पशुओं में लम्पी स्किन डिजीज का खतरा, लक्षण दिखने पर तुरंत सतर्क रहने के निर्देश
वायरल संक्रमण के कारण गाय और भैंस में बुखार और शरीर पर गांठें आने की संभावना
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
5 नवंबर 2026, दोपहर 12:46 · अपडेट दोपहर 12:52 · 3 मिनट का पाठ
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पशुपालकों के लिए लम्पी स्किन डिजीज एक बड़ी समस्या बन सकती है। ABP Live की रिपोर्ट के अनुसार, यह एक वायरस से फैलने वाली बीमारी है जो एक पशु से दूसरे पशु में फैल सकती है। यह रोग मुख्य रूप से गाय और भैंस को प्रभावित करता है और यह केप्रिपॉक्स वायरस के माध्यम से फैलता है।
इस रोग के प्रसार के लिए मच्छर, मक्खी, चींटी और खून चूसने वाले अन्य कीट जिम्मेदार हैं। इसके अलावा, यदि कोई पशु संक्रमित है और अन्य पशु उसके सीधे संपर्क में आता है या उसके उपयोग की वस्तुओं का उपयोग करता है, तो भी इस बीमारी के फैलने का जोखिम रहता है। इस रोग के लक्षण दिखने पर पशु को तेज बुखार आता है और उसके शरीर पर जगह-जगह गांठें निकलने लगती हैं।
रोग की शुरुआत आमतौर पर तीव्र बुखार से होती है। इसके बाद पशु के शरीर, गर्दन, सिर और पैरों पर छोटी-बड़ी सख्त गांठें दिखाई देती हैं। इन गांठों का आकार लगभग 2 से 5 सेंटीमीटर तक हो सकता है। बीमारी बढ़ने पर पशु सुस्त हो जाता है और उसके खाने-पीने तथा चारा लेने की मात्रा घट जाती है।
अन्य लक्षणों की बात करें तो, कुछ पशुओं की आंखों और नाक से पानी आने लगता है। पशु के पैरों में सूजन आ सकती है, जिससे उन्हें चलने में कठिनाई होती है। अक्सर पशु के मुंह से लार भी गिरने लगती है। यदि बीमारी अधिक बढ़ जाए, तो शरीर पर मौजूद गांठों के आसपास घाव भी बन सकते हैं। इस रोग के कारण पशु का दूध उत्पादन घट जाता है और कुछ मामलों में पशु की प्रजनन क्षमता पर भी असर पड़ सकता है।
लम्पी डिजीज से बचने के लिए समय पर टीकाकरण करना सबसे महत्वपूर्ण है। पशुपालकों को पशु चिकित्सक की सलाह और निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार स्वस्थ पशुओं का टीकाकरण कराना चाहिए। पशुओं के आवास यानी गौशाला में मच्छर और मक्खियां न हों, इसका ध्यान रखना चाहिए और यह देखना चाहिए कि आसपास पानी जमा न हो। गौशाला, फर्श और बर्तनों की नियमित सफाई आवश्यक है।
यदि बाहर से नया पशु खरीदकर लाया गया है, तो उसे कुछ समय के लिए अन्य पशुओं से अलग रखना चाहिए। यदि क्षेत्र में बीमारी फैल रही हो, तो पशुओं को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने से बचना चाहिए। पशुपालकों को प्रतिदिन पशु के खाने-पीने, दूध देने की मात्रा में होने वाले बदलाव और शरीर पर गांठ या सूजन जैसे लक्षणों पर निरंतर नजर रखनी चाहिए।
सरकारी स्तर पर भी इस रोग को रोकने के लिए टीकाकरण और निगरानी अभियान चलाए जा रहे हैं। प्रभावित क्षेत्रों में पशुओं का टीकाकरण करना, बीमार पशुओं को अलग रखना और कीटों पर नियंत्रण पाने जैसे कदम उठाए जा रहे हैं। पशुपालकों को यह निर्देश भी दिए गए हैं कि यदि पशु में कोई भी लक्षण दिखे, तो उसे छिपाने के बजाय तुरंत पशु चिकित्सा विभाग को सूचित करना चाहिए।
इस रोग के प्रसार के कारण पशुओं के स्वास्थ्य और दूध के उत्पादन पर गंभीर प्रभाव पड़ता है, इसलिए सावधानी बरतना अनिवार्य है।
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