भारत में सीवर सफाई के दौरान कई श्रमिकों की मौत, कानून के बावजूद जोखिम बरकरार
मध्य प्रदेश के उज्जैन में होटल के कचरा चैंबर की सफाई में 4 श्रमिकों ने गंवाई जान
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
6 नवंबर 2026, सुबह 5:55 · 4 मिनट का पाठ
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भारत में सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान काम करने वाले श्रमिकों की मौत की घटनाएं लगातार हो रही हैं। हाल ही में मध्य प्रदेश के उज्जैन में एक होटल के फूड-वेस्ट चैंबर की सफाई करते समय 4 श्रमिकों की मौत हो गई। द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी कार्यक्रमों, सुप्रीम कोर्ट के आदेशों, कानूनी प्रावधानों और मशीनीकृत सफाई तकनीक उपलब्ध होने के बावजूद, सफाई कर्मचारी ऐसी परिस्थितियों में जान गंवा रहे हैं जिन्हें रोका जा सकता था।
संसद और राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग के आंकड़ों के अनुसार, सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान होने वाली मौतों के आंकड़े चिंताजनक हैं। 2014 से 2025 के बीच 859 श्रमिकों की मौत हुई, जबकि 2019 से 2026 के मध्य तक 498 श्रमिकों ने अपनी जान गंवाई। इसके अलावा, 2021-26 के दौरान 18 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 332 श्रमिकों की मौत दर्ज की गई। यदि लंबी अवधि की बात करें तो, 1993 से 2025 के बीच कुल 1,350 श्रमिकों की मौत हुई है। हालांकि, सफाई कर्मचारी आंदोलन द्वारा बार-बार यह दावा किया गया है कि ये आंकड़े वास्तविकता से बहुत कम दिखाए गए हैं।
सरकार ने 2021 से यह दावा किया है कि अस्वच्छ शौचालयों से मैन्युअल रूप से मल-मूत्र साफ करने की प्रथा समाप्त हो गई है। इसके कारण प्रशासनिक निकाय, नगर पालिकाएं और निजी संस्थान निरीक्षण की तत्परता से मुक्त हो गए हैं, जबकि वास्तव में समस्या की जड़ अभी भी नहीं सुलझी है। इन कार्यों में ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर धकेली गई जातियों के लोगों की संख्या अधिक देखी जाती है। 2013 से कानून में सीवर और सेप्टिक टैंक की खतरनाक सफाई और मैन्युअल स्केवेंजिंग (हाथ से मैला ढोना) के बीच अंतर किया गया है, फिर भी श्रमिक अभी भी जहरीली गैसों के जोखिम में रहते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने डॉ. बलराम सिंह (2023) मामले में सफाई कर्मचारी आंदोलन (2014) के तहत आवश्यकताओं को और मजबूत किया था। कोर्ट ने आदेश दिया था कि आउटसोर्स किए गए सीवर सफाई अनुबंधों में यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि श्रमिकों को सीवर में न उतरना पड़े। साथ ही, श्रमिकों की मृत्यु के मामले में मुआवजे को बढ़ाकर ₹30 लाख कर दिया गया था। 2025 में बेंगलुरु सहित चार मेट्रो शहरों में मैन्युअल सीवर सफाई बंद करने का आदेश दिया गया था। इसके एक साल बाद, 2023 के आदेश का उल्लंघन करने और मुआवजा देने में विफल रहने के कारण 15 मुख्य सचिवों को नोटिस जारी किया गया, जिनमें हैदराबाद के मुख्य सचिव भी शामिल हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, निजी ठेकेदार और नगर निकाय 'प्रोहिबिशन ऑफ एम्प्लॉयमेंट एज़ मैनुअल स्केवेंजर्स एंड देयर रिहैबिलिटेशन एक्ट 2013' और उसके नियमों का उल्लंघन करते हैं। वे बिना दस्तावेजों वाले दैनिक वेतन भोगी श्रमिकों को रखकर अपनी जिम्मेदारी से बचने का प्रयास करते हैं। अतः, श्रमिकों के रोजगार के औपचारिकीकरण और जातिवाद से परे सामाजिक सुरक्षा में सुधार के बिना इस समस्या को दूर नहीं किया जा सकता।
नेशनल एक्शन फॉर मैकेनाइज्ड सैनिटेशन इकोसिस्टम योजना के तहत भी लक्ष्यों और परिणामों के बीच बड़ा अंतर देखा गया है। यह योजना मुख्य रूप से शहरी स्थानीय निकायों पर केंद्रित है, लेकिन इसमें एक बुनियादी गलती है: राज्य प्रशासन किट के वितरण जैसे प्रशासनिक सहायता बढ़ाने पर ध्यान देता है, लेकिन उन स्थितियों को कम करने पर ध्यान नहीं देता जो श्रमिकों की मृत्यु का कारण बनती हैं।
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