सुप्रीम कोर्ट ने संसद और विधानसभाओं में एससी-एसटी के लिए आरक्षित सीटों के रोटेशन की याचिका खारिज की
कोर्ट ने कहा कि कानून में बदलाव करना न्यायपालिका नहीं बल्कि विधायिका का विषय है
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
6 नवंबर 2026, सुबह 6:12 · 4 मिनट का पाठ
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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को संसद और राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों के अनिवार्य रोटेशन की मांग करने वाली याचिका को खारिज कर दिया। हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, कोर्ट ने याचिकाकर्ता को स्पष्ट किया कि यह मामला विधायिका का है, न्यायपालिका का नहीं।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहनान की पीठ ने याचिकाकर्ता पर कटाक्ष करते हुए कहा कि वे "गलत नंबर डायल कर रहे हैं"। कोर्ट ने सुझाव दिया कि कानून में बदलाव के लिए सहमति बनाने के लिए उन्हें निर्वाचित प्रतिनिधियों से संपर्क करना चाहिए।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए पीठ ने परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 9(1)(सी) की वैधता को बरकरार रखा। इस धारा के अनुसार, जिन क्षेत्रों में अनुसूचित जाति और जनजाति के निवासियों का अनुपात तुलनात्मक रूप से अधिक होता है, वहां आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र निर्धारित किए जाते हैं। इस प्रावधान में ऐसे निर्वाचन क्षेत्रों के समय-समय पर रोटेशन की कोई अनिवार्यता नहीं है।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि अनुसूचित जाति-जनजाति के निवासियों की अधिक संख्या के आधार पर आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र निर्धारित करने से जातिवाद बढ़ता है या नहीं, यह प्रश्न विधायिका को विचार करना है। केवल इन कारणों से वर्तमान कानून को असंवैधानिक नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने दोहराया कि याचिकाकर्ता कानून के माध्यम से रोटेशन का सिद्धांत लागू करने के लिए निर्वाचित प्रतिनिधियों के पास जा सकते हैं।
यह याचिका उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के 191-कादिपुर विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र के मतदाता जगदीश सिंह द्वारा दायर की गई थी। यह निर्वाचन क्षेत्र लगभग सात दशकों से अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित है। याचिका में तर्क दिया गया था कि रोटेशन के अभाव में संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 19 सहित समानता के अधिकार और अन्य मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है, क्योंकि मतदाता केवल अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों को चुनने के लिए मजबूर होते हैं।
जगदीश सिंह ने यह भी तर्क दिया कि इस व्यवस्था से पूरे समुदाय के बजाय केवल कुछ परिवारों को ही लाभ मिलता है। उन्होंने मांग की कि पंचायतों और नगरपालिकाओं के लिए संविधान के अनुच्छेद 243D और 243T के तहत जैसी रोटेशन व्यवस्था है, वैसी ही व्यवस्था यहां भी होनी चाहिए।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने याचिकाकर्ता के इस तर्क पर सवाल उठाया कि अधिक अनुसूचित जाति-जनजाति जनसंख्या वाले क्षेत्रों में आरक्षित सीटें रखने से जातिवाद मजबूत होता है। कोर्ट ने नोट किया कि बहुदलीय लोकतंत्र में मतदाता जाति या धर्म के बजाय राजनीतिक विचारधारा के आधार पर प्रतिनिधियों का चयन करते हैं। कोर्ट ने कहा, "राजनीतिक लोकतंत्र में अलग-अलग विचारधारा वाली कई राजनीतिक पार्टियां होती हैं। आमतौर पर मतदाता पार्टी को वोट देते हैं, जाति या धर्म को नहीं। आपको कोई विशेष राजनीतिक विचारधारा पसंद हो सकती है या नहीं। उस विचारधारा का प्रतिनिधित्व कौन करता है, यह गौण हो जाता है। आप उस विचारधारा को वोट देते हैं, इसलिए आपका तर्क गलत साबित होता है।"
कोर्ट ने वोट देने के अधिकार और किसी विशेष निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़ने के दावे वाले अधिकार के बीच अंतर बताया। कोर्ट ने ध्यान दिलाया कि सामान्य श्रेणी के उम्मीदवार गैर-आरक्षित सीटों से चुनाव लड़ने के लिए स्वतंत्र हैं।
जब याचिकाकर्ता ने न्यायिक हस्तक्षेप के लिए आग्रह किया, तो कोर्ट ने फिर से कहा, "आप गलत नंबर डायल कर रहे हैं।" पीठ ने सुझाव दिया कि यह मांग संसद तक ले जानी चाहिए और हल्के अंदाज में जोड़ा, "यह विरोध और नारेबाजी का अच्छा सीजन है, इसलिए यह विरोध करने के लिए सही जगह है।"
याचिकाकर्ता ने ध्यान दिलाया था कि हाईकोर्ट ने खुद स्वीकार किया था कि रोटेशन एक आदर्श व्यवस्था हो सकती है, लेकिन न्यायिक संयम बरतते हुए उसने निर्देश देने से इनकार कर दिया था। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस धारणा पर सवाल उठाया कि अधिक अनुसूचित जाति की जनसंख्या वाले निर्वाचन क्षेत्रों के मतदाता अनिवार्य रूप से जाति के आधार पर ही मतदान करेंगे और इसलिए वहां आरक्षित सीटें अनावश्यक हैं। कोर्ट ने कहा कि यह विचारधारा इस मान्यता पर आधारित है कि बहुसंख्यक समुदाय समुदाय या जाति के आधार पर मतदान करेगा।
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