमता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अगस्त 2008 में 'Zephyr 6' नामक सौर ऊर्जा से चलने वाले मानव रहित विमान ने सबसे लंबी और सबसे अधिक ऊंचाई पर उड़ान भरी थी, जिसमें लिथियम-सल्फर बैटरी का उपयोग हुआ था।
- लिथियम का ऑक्सीकरणएनोड पर मौजूद धातुमय लिथियम इलेक्ट्रॉन मुक्त करता है और लिथियम आयन (Li+) बनाता है।
- आयनों का स्थानांतरणमुक्त हुए लिथियम आयन इलेक्ट्रोलाइट द्वारा कैथोड की ओर गमन करते हैं।
- सल्फर का रिडक्शनकैथोड पर सल्फर (S8) लिथियम आयनों के साथ जुड़कर विभिन्न पॉलिसल्फाइड्स (Li2Sx) बनाता है।
- अंतिम उत्पादप्रक्रिया के अंत में लिथियम सल्फाइड (Li2S) बनता है और पूरी ऊर्जा मुक्त होती है।
इस बैटरी की कार्यप्रणाली को समझने के लिए हमें इसके रासायनिक ढांचे को देखना पड़ता है। लिथियम-सल्फर बैटरी में एनोड (anode) के रूप में धातुमय लिथियम का उपयोग होता है, जबकि कैथोड (cathode) के रूप में सल्फर (S8) होता है। जब बैटरी डिस्चार्ज होती है, तब एनोड की सतह से लिथियम पिघलता है और इलेक्ट्रॉन मुक्त करता है। इस प्रक्रिया को ऑक्सीकरण कहा जाता है। दूसरी ओर, कैथोड पर सल्फर इन लिथियम आयनों के साथ जुड़कर लिथियम सल्फाइड (Li2S) बनाता है। इस प्रक्रिया के दौरान ऊर्जा मुक्त होती है जिसका हम उपयोग करते हैं। चार्जिंग के समय यह प्रक्रिया उल्टी होती है और लिथियम फिर से एनोड पर जमा होता है।
लिथियम-सल्फर बैटरी की सबसे बड़ी विशेषता इसकी भंडारण क्षमता है। पारंपरिक लिथियम-आयन बैटरी में लिथियम आयन एनोड और कैथोड के ढांचे में व्यवस्थित होते हैं (intercalation), जिसमें प्रत्येक होस्ट परमाणु पीछे केवल 0.5 से 0.7 लिथियम आयन ही रह सकते हैं। इसकी तुलना में, लिथियम-सल्फर बैटरी में प्रत्येक सल्फर परमाणु दो लिथियम आयनों को समाहित कर सकता है। इस कारण इसकी सैद्धांतिक विशिष्ट ऊर्जा (theoretical specific energy) लगभग 2600 Wh/kg है। हालांकि, व्यावहारिक रूप से अभी 400-450 Wh/kg तक की क्षमता हासिल की जा सकी है, जो अभी भी लिथियम-आयन की तुलना में बहुत अधिक है।
Ah/kg
परंतु इस तकनीक के व्यापक स्तर पर उपलब्ध न हो पाने के पीछे कुछ गंभीर तकनीकी चुनौतियाँ हैं। सबसे बड़ी चुनौती 'पोलिसल्फेइड शटल' (polysulfide shuttle) इफ़ेक्ट है। डिस्चार्ज के दौरान सल्फर सीधे लिथियम सल्फाइड में रूपांतरित नहीं होता है, बल्कि वह मध्यवर्ती चरणों से गुजरता है जिन्हें लिथियम पोलिसल्फेइड्स (Li2Sx) कहा जाता है। ये पोलिसल्फेइड्स इलेक्ट्रोलाइट में घुल जाते हैं और कैथोड से लीक होकर एनोड की तरफ बहते हैं। वहाँ वे फिर से प्रतिक्रिया करते हैं और वापस कैथोड की तरफ आते हैं। इस निरंतर चलने वाली प्रक्रिया के कारण कैथोड से सक्रिय सामग्री कम होती जाती है, जिससे बैटरी की आयु घटती है और वह जल्दी डिस्चार्ज हो जाती है।

दूसरा बड़ा अवरोध सल्फर की कम चालकता (conductivity) है। सल्फर प्राकृतिक रूप से अचालक है, इसलिए बिजली के प्रवाह को वहन करने के लिए इसमें कार्बन जैसे चालक पदार्थ मिलाने पड़ते हैं। इसके अलावा, जब सल्फर लिथियम के साथ प्रतिक्रिया करता है, तब उसके आकार में लगभग 80% तक की वृद्धि होती है। आकार में होने वाला यह परिवर्तन कैथोड पर भारी यांत्रिक दबाव डालता है, जिसके कारण बैटरी के आंतरिक भागों को नुकसान पहुँचता है और कार्बन तथा सल्फर के बीच का संपर्क टूट जाता है। इन समस्याओं के समाधान के लिए वैज्ञानिक कार्बन नैनोफाइबर्स और विशेष प्रकार के कोटिंग पर शोध कर रहे हैं।
इलेक्ट्रोलाइट (electrolyte) भी इस बैटरी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। लिथियम-आयन बैटरी में इस्तेमाल होने वाले सामान्य कार्बोनेट आधारित इलेक्ट्रोलाइट यहाँ काम नहीं करते हैं, क्योंकि वे पोलिसल्फेइड्स के साथ प्रतिक्रिया करके बैटरी को नुकसान पहुँचाते हैं। इसके बजाय, विशेष प्रकार के ईथर आधारित इलेक्ट्रोलाइट का उपयोग किया जाता है। हाल ही में वैज्ञानिक सॉलिड-स्टेट (solid-state) इलेक्ट्रोलाइट पर भी काम कर रहे हैं, जो पोलिसल्फेइड शटल इफ़ेक्ट को पूरी तरह से रोक सकता है। NASA अभी 'SABERS' नाम का प्रोजेक्ट चला रहा है, जो इलेक्ट्रिक एयरक्राफ्ट और स्पेसक्राफ्ट के लिए सॉलिड-स्टेट लिथियम-सल्फर बैटरी विकसित कर रहा है।
| पैरामीटर | जरूरी लक्ष्य |
|---|---|
| सल्फर लोडिंग (Sulfur Loading) | > ૫ mg/cm2 |
| कार्बन की मात्रा (Carbon Content) | < ૫% |
| इलेक्ट्रोलाइट-सल्फर अनुपात (E/S Ratio) | < ૫ μL/mg |
| सैद्धांतिक विशिष्ट ऊर्जा | ~ ૨૬૦૦ Wh/kg |
लिथियम-सल्फर बैटरी को व्यावसायिक तौर पर सफल बनाने के लिए कुछ निश्चित लक्ष्य तय किए गए हैं। कंपनियों की घोषणाओं और शोधों के अनुसार, कैथोड में सल्फर की मात्रा 5 mg/cm2 से अधिक होनी चाहिए और कार्बन की मात्रा 5% से कम होनी चाहिए। इसके अलावा, इलेक्ट्रोलाइट और सल्फर का अनुपात (E/S ratio) भी सीमित रखना आवश्यक है। यदि ये मानदंड पूरे होते हैं, तभी बैटरी की कीमत कम और कार्यक्षमता अधिक रह सकती है। 2017 में 1500 चार्ज-डिस्चार्ज साइकिल वाली बैटरी का प्रदर्शन किया गया था, परंतु व्यावसायिक स्तर पर इसका परीक्षण अभी बाकी है।

भारत जैसे देश के लिए लिथियम-सल्फर बैटरी बहुत ही महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। सल्फर एक बहुत ही सस्ता और प्रचुर मात्रा में उपलब्ध पदार्थ है, जो बैटरी की कीमत में भारी कमी ला सकता है। यदि यह तकनीक सफल होती है, तो इलेक्ट्रिक वाहनों की रेंज अभी से दोगुनी हो सकती है और इसकी कीमत सामान्य पेट्रोल वाहनों जितनी ही हो सकती है। हालांकि, अभी भी पॉलीसल्फाइड शटल और आकार में होने वाले बदलाव जैसी समस्याओं के स्थायी समाधान खोजने के लिए और अधिक शोध की आवश्यकता है। आगामी दशक में हम शायद लिथियम-आयन युग के अंत और लिथियम-सल्फर युग की शुरुआत देख सकते हैं।


