ट्विशा शर्मा मृत्यु मामले में पूर्व न्यायाधीश गिरिबला सिंह की जमानत याचिका हाईकोर्ट ने खारिज की
जांच जारी होने और महत्वपूर्ण फोरेंसिक तथा डिजिटल रिपोर्ट लंबित होने के कारण कोर्ट ने जमानत देने से इनकार किया
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
6 नवंबर 2026, सुबह 2:26 · अपडेट सुबह 2:40 · 7 मिनट का पाठ
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मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मॉडल ट्विशा शर्मा की संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मृत्यु के मामले में आरोपी और भोपाल की पूर्व जिला एवं सत्र न्यायाधीश गिरिबला सिंह की जमानत याचिका खारिज कर दी है। यह निर्णय जस्टिस अजय कुमार निरंकरी की एकल पीठ ने लिया। कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि इस मामले में आरोपी की भूमिका और कथित मानसिक प्रताड़ना से जुड़े पहलुओं की पूरी जांच करना अत्यंत आवश्यक है। उपलब्ध सबूतों और जांच अभी प्रक्रियाधीन होने के कारण कोर्ट ने कहा कि इस स्तर पर जमानत देना उचित नहीं है।
एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस निरंकरी ने 23 पन्नों के आदेश में कहा कि मामले के समग्र तथ्यों, परिस्थितियों, आरोपों की गंभीरता, जांच के दौरान एकत्र की गई सामग्री, मृत्यु से ठीक पहले की परिस्थितियों, सीसीटीवी फुटेज और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट को देखते हुए जमानत देना उचित नहीं है। इसके अलावा, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 193(9) के तहत आगे की जांच अभी जारी है और महत्वपूर्ण फोरेंसिक तथा डिजिटल एक्सट्रैक्शन रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा है।
इस पूरी घटना की शुरुआत 12 मई 2026 को हुई थी, जब पूर्व जिला न्यायाधीश गिरिबला सिंह की पुत्रवधू और मॉडल ट्विशा शर्मा ने अपने घर में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। इस घटना के बाद पुलिस ने सास गिरिबला सिंह और पति समर्थ सिंह के खिलाफ दहेज मृत्यु और दहेज निषेध अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया था। शुरुआत में 14 मई को भोपाल जिला अदालत ने गिरिबला सिंह को जमानत दे दी थी, लेकिन इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। हाईकोर्ट ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका रद्द कर दी, जिसके बाद इस मामले की जांच सीबीआई (CBI) को सौंप दी गई। सीबीआई ने गिरिबला सिंह और उनके बेटे को गिरफ्तार किया था। जिला अदालत द्वारा उनकी जमानत याचिका खारिज किए जाने के बाद उन्होंने फिर से हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, कोर्ट ने नोट किया कि मृतक ट्विशा शर्मा के प्राइमरी मोबाइल फोन से डेटा एक्सट्रैक्शन अभी बाकी है। इस डेटा से आरोपियों के खिलाफ आरोपों से संबंधित और सामग्री मिल सकती है और घटना से जुड़े अन्य गवाहों की पहचान करने में मदद मिल सकती है। इसके अलावा, आवेदक के निवास से जब्त डीवीआर (DVR) का डेटा फोरेंसिक जांच के लिए नई दिल्ली स्थित केंद्रीय फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला (CFSL) भेजा गया है, ताकि सीसीटीवी फुटेज की निरंतरता और प्रामाणिकता की जांच की जा सके। यदि फुटेज में कोई छेड़छाड़ पाई जाती है, तो और जांच की आवश्यकता होगी।
आज तक की रिपोर्ट के अनुसार, 64 वर्षीय गिरिबला सिंह पर आत्महत्या के लिए उकसाने और दहेज प्रताड़ना के गंभीर आरोप हैं। सीबीआई की एफआईआर में भारतीय न्याय संहिता (BNS) और दहेज निषेध अधिनियम की धाराएं लगाई गई हैं। अभियोजन पक्ष का दावा है कि ट्विशा को लगातार मानसिक प्रताड़ना दी जा रही थी, उन पर नजर रखी जा रही थी और उनके प्रोफेशनल बैकग्राउंड को लेकर उन्हें परेशान किया जा रहा था। यह आरोप भी है कि अप्रैल 2026 में मेडिकल गर्भपात के बाद तनाव और बढ़ गया था। इसके अलावा, पति समर्थ सिंह की नशीले पदार्थों की लत और पिता बनने को लेकर विवादों का भी उल्लेख किया गया है। आरोप है कि घरेलू विवादों के बाद समर्थ ने ट्विशा के साथ मारपीट की और उसके इक्विटी इन्वेस्टमेंट को विदेशी फाइनेंशियल प्लान में ट्रांसफर करने के लिए दबाव डाला था।
ट्विशा शर्मा ने 9 दिसंबर 2025 को ऑनलाइन डेटिंग ऐप के जरिए मुलाकात के बाद वकील समर्थ सिंह से शादी की थी। 12 मई 2026 की रात वह अपने ससुराल में फांसी से लटकी मिली थी, जिसके बाद उसे एम्स भोपाल ले जाया गया जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। एम्स नई दिल्ली के मेडिकल बोर्ड सहित दो पोस्टमॉर्टम रिपोर्टों में मृत्यु का कारण 'एंटी-मॉर्टम हैंगिंग' (मृत्यु से पहले फांसी पर लटकना) और उसके कारण हुआ एस्फिक्सिया (दम घुटना) बताया गया है।
अदालत ने व्हाट्सएप चैट और सीसीटीवी फुटेज पर विशेष ध्यान दिया है। कोर्ट के अनुसार, व्हाट्सएप बातचीत से ट्विशा के गंभीर मानसिक तनाव और घुटन की स्थिति स्पष्ट होती है। घटना की रात का क्रम और उसके बाद आरोपियों का व्यवहार भी महत्वपूर्ण है। केस डायरी में ऐसी सामग्री भी है जो संकेत देती है कि घटना के बाद आवेदक ने उच्च पदों पर बैठे कुछ प्रभावशाली व्यक्तियों से संपर्क किया था, जिसकी जांच जरूरी है।
बचाव पक्ष के वकील सुरेंद्र सिंह ने दलील दी थी कि गिरिबला सिंह का कोई आपराधिक इरादा (mens rea) नहीं था और वे निर्दोष हैं। उन्होंने तर्क दिया कि इलेक्ट्रॉनिक बातचीत मुख्य रूप से उनके बेटे के खिलाफ शिकायतों की ओर इशारा करती है। वकीलों ने मेडिकल रिकॉर्ड का हवाला देते हुए बताया कि ट्विशा डिप्रेशन का शिकार थी और इसका संबंध नशीले पदार्थों के सेवन से था। इसके अलावा, बचाव पक्ष ने बताया कि परिवार द्वारा ट्विशा के खाते में ₹7.5 लाख ट्रांसफर किए गए थे। अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, आवेदक ने अपनी उम्र और बीमारियों का हवाला देते हुए बताया कि वे पिछले पांच महीनों से न्यायिक हिरासत में हैं और सीबीआई ने उनके खिलाफ सबूत न होने के कारण दहेज एक्ट की धाराओं के तहत चालान पेश नहीं किया है।
दूसरी ओर, सीबीआई और राज्य सरकार ने जमानत का विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि आवेदक ने जांच में सहयोग नहीं किया और स्थानीय पुलिस द्वारा नोटिस दिए जाने के बावजूद वे उपस्थित नहीं हुईं। इसके अलावा, सबूत नष्ट करने का प्रयास किए जाने का आरोप भी लगाया गया। अभियोजन पक्ष ने कहा कि यदि गिरिबला सिंह को जमानत दी जाती है, तो वे गवाहों और सबूतों को प्रभावित कर सकती हैं।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, जस्टिस अजय कुमार निरंकरी ने 26 अक्टूबर को फैसला सुरक्षित रखा था और बुधवार को आदेश जारी किया। कोर्ट ने अवलोकन किया कि मृत्यु के कारणों और महत्वपूर्ण फोरेंसिक रिपोर्ट अभी बाकी हैं, इसलिए आरोपियों के खिलाफ आरोपों के ट्रायल के दौरान सावधानीपूर्वक जांच करना आवश्यक है। अतः, कोर्ट ने गिरिबला सिंह की जमानत याचिका खारिज कर दी है।
गिरिबला सिंह भोपाल की पूर्व जिला एवं सत्र न्यायाधीश के रूप में कार्यरत थीं और वर्तमान में सेवानिवृत्त हैं।
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