भारत में हर 10 में से 9 दिन खराब मौसम, 3,220 लोगों की मौत
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की रिपोर्ट में मौसम के बदलते पैटर्न और जनहानि के चिंताजनक विवरण
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
5 नवंबर 2026, शाम 6:07 · 4 मिनट का पाठ
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भारत में बदलते मौसम का पैटर्न अब मानव जीवन के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट और डाउन टू अर्थ की "क्लाइमेट इंडिया 2026" रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी से सितंबर 2026 के दौरान देश के विभिन्न हिस्सों में 273 दिनों में से 251 दिनों में, यानी लगभग 92 प्रतिशत दिनों में गंभीर मौसम की घटनाएं दर्ज की गईं। इसका अर्थ यह है कि हर दस दिनों में नौ दिन देश का कोई न कोई हिस्सा खराब मौसम से प्रभावित रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, इन प्राकृतिक आपदाओं के कारण 3,220 लोगों ने अपनी जान गंवाई है। इसके अलावा, 47,244 पशुओं की मृत्यु हुई है, जबकि 1,28,334 घर नष्ट हो गए हैं। खेती पर इसका भारी असर पड़ा है और लगभग 4.25 मिलियन हेक्टेयर फसल को नुकसान हुआ है। राज्यवार विवरण देखें तो, उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक 811 लोगों की मौत हुई है और 6.9 लाख हेक्टेयर फसल प्रभावित हुई है। महाराष्ट्र में 286 लोगों की मौत हुई और 2.83 लाख हेक्टेयर फसल को नुकसान हुआ, जबकि बिहार में 245 लोगों की मौत और 2.3 लाख हेक्टेयर फसल प्रभावित हुई है।
रिपोर्ट में उत्तर प्रदेश और हिमाचल प्रदेश को सबसे अधिक प्रभावित राज्य बताया गया है, जहां जनवरी से सितंबर के बीच के दिनों में लगभग 64% दिनों में गंभीर मौसम की घटनाएं हुईं। क्षेत्रीय रूप से देखें तो, उत्तर-पश्चिम भारत में 235 दिन और पूर्व तथा उत्तर-पूर्व भारत में 218 दिन खराब मौसम देखा गया। 2022 से 2026 तक के पांच वर्षों के विश्लेषण के अनुसार, इस अवधि में कुल 16,303 लोगों की मौत हुई और 20.6 मिलियन हेक्टेयर फसल को नुकसान हुआ है।
इस गंभीर स्थिति के बीच, भारत 9 से 20 नवंबर के दौरान तुर्की के अंताल्या में आयोजित होने वाले संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (COP31) में अपनी मांगें रखेगा। केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने मंगलवार को आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि भारत के लिए 'क्लाइमेट फाइनेंस' (जलवायु वित्तीय सहायता) सर्वोच्च प्राथमिकता होगी। भारत की मांग है कि विकसित देश अपनी वित्तीय जिम्मेदारियों को पूरा करें और यह सहायता अनुमानित, मुख्य रूप से सार्वजनिक और रियायती दरों पर हो, ताकि विकासशील देशों पर कर्ज का बोझ न बढ़े।
मंत्री यादव के अनुसार, भारत विकसित देशों द्वारा प्रौद्योगिकी हस्तांतरण (टेक्नोलॉजी ट्रांसफर) की मांग करेगा और कार्बन मार्केट में भागीदारी को स्वैच्छिक रखने की वकालत करेगा। भारत ऐसी किसी भी शर्त का विरोध करेगा जो विकासशील देशों पर ऊपर से थोपे गए उत्सर्जन कटौती के लक्ष्य हों। इस बीच, नेपाल में 26 अगस्त की बाढ़ से 1,400 लोगों की मौत हुई थी, जिसके कारण 'लॉस एंड डैमेज फंड' की कार्यप्रणाली पर भी चर्चा होगी। नेपाल को पुनर्निर्माण के लिए 4.7 बिलियन डॉलर की आवश्यकता है, जबकि फंड द्वारा केवल 21.6 मिलियन डॉलर आवंटित किए गए हैं।
दूसरी ओर, संयुक्त राष्ट्र की 2026 एडेप्टेशन गैप रिपोर्ट के अनुसार, गरीब देशों को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल होने के लिए वार्षिक 305 बिलियन डॉलर की आवश्यकता है, लेकिन विकसित देशों द्वारा दी गई सहायता 2024 में 28.2 बिलियन डॉलर रही, जो आवश्यकता से बहुत कम है।
COP31 संयुक्त राष्ट्र का एक शिखर सम्मेलन है जिसमें दुनिया के लगभग 198 देशों के प्रतिनिधि जलवायु परिवर्तन के अगले चरण की योजनाओं पर चर्चा करने के लिए एकत्रित होते हैं।
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