टाटा ट्रस्ट से वरिष्ठ वकील डेरियस खंबाता की विदाई, बोर्ड विवाद पर तीखा हमला
टाटा संस की 17 सितंबर की बैठक को खंबाता ने 'कलंकित दिन' बताकर आलोचना की है।
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
3 नवंबर 2026, सुबह 12:27 · अपडेट सुबह 11:29 · 4 मिनट का पाठ
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मुंबई स्थित टाटा ट्रस्ट में चल रहे आंतरिक विवादों के बीच एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील डेरियस खंबाता ने टाटा ट्रस्ट के ट्रस्टी के रूप में पुनर्नियुक्ति न लेने का निर्णय लिया है। मिंट की रिपोर्ट के अनुसार, सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट (SDTT) और सर रतन टाटा ट्रस्ट (SRTT) के ट्रस्टी के रूप में उनका कार्यकाल इस सप्ताह समाप्त हो रहा है। खंबाता ने नोएल टाटा और टाटा ट्रस्ट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) सिद्धार्थ शर्मा को सोमवार को चार पन्नों का पत्र लिखकर टाटा संस के बोर्ड और अन्य दो ट्रस्टी वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह के कामकाज की कड़ी आलोचना की है।
खंबाता ने 17 सितंबर 2026 को आयोजित टाटा संस की बोर्ड बैठक को 'एक ऐसा दिन जो कलंकित रहेगा' (a day that will live in infamy) बताया था। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि इन घटनाओं ने टाटा संस की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाया है और कॉर्पोरेट इंडिया की छवि पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा किया है। खंबाता के अनुसार, रतन टाटा यदि आज जीवित होते तो बोर्ड कभी इस तरह व्यवहार नहीं करता। उन्होंने जोर देकर कहा कि कर्तव्य व्यक्तियों के प्रति नहीं, बल्कि संस्थाओं के प्रति होते हैं और रतन टाटा हमेशा मानते थे कि संस्था व्यक्ति से बड़ी होती है।
विवाद का मुख्य केंद्र 17 सितंबर 2026 की बैठक है, जिसमें टाटा संस के चेयरमैन चंद्रशेखरन को तीसरी टर्म देने के लिए मतदान किया गया था। खंबाता ने सवाल उठाया कि ट्रस्ट के नामित निदेशक ट्रस्ट के हितों के विरुद्ध कैसे काम कर सकते हैं? उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के पिछले फैसले का हवाला देते हुए कहा कि ट्रस्टी के रूप में जिम्मेदारी ट्रस्ट के हितों की रक्षा करने की है। उन्होंने वेणु श्रीनिवासन पर आरोप लगाया कि उन्होंने 17 सितंबर की बैठक से एक दिन पहले ट्रस्ट के निर्देशों की अनदेखी की थी।
टाटा संस को लिस्टिंग (शेयर बाजार में सूचीबद्ध) करने के मुद्दे पर भी खंबाता ने असंतोष व्यक्त किया था। उन्होंने बताया कि अप्रैल 2026 में विजय सिंह और वेणु श्रीनिवासन ने अचानक मीडिया में बयान दिया था कि वे लिस्टिंग के पक्ष में हैं, जो पिछले सर्वसम्मत प्रस्तावों के विपरीत था। खंबाता ने टाटा मॉडल को महात्मा गांधीजी के ट्रस्टीशिप के विचार का जीवंत उदाहरण बताया था। उन्होंने कहा कि जो लोग टाटा संस को ट्रस्ट से अलग करना चाहते हैं, वे वास्तव में इस राष्ट्रीय खजाने को जोखिम में डाल रहे हैं।
नोएल टाटा के नेतृत्व की प्रशंसा करते हुए खंबाता ने कहा कि पिछले दो वर्षों में नोएल ने शांति और समर्पण के साथ काम किया है। हालांकि, खंबाता ने स्वीकार किया कि कुछ मामलों में उनके और नोएल के विचार अलग थे, लेकिन नोएल ने लोकतांत्रिक तरीके से उन विचारों को स्वीकार किया। इस विदाई के पीछे एक कारण यह भी माना जा रहा है कि ट्रस्टियों की नियुक्ति के लिए सर्वसम्मति आवश्यक होती है, और वेणु श्रीनिवासन तथा विजय सिंह के साथ मतभेदों के कारण खंबाता की पुनर्नियुक्ति कठिन हो सकती थी।
यह घटनाक्रम 26 नवंबर को होने वाली टाटा संस की आगामी बोर्ड मीटिंग से पहले सामने आया है। नोएल टाटा ने 26 अक्टूबर को बोर्ड को पत्र लिखकर 17 सितंबर के प्रस्ताव की वैधता को चुनौती दी थी। इस बीच, केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी टाटा संस और टाटा ट्रस्ट से इस विवाद को सार्वजनिक करने के बजाय आपसी सहमति से सुलझाने की अपील की है, जैसा कि टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में बताया गया है। खंबाता की विदाई के बाद अब सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट में 5 और सर रतन टाटा ट्रस्ट में 4 ट्रस्टी शेष रहेंगे। खंबाता ने अंत में लिखा है कि इतिहास तय करेगा कि जिन्हें रतन टाटा ने यह जिम्मेदारी सौंपी थी, वे व्यक्तिगत हितों से ऊपर उठ सके या नहीं।
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