स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत पर राफेल मरीन की पहली सफल लैंडिंग
फ्रेंच पायलट्स द्वारा किए गए ट्रायल्स में पहले प्रयास में ही विमान सफलतापूर्वक उतरा
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
1 नवंबर 2026, सुबह 9:25 · अपडेट रात 11:12 · 4 मिनट का पाठ
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भारतीय नौसेना के स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर आईएनएस विक्रांत पर राफेल मरीन (राफेल-एम) फाइटर जेट की पहली सफल लैंडिंग की गई है। 29 अक्टूबर को किए गए इस ट्रायल में विमान पहले प्रयास में ही सफलतापूर्वक उतरा। इस सफलता के साथ ही भारतीय नौसेना में राफेल मरीन विमानों को ऑपरेशनल बनाने की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण पड़ाव पूर्ण हो गया है। यह विमान फ्रेंच नेवी द्वारा उपयोग में लाया जाने वाला लड़ाकू विमान है और इन ट्रायल्स के दौरान इसे फ्रेंच पायलट्स द्वारा उड़ाया गया था।
दैनिक भास्कर और हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, इन ट्रायल्स का मुख्य उद्देश्य फ्रांस के लिए तैयार किए गए इस विमान को भारतीय एयरक्राफ्ट कैरियर की टेक्नोलॉजी के साथ अनुकूल बनाया जा सकता है या नहीं, यह जांचना है। समुद्र में जहाज से लड़ाकू विमान उड़ाना और उसे लैंड कराना सामान्य विमान उड़ाने से काफी अलग और चुनौतीपूर्ण है। इससे पहले गोवा में तटीय आधारित टेस्ट फैसिलिटी में भी फ्रेंच पायलट्स द्वारा समान प्रकार के ट्रायल्स किए गए थे।
भारत ने अप्रैल 2025 में फ्रांस के साथ 26 राफेल मरीन फाइटर जेट खरीदने के लिए लगभग ₹63,000 करोड़ का महत्वपूर्ण रक्षा समझौता किया था। इस समझौते के तहत 22 सिंगल-सीट जेट और 4 ट्विन-सीट जेट शामिल हैं। एनडीटीवी की रिपोर्ट के अनुसार, इन विमानों की पहली डिलीवरी 2028 के अंत तक या 2029 की शुरुआत में होने की संभावना है। इस समझौते में पायलट ट्रेनिंग, फ्लाइट सिमुलेटर्स, हथियार, आवश्यक उपकरण और लंबे समय के मेंटेनेंस सपोर्ट का भी समावेश है। इसके साथ ही भारतीय वायुसेना द्वारा पहले से ही उपयोग में लाए जा रहे राफेल जेट्स के लिए अतिरिक्त उपकरण भी इस समझौते का हिस्सा हैं।
आईएनएस विक्रांत के बारे में विवरण देते हुए रिपोर्ट्स बताती हैं कि यह 45,000 टन का एयरक्राफ्ट कैरियर 262 मीटर लंबा है और इसमें 15 डेक तथा 2,300 कंपार्टमेंट्स हैं। इसमें 30 विमानों और 1,600 क्रू मेंबर्स के लिए पर्याप्त जगह है और इसकी क्षमता 7,500 नॉटिकल मील है। इस जहाज में 76% स्वदेशी सामग्री का उपयोग किया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सितंबर 2022 में आईएनएस विक्रांत को सेवा में शामिल किया था और इसे बनाने में 13 साल का समय तथा ₹20,000 करोड़ का खर्च आया था। नौसेना अभी आईएनएस विक्रांत और आईएनएस विक्रमादित्य दोनों एयरक्राफ्ट कैरियर्स पर काम कर सके ऐसे राफेल-एम जेट्स का उपयोग करेगी।
एयरक्राफ्ट कैरियर से विमान उड़ाने के लिए दो मुख्य तकनीक होती हैं: CATOBAR और STOBAR। CATOBAR तकनीक में विमान को कम दूरी में जरूरी गति प्राप्त करने के लिए 'कैटपल्ट' नामक शक्तिशाली लॉन्च सिस्टम की मदद ली जाती है, जिसका उपयोग फ्रांस के चार्ल्स डी गॉल जहाज में होता है। जबकि STOBAR तकनीक में कैटपल्ट नहीं होता, लेकिन विमान जहाज पर बने ऊपर उठे ढलानदार रैंप यानी 'स्की-जंप' की मदद से उड़ान भरता है। भारत के आईएनएस विक्रांत और आईएनएस विक्रमादित्य में STOBAR व्यवस्था है, जिसमें फिलहाल रूसी मूल के मिग-29के (MiG-29K) फाइटर जेट्स कार्यरत हैं।
राफेल मरीन विमानों का उपयोग हवाई संरक्षण, समुद्री हमले, जासूसी और तट पर हमलों जैसे मिशन के लिए किया जाएगा। ये विमान दुश्मन के फाइटर जेट्स को निशाना बनाने में और दुश्मन के हथियारों की रेंज के बाहर रहकर समुद्र पर नियंत्रण रखने में नौसेना की मदद करेंगे। इस समझौते में 'आत्मनिर्भर भारत' के दृष्टिकोण के अनुसार स्वदेशी हथियारों के एकीकरण के लिए टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का भी समावेश किया गया है।
दूसरी तरफ, भारत 114 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने की योजना पर भी काम कर रहा है, जिसे MRFA प्रोजेक्ट के रूप में जाना जाता है। डिफेंस सेक्रेटरी राजेश कुमार सिंह ने बताया था कि इस प्रोजेक्ट पर इस वित्तीय वर्ष के अंत तक निर्णय लिया जा सकता है। इस प्रोजेक्ट की कीमत लगभग ₹3.25 लाख करोड़ हो सकती है। इस योजना के तहत डसॉल्ट एविएशन और स्थानीय भागीदार भारत में राफेल का उत्पादन करेंगे। इसमें 18 विमान फ्लाई-अवे कंडीशन में फ्रांस द्वारा सप्लाई किए जाएंगे और बाकी विमान भारत में बनाए जाएंगे, जिसमें सालाना 12 विमानों का उत्पादन होने की अपेक्षा है। भारतीय वायुसेना के पास फिलहाल 36 राफेल जेट्स कार्यरत हैं जो ₹59,000 करोड़ के खर्च पर खरीदे गए थे।
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